सतत चिन्तन।

asaramji
सतत चिन्तन।


एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते…..।

‘आपकी निरन्तर उपासना करता है और अव्यक्त अक्षर की उपासना करता है इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है?’

महाभारत में एक कथा आती है। रूक्मिणी ने किसी पर्व पर उत्सव किया। उत्सव में परिवार के एवं अन्य स्नेही, सम्बन्धी, मित्रादि लोगों की उपस्थिति आवश्यक होती है। श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरा प्यारा दोस्त अर्जुन नहीं आया है तो उसे बुलाने गये। उसके कक्ष में गये तो अर्जुन सो रहा है। श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उसके पास गये। मित्रभाव है, विनोद से अठखेलियाँ करके जगाना चाहा। जब बिल्कुल नजदीक गये तो अर्जुन के हर श्वास के साथ ‘कृष्ण…. कृष्ण….कृष्ण’ की ध्वनि सुनाई देने लगी।

यह है सतत चिन्तन। हमारा चिन्तन मन से ही न हो। मन सो जाय तो हमारे प्राण वह कार्य शुरु कर दें। जैसे, जगत का व्यवहार तीव्रता से करते हैं तो स्वप्न में भी वह चालू हो जाता है, वैसे जाग्रत अवस्था में इष्ट का चिन्तन इतनी लगन से, इतनी गहरे भाव से हो कि निद्रा के समय भी अन्तर्मन से वह चिन्तन होता है रहे, प्राणों में उसकी धारा बहती रहे।

रूक्मिणी ने देखा कि भगवान अर्जुन को बुलाने गये हैं, अर्जुन तो नहीं आया, भगवान भी वापस नहीं आये। उत्सव में आये हुए नारदजी के भेजा उन्हें बुलाने के लिए। नारदजी ने जाकर देखा तो अर्जुन सोया हुआ है और भगवान उसके पास बैठकर ध्यान से कुछ सुन रहे हैं। नारदजी को देखकर श्रीकृष्ण ने इशारे से कहा कि आवाज किये बिना यह अजपाजाप की ध्वनि सुनो।

‘वाह ! क्या चिन्तन है। श्वास-श्वास में श्रीकृष्ण की ध्वनि…!’ नारदजी चकित रह गये।

‘इसका मन शरीर के साथ जुड़ा है। शरीर सो गया है और मन खो गया है लेकिन इसका चिन्तन नहीं खोया है। नींद में भी चिन्तन चालू है। अर्जुन मेरा प्यारा है।’ श्री कृष्ण बोले।

‘जो आपका प्यारा है वह सारे विश्व का प्यारा है। उसके श्वास में चलती ‘कृष्ण… कृष्ण’ की ध्वनि के साथ मैं वीणा से ताल देता हूँ।’ नारद धीरे-धीरे वीणा के तार को झंकृत करने लगे और मस्त होने लगे। वे भूल ही गये कि मैं इन दोनों को बुलाने आया हूँ।

जहाँ सुख मिलता है वहाँ राग और द्वेष शांत हो जाते हैं। सुख के अभाव में ही राग-द्वेष सिर उठाते हैं। जहाँ परम सुख के द्वार खुले, आपको भीतर से आनंद आने लगा तो आपको प्यारे से प्यारे व्यक्ति से मिलने जाना होगा तो आप सोचेंगे कि अभी वह नहीं आया होगा। किसी के साथ शत्रुता हो, उसको सबक सिखाने का कार्यक्रम बनाया हो और आ गये सत्संग में, भीतर का सुख मिलने लगा तो वह कार्यक्रम मोकूफ रह जायेगा। इसीलिए युद्ध में जाते समय साधू, ब्राह्मण, संत, महात्मा का दर्शन अपशकुन माना जाता है क्योंकि संत-महात्मा ब्रह्मचिन्तन में लीन रहते हैं, अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं तो उनके दर्शन से, उनके ‘वायब्रेशन’ (स्पंदन) से आपके अंदर का द्वेष ठण्डा हो जायेगा। द्वेष ठण्डा हो गया तो आप तीव्रता से लड़ोगे नहीं और हार जाओगे। इसीलिए कहा गया है कि युद्ध के समय दर्शन करने मत जाना।

अर्जुन नींद में भी अपने आन्तरिक चिन्तन में मस्त है और श्रीकृष्ण उस आन्तरिक चिन्तन के चिन्तन में मग्न हैं। दोनों की मस्ती देखकर नारद भी वीणा का ताल देते हुए मग्न हो रहे हैं।

इधर रूक्मिणी ने सत्यभामा को भेजा कि देखो तो सही, अर्जुन को बुलाने भगवान गये और उनको बुलाने नारदजी गये ! कोई वापस नहीं आये ! तलाश करो क्या कर रहे हैं?

सत्यभामा ने जाकर वह मधुर दृश्य देखा तो वह मधुर स्वर से गाने लग गई। उसको गाते देखकर श्रीकृष्ण मस्त होकर नाचने लगे।

यह है सततयुक्त व्यक्ति के स्पंदनों का प्रभाव। जो केवल प्राणों से सततयुक्त होता है उसका इतना प्रभाव है तो जो स्वरूप से सततयुक्त हो गया है उसका कितना प्रभाव हो सकता है?

 

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Hari Om

Posted on April 22, 2015, in Satsang and tagged , , , , , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Leave a comment.

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