Monthly Archives: April 2014

Unique way to Birthday celebrations – Avtaran Divas

April 20, 2014, Spiritual Guru Sant Asharamji Bapu turned 74 yesterday and Devotees celebrated the propitious occasion of his Birth also known as Avtaran Diwas or Incarnation day in their words, with traditional Vedic holdings. How an Avtaran Divas differs from normal birth is very well explained by Sant Asharamji Bapu. Bapuji says that the Soul is eternal and neither does it ever take birth nor will it ever die. To understand ourselves as the soul and not as the body is called Self Realization, when the jiv realizes its true identity then its said to be self-realized . Its to celebrate its birth the term Avtaran/Incarnation is used.  

Param Pujya Sant Shri Asahram JI Bapu Avtaran Divas kise bolte hain?

 

The celebrations were quite exclusive to observe when the entrance gate of JodhpurCentral Jail was adorned with balloons and Candle lightening.

 Across the globe, 50-70 million followers, 1200 Ashrams, and 17000 Bal Sanskaar orgs (Children moral development centre), had enumerated the day with Havan , meditation camps , Mantra chanting , prayer gatherings etc which was later  accomplished by sharing Prasad and food with everyone.

Pujya Asaram Bapu 74th Avtaran Divas (Birthday) bhajan and divya lila darshan – Adharam Madhuram

Apart from the reverence scheduled, massive number of charity programs were also organized which included distribution of clothes, blankets, money among the underprivileged and poor populace.

Sudarshan News Coverge Pujya Bapuji Avtaran Divas 20-Apr-2014

Vishwa Seva Diwas – Celebration of the Divine Birth of Asaram Bapuji!

As summers prevails in most part of country, different stall were found distributing sweet rose water as well. Shortly in evening Twitter PAN India trended with #VishwaSewaDiwas by the followers of Spiritual guru.

 

#VishwaSevaDiwas,avtaran,divas,ashram,asharam,bapu,sant

 

Advertisements

संत आशारामजी बापू का समर्थन नरेन्द्र मोदी को ? जानिये सच !

asharam bapu support narendra modi sant rishi prasad hindu

क्या पूज्य संत श्री आशारामजी का समर्थन श्री नरेन्द्र मोदी को है ? हमारे अनुसार शत प्रतिशत है !

यदि ऐसा न होता तो पूज्य श्री के आश्रम से प्रकाशित मासिक पत्रिका “c”  में मोदी जी के लिये क्या इतने सराहनीय शब्द होते ?

“ऋषि प्रसाद” में उनके माध्यम से भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन करने की भी बात की गयी है !

asharam bapu support narendra modi sant rishi prasad hindu

 

asharam bapu support narendra modi sant rishi prasad hindu

 

 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम !

hanumant

रामावतार को लाखों वर्ष हो गये लेकिन श्रीरामजी अभी भी जनमानस के हृदय-पटल से विलुप्त नहीं हुए। क्यों? क्योंकि श्रीरामजी का आदर्श जीवन, उनका आदर्श चरित्र हर मनुष्य के लिए अनुकरणीय है।

एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श शिष्य, आदर्श योद्धा और आदर्श राजा के रूप में यदि किसीका नाम लेना हो तो भगवान श्रीरामजी का ही नाम सबकी जुबान पर आता है। इसीलिए राम-राज्य की महिमा आज लाखों-लाखों वर्षों के बाद भी गायी जाती है।

shri ram with mata        shri ram janm

भगवान श्रीरामजी के सद्गुण ऐसे तो विलक्षण थे कि पृथ्वी के प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय और जाति के लोग उन सद्गुणों को अपनाकर लाभान्वित हो सकते हैं।

श्रीरामजी सारगर्भित बोलते थे। उनसे कोई मिलने आता तो वे यह नहीं सोचते थे कि पहले वह बात शुरू करे या मुझे प्रणाम करे। सामनेवाले को संकोच न हो इसलिए श्रीरामजी अपनी तरफ से ही बात शुरू कर देते थे।

shri ram gurukul

श्रीरामजी दूसरों की बात बड़े ध्यान व आदर से सुनते थे। बोलनेवाला जब तक अपने और औरों के अहित की बात नहीं कहता, तब तक वे उसकी बात सुन लेते थे। जब वह किसीकी निंदा आदि की बात करता तब देखते कि इससे इसका अहित होगा या इसके चित्त का क्षोभ बढ़ जायेगा या किसी दूसरे की हानि होगी, तब वे सामनेवाले की बातों को सुनते-सुनते इस ढंग से बात मोड़ देते कि बोलनेवाले का अपमान नहीं होता था।

युद्ध के मैदान में श्रीरामजी एक बाण से रावण के रथ को जला देते, दूसरा बाण मारकर उसके हथियार उड़ा देते फिर भी उनका चित्त शांत और सम रहता था। वे रावण से कहते : ‘लंकेश! जाओ, कल फिर तैयार होकर आना।’

ऐसा करते-करते काफी समय बीत गया तो देवताओं को चिंता हुई कि रामजी को क्रोध नहीं आता है, वे तो समता-साम्राज्य में स्थिर हैं, फिर रावण का नाश कैसे होगा? लक्ष्मणजी, हनुमानजी आदि को भी चिंता हुई, तब दोनों ने मिलकर प्रार्थना की : ‘प्रभु! थोड़े कोपायमान होइये।’

vivah   vanvas

तब श्रीरामजी ने क्रोध का आवाहन किया : क्रोधं आवाहयामि। ‘क्रोध! अब आ जा।’

श्रीरामजी क्रोध का उपयोग तो करते थे किंतु क्रोध के हाथों में नहीं आते थे। हम लोगों को क्रोध आता है तो क्रोधी हो जाते हैं, लोभ आता है तो लोभी हो जाते हैं, मोह आता है तो मोही हो जाते हैं, शोक आता है तो शोकातुर हो जाते हैं लेकिन श्रीरामजी को जिस समय जिस साधन की आवश्यकता होती थी, वे उसका उपयोग कर लेते थे।

श्रीरामजी का अपने मन पर बड़ा विलक्षण नियंत्रण था। सामनेवाला व्यक्ति अपने ढंग से सोचता है, अपने ढंग से जीता है, अतः वह आपके साथ अनुचित व्यवहार कर सकता है परंतु उसके ऐसे व्यवहार से अशांत होना-न होना आपके हाथ की बात है। यह जरूरी नहीं है कि सब लोग आपके मन के अनुरूप ही जियें।

hanuman 4         hanuman 1

 

श्रीरामजी अर्थव्यवस्था में भी निपुण थे। ‘शुक्रनीति’ और ‘मनुस्मृति’ में भी आया है कि जो धर्म, संग्रह, परिजन और अपने लिए – इन चार भागों में अर्थ की ठीक से व्यवस्था करता है वह आदमी इस लोक और परलोक में सुख-आराम पाता है। कई लोग लोभ-लालच में इतना अर्थसंग्रह कर लेते हैं कि वही अर्थ उनके लिए अनर्थ का कारण हो जाता है और कई लोग इतने खर्चीले हो जाते हैं कि कमाया हुआ सब धन उड़ा देते हैं, फिर कंगालियत में जीते हैं। श्रीरामजी धन के उपार्जन में भी कुशल थे और उपयोग में भी। जैसे मधुमक्खी पुष्पों को हानि पहुँचाये बिना उनसे परागकण ले लेती है, ऐसे ही श्रीरामजी प्रजा से ऐसे ढंग से कर (टैक्स) लेते कि प्रजा पर बोझ नहीं पड़ता था। वे प्रजा के हित का चिंतन तथा उसके भविष्य का सोच-विचार करके ही कर लेते थे।

hanuman 2


प्रजा के संतोष तथा विश्वास-सम्पादन के लिए श्रीरामजी राज्यसुख, गृहस्थसुख और राज्यवैभव का त्याग करने में भी संकोच नहीं करते थे। इसीलिए श्रीरामजी का राज्य आदर्श राज्य माना जाता है।

 

 

गरीबों के लिए पूज्य बापूजी की सहानुभूति !

Bapuji emotional

 

 

 मुझे साम्राज्य की लालसा नहीं, मैं स्वर्ग भी नहीं चाहता ! मेरे जीवन की बस एक ही आकांक्षा है कि इस संसार के दुखी मनुष्यों के कष्टों का नाश कर दूँ !  संत आशाराम बापू का जीवन असहाय और दुखी लोगों की सेवा का एक जीता-जागता उदाहरण है ! जहाँ कहीं गरीबी और अभाव है, जहाँ कहीं रोग और शोक है, जहाँ कहीं अज्ञान और अशिक्षा है, बापू का ह्रदय वहीँ उमड़ पड़ता है !

 

This slideshow requires JavaScript.

अपने घर में तो दिया जलाओ, पर किसी गरीब के घर का दिया बुझा हो तो उसके यहाँ भी दिया जला आओ ! गरीब और अमीर के बीच इतना बड़ा फासला, इतना भेद-भाव ! उन गरीबों का ख्याल करोगे तो परमात्मा आप पर ज़रूर राजी होगा ! आप स्वयं तो नए कपडे पहनो, मन नहीं है, पर किसी गरीब को एक कपडा दे आओगे तो ईश्वर तुम पर प्रसन्न हुए बिना रहेगा नहीं !

 

 

आसुमल से हो गए साईं आशाराम !!

पूज्य दादागुरु लीलाशाह बापू की करुणा कृपा से हमारे गुरुदेव आसुमल से आशाराम हुए और आज उनके ही आशीर्वाद से हजारों नहीं वरन लाखों – लाखों और करोड़ों – करोड़ों साधक भाई-बहन लाभान्वित हो रहे हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं !

This slideshow requires JavaScript.

पांच वर्ष के तांशु का कमाल ! गुरुभक्ति ने किया अद्भुत व अलौकिक चमत्कार !

Tanshu1

दिल्ली के एक घर में सभी छोटे छोटे बच्चे आपस में खेल रहे थे और घर के बड़े बाहर गए हुए थे ! तभी अचानक घर  बीटा खेलने की चाह में छत से नीचे गिर गया ! ये देख सभी घबरा गए और तभी उसके चचेरे भाई तांशु ने जिसकी उम्र मात्र पांच वर्ष की ही थी एवं पूज्य बापूजी से दीक्षित था, उसने बाकि बच्चों की सहायता से उस बेहोश बच्चे को कार में रखा और गुरुदेव का ध्यान करते हुए गाडी में बैठ गया ! जिसने कभी गाडी का हैंडल तक नहीं पकड़ा था, उसको आज अचानक प्रेरणा हुई, कि गुरुदेव उसके  साथ हैं और वो निश्चिंत और निडर होकर गाडी चलाये ! उसने गाडी स्टार्ट की और घर से ग्यारह किलोमीटर दूर हॉस्पिटल में ले जाकर भर्ती करवा दिया और अंततः उस बच्चे की जान बचायी जा सकी ! 

This slideshow requires JavaScript.

इस अद्भुत वाकये का प्रसारण सभी न्यूज़ चैनल्स पर किया गया एवं अखबारों में भी प्रकाशित हुआ !
यूँ तो पांच साल का बच्चा कार चलाये तो ये कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है, परन्तु तांशु ने तो गुरुदेव की प्रेरणा से कार चलायी थी और किसी की जान बचायी थी, इस कारण से उसे राष्ट्रपति की तरफ से पुरस्कृत भी किया गया था ! इसके अलावा बहुत से बड़े एवं उच्च पदों पर आसीन सज्जनो द्वारा भी पुरस्कृत हुआ तांशु !
पर वो हर बार यही कहता रहा और आज भी तांशु के मुख से यही शब्द निकलते हैं कि ” मैंने कुछ नहीं किया, मैं तो बस कार में जाकर बैठ गया था, और जब बापूजी की शक्ति मेरे साथ थी तो सब अपने आप हो रहा था, मुझे तो बस ऐसा लग रहा था कि गुरुदेव मुझे अपनी गोद में बैठाये हैं और स्वयं कार चला रहे हैं !”
Tanshu4
 
धन्य हैं ऐसे गुरुदेव और उनके ऐसे शिष्य जो हर कदम पर गुरुदेव की करुणा – कृपा को अनुभव करते हैं ! और ऐसे गुरुदेव को पाकर हम साधकों का जीवन भी धन्य है कि वो कभी किसी भी पथ या मार्ग में हमें अकेला नहीं छोड़ते !
 
[youtube https://www.youtube.com/watch?v=ZmFa-guDLm0&feature=youtu.be]

संस्कृत : समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी

क्या आप जानते हैं ?

समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी – संस्कृत ……….

https://i2.wp.com/dubeat.com/wp-content/uploads/2013/07/sanskrit-wp.jpg

 

विविध भाषाओँ की स्त्रोत “संस्कृत” भाषा के संबंध में प्रचलित सभी धारणाएं भ्रमपूर्ण हैं |

वर्तमान में पाश्चात्य सिद्धांतों को अधिक मान्यता प्राप्त है, क्योंकि “जिसकी लाठी उसकी भैंस ” | पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अन्धानुकर्ता यह समझ बैठे हैं कि “ग्रीक”,“लैटिन”,“संस्कृत तीनों किसी न किसी प्राचीन भाषा की संतान हैं | हमारी ज्येष्ठ भाषा “संस्कृत“का तो वे नाम भी ढंग से नहीं जानते, अतः अपनी काल्पनिक “जननी भाषा” को”इंडो – यूरोपियन” ऐसा ऊटपटांग नाम देकर काम चला लेते हैं | वास्तव में समस्त भाषओं की जननी संस्कृत ही है |

दूसरा भ्रम उन्हें “संस्कृत” नाम के निर्माण से हुआ है | पाश्चात्य लोग कहते हैं कि “संस्कृत-यानी अच्छी गढ़ी हुई भाषा” | ऐसा वो इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि “संस्कृत” किसी अन्य भाषा से बनी भाषा है , ठीक उसी प्रकर जैसे निराकार पत्थर से मूर्ति बनती है | लेकिन वास्तव में “संस्कृत” शब्द का अर्थ है कि जो भाषा, ईश्वर द्वारा निर्मित होने के कारण अच्छी बनी हुई है | अतः संस्कृत किसी अन्य कच्ची या अधपकी भाषा से बनी है यह बिल्कुल बेबुनियाद व आधारहीन तर्क हैं |

The Science of Sanskrit Language Explained by Rajiv Dixit

पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार प्राचीनकाल का मानव वानर था जो कि बर्बर प्रकृति था | तो सोच का विषय है कि ऐसी अवस्था का मानव भला संस्कृत जैसी भाषा कैसे बना पाता ? सच तो यह है कि संस्कृत के टूट- फूट जाने से ही अन्य प्रादेशिक भाषाएँ बनी हैं न कि प्राकृति भाषाओं से संस्कृत बनी है |

http://t3.gstatic.com/images?q=tbn:ANd9GcRo1Oj5HuadbY_TlpjJonQcYM7unzbITvkTDx4ACONGa6SFktzI

“प्राकृति” शब्द की रचना ‘प्र’ व ‘आकृति’ की संधि से हुयी है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “प्राकृति” वे भाषाएँ हैं जिन्हें किसी अन्य मूल भाषा से आकार प्राप्त हुआ है | संस्कृत भाषा के टूट जाने पर उसका व्याकरण भी टुकड़ों – टुकड़ों में अन्य भाषाओँ में बंट गया | अतः पाणिनि का ही व्याकरण अन्य सभी भाषाओँ पर लागू हुआ है | संस्कृत जैसी आप्राकृतिक भाषा मानव बना ही नहीं पाता | मानव का हाथ लगते ही वस्तुएं दूषित हो जातीं हैं | इसका उदाहरण है – आजकल कारखानों में जो भी खाद्यसामग्री अथवा दवाइयां बनतीं हैं, वे एकदम :”शुद्ध” हैं, यह जताने के लिए उन पर लिखा होता है “Untouched by any Human hand” अर्थात् किसी भी व्यक्ति के हाथ स्पर्श बिना बनी वस्तु’ |

 

रॉयल एशियाटिक सोसायटी, लंदन में पढ़े गये, एक वक्तृत्व में कहा गया है कि “बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस भारत के ऊपर कई क्रुद्ध आक्रामकों का आक्रमण होता रहा जिनके पद चिन्ह उस भूमि पर पाए जाते हैं, उसी भारत में समय और शासन बदलते रहने पर भी एक भाषा ऐसी टिकी हुई है कि उसके विभिन्न पहलुओं और वैभवता की कोई सीमा नहीं; जो “ग्रीक”, “लैटिन” जैसी मान्यता प्राप्त यूरोपीय भाषायों की जननी है तथा जो “ग्रीक” से भी लचीली और “रोमन” भाषा से भी सशक्त है | यह वह भाषा है जिसके दर्शनशास्त्र की तुलना में पायथागोरस के कथन “कल जन्मे हुए शिशु” जैसे बालिश लगते हैं; जिसकी वैचारिक उड़ान के आगे प्लेटो की ऊँची से ऊँची कल्पनाएँ निष्प्रभावित और समान्य सी लगती हैं; जिसके काव्यों में व्यक्त प्रतिभा अकल्पित – सी है और जिसके शास्त्रीय ग्रन्थ तो इतने प्राचीन हैं कि उनका कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया और शायद आगे लगा भी नहीं सकता | संस्कृत का सारा साहित्य इतना विपुल और विशाल है कि उसका तो जितना वर्णन किया जाये, उतना कम ही पड़ेगा | उसके सहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान है | उसकी पौराणिक कथाओं की तो सीमा ही नहीं है | उसके दर्शनशास्त्र में हर प्रकार की समस्या या पहेली का विचार किया गया है तथा वैदिक समाज के प्रत्येक वर्ण और वर्ग के लिए उसके धर्मशास्त्र के नियम बने हुए हैं |”

 

Panini’s Sanskrit Grammar in Computational Linguistics goes uncredited? – Rajiv Malhotra

“Indian Antiquities” नाम का सात खंडों का ग्रन्थ, जिसके सम्पादक थॉमस मॉरिस हैं, सन् 1792 से 1800 तक प्रकाशित हुआ | उसके चौथे खंड के पृष्ठ 415 पर उल्लेख है कि – “Hollhead का सुझाव है कि संस्कृत भाषा ही पृथ्वी की मूल भाषा है |”

देश – विदेश के अन्य विद्वान् भी यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो वे भी इस निष्कर्ष पर पहुचेगें कि संस्कृत ही विश्व – भर के मानवों कों देवों ने भेंट स्वरूप दी है | वह भाषा किसी मानव द्वारा बनाई नहीं गई , बल्कि अन्य भाषाएँ का उद्गम “संस्कृत” से हुआ है |

हमारे देश के प्रशासन को भी इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए तथा भारत के युवाओं को भी अपने देश की प्राचीन भाषा और संस्कृति की अस्मिता और पहचान कायम रखने के लिए कदम बढ़ाना होगा; अन्यथा हम अपनी वैदिक भाषा मात्र किताबों में बंद किसी प्रदर्शनी में ही देख पायेगें |

read at ; http://nextfuture.aurosociety.org/sanskrit

 

Myths about Sanskrit

%d bloggers like this: