गुरु और शास्त्र

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गुरु और शास्त्र

                                                             जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादन
वशिष्ठजी बोले, हे देव! शिव किसको कहते हैं और ब्रह्म, आत्म, परमात्म, तत्सत्, निष्किञ्चन, शून्य, विज्ञान इत्यादिक किसको कहते हैं और ये भेदसंज्ञा किस निमित्त हुई हैं कृपा करके कहो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जब सबका अभाव होता है तब अनादि अनन्त अनाभास सत्तामात्र शेष रहता है जो इन्द्रियों का विषय नहीं उसको निष्किञ्चन कहते हैं | फिर मैंने पूछा, हे ईश्वर! जो इन्द्रियाँ बुद्धि आदिक का विषय नहीं उसको क्योंकर पा सकते हैं? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जो मुमुक्षु हैं और जिनको वेद के आश्रयसंयुक्त सात्त्विकी वृत्ति प्राप्त हुई है उनको सात्त्विकीरूप जो गुरु शास्त्रनाम्नी विद्या प्राप्त होती है उससे अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मतत्त्व प्रकाश हो आता है | जैसे साबुन से धोबी वस्त्र का मल उतारता है तैसे ही गुरु और शास्त्र अविद्या को दूर करते हैं | जब कुछ काल में अविद्या नष्ट होती है तब अपना आप ही दिखता है | हे मुनीश्वर! जब गुरु और शास्त्रों का मिलकर विचार प्राप्त होता है, तब स्वरूप की प्राप्ति होती है द्वैतभ्रम मिट जाता है और सर्व आत्मा ही प्रकाशता है और जब विचार द्वारा आत्मतत्त्व निश्चय हुआ कि सर्व आत्मा ही है उससे कुछ भिन्न नहीं तो अविद्या जाती रहती है | हे मुनीश्वर! आत्मा की प्राप्ति में गुरु और शास्त्र प्रत्यक्ष कारण नहीं क्योंकि जिनके क्षय हुए से वस्तु पाइये उनके विद्यमान हुए कैसे पाइये? देह इन्द्रियों सहित गुरु होता है और ब्रह्म सर्व इन्द्रियों से अतीत है, इनसे कैसे पाइये? अकारण है परन्तु कारण भी है, क्योंकि गुरु और शास्त्र के क्रम से ज्ञान की सिद्धता होती है और गुरु और शास्त्र बिना बोध की सिद्धता नहीं होती | आत्मा निर्देश और अदृश्य है तो भी गुरु और शास्त्र से मिलता है और गुरु और शास्त्र से भी मिलता नहीं अपने आप ही से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है | जैसे अन्धकार में पदार्थ हो और दीपक के प्रकाश से दीखे तो दीपक से नहीं पाया अपने आपसे पाया है | तैसे ही गुरु और शास्त्र भी है | यदि दीपक हो और नेत्र न हों तब कैसे पाइये और नेत्र हों और दीपक न हो तो भी नहीं पाया जाता जब दोनों हों तब पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही गुरु और शास्त्र भी हों और अपना पुरुषार्थ और तीक्ष्णबुद्धि हो तब आत्मतत्त्व मिलता है अन्यथा नहीं पाया जाता | जब गुरु, शास्त्र और शिष्य की शुद्ध बुद्धि तीनों इकट्ठे मिलते हैं तब संसार के सुख दुःख दूर होते हैं और आत्मपद की प्राप्ति होती है | जब गुरु और शास्त्र आवरण को दूर कर देते हैं तब आपसे आप ही आत्मपद मिलता है | जैसे जब वायु बादल को दूर करती है तब नेत्रों से सूर्य दीखता है | अब नाम के भेद सुनो | जब बोध के वश से कर्म इन्द्रियाँ और ज्ञान इन्द्रियाँ क्षय हो जाती हैं उसके पीछे जो शेष रहता है उसका नाम संवित््तत्त्व आत्मसत्ता आदिक हैं | जहाँ ये सम्पूर्ण नहीं और इनकी वृत्ति भी नहीं उसके पीछे जो सत्ता शेष रहती है सो आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल अनन्त परमशून्यरूप है- कहाँ शून्य का भी अभाव है | हे मुनीश्वर! जो शान्तरूप मुमुक्षु मनन कलना से संयुक्त है उनको जीवन्मुक्त पद के बोध के निमित्त शास्त्र मोक्ष उपाय, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, लोकपाल, पण्डित, पुराण, वेद शास्त्र और सिद्धान्त रचे हैं और शास्त्रों ने चैतन्य ब्रह्म, शिव, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, सत्, चित्,आनन्द आदिक भिन्न भिन्न अनेक संज्ञा कही हैं पर ज्ञानी को कुछ भेद नहीं | हे मुनीश्वर! ऐसा जो देव है, उसका ज्ञानवान् इस प्रकार अर्चन करते हैं और जिस पद के हम आदिक टहलुये हैं उस परमपद को वे प्राप्त होते हैं | फिर मैंने पूछा, हे भगवन्! यह सब जगत् अविद्यमान है और विद्यमान की नाईं स्थित है सो कैसे हुआ है | समस्त कहने को तुमहीं योग्य हो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर!जो ब्रह्म आदिक नाम से कहाता है वह केवल शुद्ध संवित्मात्र है और आकाश से भी सूक्ष्म है | उसके आगे आकाश भी ऐसा स्थूल है जैसा अणु के आगे सुमेरु होता है | उसमें जब वेदनाशक्ति आभास होकर फुरती है तब उसका नाम चेतन होता है | फिर जब अहन्तभाव को प्राप्त हुआ-जैसे स्वप्न में पुरुष आपको हाथी देखने लगे तैसे आपको अहं मानने लगा, फिर देशकाल आकाश आदिक देखने लगा तब चेतन कला जीव अवस्था को प्राप्त हुई और वासना करनेवाली हुई, जब जीवभाव हुआ तब बुद्धि निश्चयात्मक होकर स्थित हुई और शब्द और क्रियाज्ञान संयुक्त हुई और जब इनसे मिलकर कल्पना हुई तब मन हुआ जो संकल्प का बीज है | तब अन्तवाहक शरीर में अहंरूप होकर ब्रह्मसत्ता स्थित हुई | इस प्रकार यह उत्पन्न हुई है | फिर वायुसत्ता स्पन्द हुई जिससे स्पर्श सत्ता त्वचा प्रकट हुई, फिर तेजसत्ता हुई प्रकाश सत्ता हुई और प्रकाश से नेत्रसत्ता प्रकट हुई, फिर जलसत्ता हुई जिससे स्वादरूप-रससत्ता हुई और उससे जिह्वा प्रकट हुई, फिर गन्धसत्ता से भूमि, भूमि से घ्राणसत्ता और उससे पिण्डसत्ता प्रकट हुई | फिर देशसत्ता, कालसत्ता और सर्व सत्ता हुईं जिनको इकट्ठा करके अहंसत्ता फुरी | जैसे बीज, पत्र, फूल, फलादिक के आश्रय होता है तैसे ही इस पुर्यष्टका को जानो | यही अन्तवाहक देह है | इन सबका आश्रय ब्रह्मसत्ता है | वास्तव में कुछ उपजा नहीं केवल परमात्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | जैसे तरंगादि में जल स्थित है तैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | हे मुनीश्वर! संवित् में जो संवेदन पृथकरूप होकर फुरे उसे निस्स्पन्द करके जब स्वरूप को जाने तब वह नष्ट हो जाती है | जैसे संकल्प का रचा नगर संकल्प के अभाव हो जाता है, तैसे ही आत्मा के ज्ञान से संवेदन का अभाव हो जाता है | हे मुनीश्वर! संवेदन तबतक भासता है जबतक उसको जाना नहीं, जब जानता है तब संवेदन का अभाव हो जाता है और संवित् में लीन हो जाता है, भिन्नसत्ता इसकी कुछ नहीं रहती | हे मुनीश्वर! जो प्रथम अणु तन्मात्रा थी सो भावना के वश से स्थूल देह को प्राप्त हुई और स्थूल देह होकर भासने लगी, आगे जैसे जैसे देशकाल पदार्थ की भावना होती गई तैसे तैसे भासने लगी और जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर भासता है तैसे ही भावना के वश से ये पदार्थ भासने लगे हैं मैंने पूछा, हे भगवन्! गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर के समान इसको कैसे कहते हो? यह जगत् तो प्रत्यक्ष दीखता है? वासना के वश से दीखता है कि अविद्यमान में स्वरूप के प्रमाद करके विद्यमान बुद्धि हुई है और जगत् के पदार्थौं को सत् जानकर जो वासना फुरती है उससे दुःख होता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् अविद्यमान है | जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य होता है तैसे ही यह जगत् असत्य है उसमें वासना, वासक और वास्य तीनों मिथ्या हैं जैसे मृगतृष्णा का जल पान करके कोई तृप्त नहीं होता, क्योंकि जल ही असत् है, तैसे ही यह जगत् ही असत् है इसके पदार्थों की वासना करनी वृथा है | ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सब जगत मिथ्यारूप है | वासना, वासक और वास्य पदार्थों के अभाव हुए केवल आत्मतत्त्व रहता है और सब भ्रम शान्त हो जाता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् भ्रममात्र है-वास्तव में कुछ नहीं जैसे बालक को अज्ञान से अपनी परछाहीं में वैताल भासता है और जब विचार करके देखे तब वैताल का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान से यह जगत् भासता है और आत्म विचार से इसका अभाव हो जाता है | जैसे मृगतृष्णा की नदी भासती है और आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही आत्मा में अज्ञान से देह भासता है | जिसकी बुद्धि देहादिक में स्थिर है वह हमारे उपदेश के योग्य नहीं है | जो विचारवान् है उसको उपदेश करना योग्य है और जो मूर्ख भ्रमी और असत््वादी सत््कर्म से रहित अनार्य है उसको ज्ञानवान् उपदेश न करे | जिनमें विचार, वैराग्य, कोमलता और शुभ आचार हों उनको उपदेश करना योग्य है और जो इन गुणों से रहितृ हों उनको उपदेश करना ऐसे होता है जैसे कोई महासुन्दर और सुवर्णवत् कान्तिवाली कन्या को नपुंसक को विवाह देने की इच्छा करे |

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Posted on April 20, 2015, in Satsang and tagged , , , , , , , , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Leave a comment.

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