Author Archives: Asaram Bapu Ji

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andhkar me bapu ne  prakash punj dikhalaya hai

sat sat kare pranam inhe hame satya ka path padhaya hai

hindu muslim sikh ishai ek dhage se jod diye

jago re jogo sara vishwa jagana hai ghar ghar jake ye subh sankalp jagana hai

santo ne jo rah dikhayi usi pe chalte jana hai

hari om hari om

Chetichand Mahotsav – Mahasant Sammelan

chetichand

Chetichand Mahotsav – Mahasant Sammelan

1st April 2014 1.00 pm onwards

Live on Disha Channel 5.00 pm to 7.00 pm

Live on Mangalmay Channel 1.00 pm onwards

Sant Shri Asharamji Ashram, Motera, Sabarmati, Ahmedabad.

Call: 079-39877788, 9033111900.

Jadugar Aanchal, Shri Shiva Bhai, Shri Dhananjay Desai, Shri Shankararacharya Narendracharyaji Maharaj, Shri Keshavanandji Maharaj, Shri Ramabhai

 

 

Upvas Vrat aur Tithi 26th March 2014

26032014-tithi

उपवास और व्रत सुषुप्त उर्जा को जगाने के लिए सुन्दर साधन है |

यौनशोषण के फर्जी एवं फेंकू आरोप

yaun shoshan ke farji arop

जब हिन्दू संतों को बदनाम करना होगा या समाचार चैनलों को खुद की दर्शक संख्या (टी.आर.पी.) बढ़ानी होगी उस समय तो उनके एंकर चीख-चीखकर टी.वी. का पर्दा फाड़ देंगे लेकिन जब वही संत अदालतों द्वारा बेदाग बरी कर दिये जाते हैं उस समय वही मीडिया अपने मुँह में दही जमाकर बैठ जाती हैं। माफीनामा भी पेश करते हैं तो चुपके-चुपके ।

स्वामी नित्यानंद महाराज की सेक्स सी.डी. फर्जी पाये जाने पर न्यायालय ने मीडिया को जमकर लताड़ लगाई थी, उनसे माफीनामा भी दिलवाया गया । पाण्डिच्चेरी की एक अदालत ने शंकर रमन हत्याकांड मामले में कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को निर्दोष बरी कर दिया । संत आसारामजी बापू पर तांत्रिक विधि के आरोप लगे, जिसको सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज करते हुए क्लीनचिट दी थी फिर भी मीडिया इस पर चुप्पी साध गई ।

सुधांशुजी महाराज, डॉ. जयंत आठवले, माता अमृतानन्दमयी, चंद्रास्वामी, सच्चिदानंद महाराज सभी ने कहा की बापूजी पर आरोप झूठे एवं बेबुनियाद है ।

कृपालुजी महाराज , सत्य साई बाबा ,  बाबा राम रहीम, स्वामी केशवानन्द,  नारायण साई  सब पर जूठे आरोप लगाए गये है ।

संत लक्षमणानन्द जी की निर्मम हत्या कर दी गयी ।

संत निगमानन्द जी को जहर दिया गया ।

संत अमृतानन्द जी को बिजली के जटके दिये गये ।

साध्वी प्रज्ञा को विषेले इंजेक्शन दिये गये ।

संत असीमानंद के मूँह में गौमास डाला गया ।

बाबा जयगुरुदेव पर 21 मास तक जैल में अत्याचार किया गया।

और संत सिरोमणि बापू आशाराम जी को झूठे आरोप में जैल डाला गया और जमानत भी ना हो सके इसलिये रोज नये षड्यंत्र कर रहे है ।

पर साँच को आंच नहीं और झूठ को  पैर नहीं, सच सामने आयेगा तब 4 करोड़ साधक से 400 करोड़ साधक हो जायेंगे ।  पूरा ब्रह्मांड देखेगा संत आशाराम जी बापू का जयकारा !!!

MAHA SHIVARATRI

ज्योतिर्नमात्रस्वरुपाय निर्मलज्ञानचक्षुषे |

नमः शिवाय शान्ताय ब्रह्मणे लिंगमूर्तये ||

Jyotirmatraswarupaya normaljnanachakshushe |

Namah Shivaya shantaya brahamane lingamurtaye ||

“I bow before the auspicious Lord Shiva, an embodiment of Supreme peace, whose form is divinely effulgent, whose eyes are but pure knowledge, who is the Supreme Being in the form of a ‘Shivling’ (an oval shaped idol of Shiva).”

In the ‘Brahmottar Khand’ of the ‘Skanda Purana’, describing the significance of observing a fast and jagran on Shivratri, Sutaji expounded to the Rishis,

“It is a rare opportunity to observe a fast on the fourteenth moon day of the dark half of the month of Magha (Hindi month Phalguna). I feel it is still rare for human beings to keep awake on the night of Shivratri. The darshan of a Shivling and worship of Lord Shiva on this day, I believe, is even rarer.”

One gains an opportunity to worship Lord Shiva with ‘bilva patra’ (Sacred leaves used for worship of Lord Shiva) only when the punyas (Merits) of a billion lives fructify. The same punyas one earns through bathing in the Ganges for ten thousand years as are earned by worshipping Lord Shiva with ‘bilva patra’ for just once. The punyas that have gradually vanished from the world in every following age are fully present in the fourteenth moon day of the dark half of the month of Magha i.e., on the day of Shivratri. Lord Brahma and other Gods as well as Munis like Vashishtha wholeheartedly praise this day of chaturdashi.

If one observes a fast on this extolled day of Shivratri, one acquires even more punyas than those earned by performing 100 yajnas (Sacrifice, an ancient Hindu institution of religious sacrifice and oblation). ”Who in the three worlds can verily match the punya of a person who has worshipped the Shivling with just one bilva patra?’

शिवरात्रि के दिन देशी घी का दिया जला कर ‘बं‘ बीजमंत्र का सवा लाख जप करना बहुत हितकारी है | यह मंत्र शुद्ध, सात्विक भावनाओं को सफल करने में बड़ा सहयोग देगा | हो सके तो एकांत में शिवजी का विधिवत् पूजन करें या मानसिक पूजन करें | सवा लाख बार बंका उच्चारण भिन्न-भिन्न सफलताएँ प्राप्त करने में मदद करेगा | जोड़ों का दर्द, वमन, कफ एवं वायुजन्य बीमारियों, डायबिटीज आदि में यह लाभ पहुँचाता है | बीजमंत्र स्थूल शरीर को फायदा पहुँचाते ही हैं, साथ ही सूक्ष्म और कारण शरीर पर भी अपना दिव्य प्रभाव डालते हैं |

Shri Vedamrit 17th February 2014

Shri Vedamrit 17th February 2014

Hrugved: 1.89.2 – Chhota Bengan – Katahari – Dwitiya Tithi – Brahmavaivart Puran – Brahm.: 27.29-34 – Daibetes ke gharelu ilaj Karela se – Om.

108 महा कुंडी यज्ञ ओर 1008 श्री आशारामायण पाठ

108 महा कुंडी यज्ञ ओर 1008 श्री आशारामायण पाठ

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[audio http://www.ashram.org/Portals/9/Audio/Paath/01-Shree-Asaramayan-Path-1.mp3 ]

बंदऊँ गुरु पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती।।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।
नयन अमिअ दृग दोष विभंजन।।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई।
जौं बिरंचि संकर सम होइ।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

श्री आशारामायण

गुरु चरण रज शीष धरि, हृदय रूप विचार।
श्रीआशारामायण कहौं, वेदान्त को सार।।
धर्म कामार्थ मोक्ष दे, रोग शोक संहार।
भजे जो भक्ति भाव से, शीघ्र हो बेड़ा पार।।

भारत सिंधु नदी बखानी, नवाब जिले में गाँव बेराणी।
रहता एक सेठ गुण खानि, नाम थाऊमल सिरुमलानी।।
आज्ञा में रहती मेंहगीबा, पतिपरायण नाम मंगीबा।
चैत वद छः उन्नीस अठानवे, आसुमल अवतरित आँगने।।
माँ मन में उमड़ा सुख सागर, द्वार पै आया एक सौदागर।
लाया एक अति सुन्दर झूला, देख पिता मन हर्ष से फूला।।
सभी चकित ईश्वर की माया, उचित समय पर कैसे आया।
ईश्वर की ये लीला भारी, बालक है कोई चमत्कारी।।
संत की सेवा औ’ श्रुति श्रवण, मात पिता उपकारी।
धर्म पुरुष जन्मा कोई, पुण्यों का फल भारी।।

सूरत थी बालक की सलोनी, आते ही कर दी अनहोनी।
समाज में थी मान्यता जैसी, प्रचलित एक कहावत ऐसी।।
तीन बहन के बाद जो आता, पुत्र वह त्रेखन कहलाता।
होता अशुभ अमंगलकारी, दरिदता लाता है भारी।।
विपरीत किंतु दिया दिखाई, घर में जैसे लक्ष्मी आयी।
तिरलोकी का आसन डोला, कुबेर ने भंडार ही खोला।
मान प्रतिष्ठा और बड़ाई, सबके मन सुख शांति छाई।।
तेजोमय बालक बढ़ा, आनन्द बढ़ा अपार।
शील शांति का आत्मधन, करने लगा विस्तार।।

एक दिना थाऊमल द्वारे, कुलगुरु परशुराम पधारे।
ज्यूँ ही बालक को निहारे, अनायास ही सहसा पुकारे।।
यह नहीं बालक साधारण, दैवी लक्षण तेज है कारण।
नेत्रों में है सात्विक लक्षण, इसके कार्य बड़े विलक्षण।।
यह तो महान संत बनेगा, लोगों का उद्धार करेगा।
सुनी गुरु की भविष्यवाणी, गदगद हो गये सिरुमलानी।
माता ने भी माथा चूमा, हर कोई ले करके घूमा।।

ज्ञानी वैरागी पूर्व का, तेरे घर में आय।
जन्म लिया है योगी ने, पुत्र तेरा कहलाय।।
पावन तेरा कुल हुआ, जननी कोख कृतार्थ।
नाम अमर तेरा हुआ, पूर्ण चार पुरुषार्थ।।

सैतालीस में देश विभाजन, पाक में छोड़ा भू पशु औ’ धन।
भारत अमदावाद में आये, मणिनगर में शिक्षा पाये।।
बड़ी विलक्षण स्मरण शक्ति, आसुमल की आशु युक्ति।
तीव्र बुद्धि एकाग्र नम्रता, त्वरित कार्य औ’ सहनशीलता।।
आसुमल प्रसन्न मुख रहते, शिक्षक हँसमुखभाई कहते।
पिस्ता बादाम काजू अखरोटा, भरे जेब खाते भर पेटा।।
दे दे मक्खन मिश्री कूजा, माँ ने सिखाया ध्यान औ’ पूजा।
ध्यान का स्वाद लगा तब ऐसे, रहे न मछली जल बिन जैसे।।
हुए ब्रह्मविद्या से युक्त वे, वही है विद्या या विमुक्तये।
बहुत रात तक पैर दबाते, भरे कंठ पितु आशीष पाते।।

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम।
लोगों के तुम से सदा, पूरण होंगे काम।।

सिर से हटी पिता की छाया, तब माया ने जाल फैलाया।
बड़े भाई का हुआ दुःशासन, व्यर्थ हुए माँ के आश्वासन।।
छूटा वैभव स्कूली शिक्षा, शुरु हो गयी अग्नि परीक्षा।
गये सिद्धपुर नौकरी करने, कृष्ण के आगे बहाये झरने।।
सेवक सखा भाव से भीजे, गोविन्द माधव तब रीझे।
एक दिन एक माई आई, बोली हे भगवन सुखदाई।।
पड़े पुत्र दुःख मुझे झेलने, खून केस दो बेटे जेल में।
बोले आसु सुख पावेंगे, निर्दोष छूट जल्दी आवेंगे।
बेटे घर आये माँ भागी, आसुमल के पाँवों लागी।।

आसुमल का पुष्ट हुआ, अलौकिक प्रभाव।
वाकसिद्धि की शक्ति का, हो गया प्रादुर्भाव।।

बरस सिद्धपुर तीन बिताये, लौट अमदावाद में आये।
करने लगी लक्ष्मी नर्तन, किया भाई का दिल परिवर्तन।।
दरिद्रता को दूर कर दिया, घर वैभव भरपूर कर दिया।
सिनेमा उन्हें कभी न भाये, बलात् ले गये रोते आये।।
जिस माँ ने था ध्यान सिखाया, उसको ही अब रोना आया।
माँ करना चाहती थी शादी, आसुमल का मन वैरागी।।
फिर भी सबने शक्ति लगाई, जबरन कर दी उनकी सगाई।
शादी को जब हुआ उनका मन, आसुमल कर गये पलायन।।

पंडित कहा गुरु समर्थ को, रामदास सावधान।
शादी फेरे फिरते हुए, भागे छुड़ाकर जान।।

करत खोज में निकल गया दम, मिले भरूच में अशोक आश्रम।
कठिनाई से मिला रास्ता, प्रतिष्ठा का दिया वास्ता।।
घर में लाये आजमाये गुर, बारात ले पहुँचे आदिपुर।
विवाह हुआ पर मन दृढ़ाया, भगत ने पत्नी को समझाया।।
अपना व्यवहार होगा ऐसे, जल में कमल रहता है जैसे।
सांसारिक व्यौहार तब होगा, जब मुझे साक्षात्कार होगा।
साथ रहे ज्यूँ आत्माकाया, साथ रहे वैरागी माया।।

अनश्वर हूँ मैं जानता, सत चित हूँ आनन्द।
स्थिति में जीने लगूँ, होवे परमानन्द।।

मूल ग्रंथ अध्ययन के हेतु, संस्कृत भाषा है एक सेतु।
संस्कृत की शिक्षा पाई, गति और साधना बढ़ाई।।
एक श्लोक हृदय में पैठा, वैराग्य सोया उठ बैठा।
आशा छोड़ नैराश्यवलंबित, उसकी शिक्षा पूर्ण अनुष्ठित।।
लक्ष्मी देवी को समझाया, ईश प्राप्ति ध्येय बताया।
छोड़ के घर मैं अब जाऊँगा, लक्ष्य प्राप्त कर लौट आऊँगा।।
केदारनाथ के दर्शन पाये, लक्षाधिपति आशिष पाये।
पुनि पूजा पुनः संकल्पाये, ईश प्राप्ति आशिष पाये।।
आये कृष्ण लीलास्थली में, वृन्दावन की कुंज गलिन में।
कृष्ण ने मन में ऐसा ढाला, वे जा पहुँचे नैनिताला।।
वहाँ थे श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठित, स्वामी लीलाशाह प्रतिष्ठित।
भीतर तरल थे बाहर कठोरा, निर्विकल्प ज्यूँ कागज कोरा।
पूर्ण स्वतंत्र परम उपकारी, ब्रह्मस्थित आत्मसाक्षात्कारी।।

ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान।।

जानने को साधक की कोटि, सत्तर दिन तक हुई कसौटी।
कंचन को अग्नि में तपाया, गुरु ने आसुमल बुलवाया।।
कहा गृहस्थ हो कर्म करना, ध्यान भजन घर ही करना।
आज्ञा मानी घर पर आये, पक्ष में मोटी कोरल धाये।।
नर्मदा तट पर ध्यान लगाये, लालजी महाराज आकर्षाये।
सप्रेम शीलस्वामी पहँ धाये, दत्तकुटीर में साग्रह लाये।।
उमड़ा प्रभु प्रेम का चसका, अनुष्ठान चालीस दिवस का।
मरे छः शत्रु स्थिति पाई, ब्रह्मनिष्ठता सहज समाई।।
शुभाशुभ सम रोना गाना, ग्रीष्म ठंड मान औ’ अपमाना।
तृप्त हो खाना भूख अरु प्यास, महल औ’ कुटिया आसनिरास।
भक्तियोग ज्ञान अभ्यासी, हुए समान मगहर औ’ कासी।।

भव ही कारण ईश है, न स्वर्ण काठ पाषान।
सत चित्त आनंदस्वरूप है, व्यापक है भगवान।।
ब्रह्मेशान जनार्दन, सारद सेस गणेश।
निराकार साकार है, है सर्वत्र भवेश।।

हुए आसुमल ब्रह्माभ्यासी, जन्म अनेकों लागे बासी।
दूर हो गई आधि व्याधि, सिद्ध हो गई सहज समाधि।।
इक रात नदी तट मन आकर्षा, आई जोर से आँधी वर्षा।
बंद मकान बरामदा खाली, बैठे वहीं समाधि लगा ली।।
देखा किसी ने सोचा डाकू, लाये लाठी भाला चाकू।
दौड़े चीखे शोर मच गया, टूटी समाधि ध्यान खिंच गया।।
साधक उठा थे बिखरे केशा, राग द्वेष ना किंचित् लेशा।
सरल लोगों ने साधु माना, हत्यारों ने काल ही जाना।।
भैरव देख दुष्ट घबराये, पहलवान ज्यूँ मल्ल ही पाये।
कामीजनों ने आशिक माना, साधुजन कीन्हें परनामा।।

एक दृष्टि देखे सभी, चले शांत गम्भीर।
सशस्त्रों की भीड़ को, सहज गये वे चीर।।

माता आई धर्म की सेवी, साथ में पत्नी लक्ष्मी देवी।
दोनों फूट-फूट के रोई, रुदन देख करुणा भी रोई।।
संत लालजी हृदय पसीजा, हर दर्शक आँसू में भीजा।
कहा सभी ने आप जाइयो, आसुमल बोले कि भाइयों।।
चालीस दिवस हुआ न पूरा, अनुष्ठान है मेरा अधूरा।
आसुमल ने छोड़ी तितिक्षा, माँ पत्नी ने की परतीक्षा।।
जिस दिन गाँव से हुई विदाई, जार जार रोय लोग-लुगाई।
अमदावाद को हुए रवाना, मियाँगाँव से किया पयाना।।
मुंबई गये गुरु की चाह, मिले वहीं पै लीलाशाह।
परम पिता ने पुत्र को देखा, सूर्य ने घटजल में पेखा।।
घटक तोड़ जल जल में मिलाया, जल प्रकाश आकाश में छाया।
निज स्वरूप का ज्ञान दृढ़ाया, ढाई दिवस होश न आया।।

आसोज सुद दो दिवस, संवत् बीस इक्कीस।
मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।
देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।
हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार।।

परम स्वतंत्र पुरुष दर्शाया, जीव गया और शिव को पाया।
जान लिया हूँ शांत निरंजन, लागू मुझे न कोई बन्धन।।
यह जगत सारा है नश्वर, मैं ही शाश्वत एक अनश्वर।
दीद हैं दो पर दृष्टि एक है, लघु गुरु में वही एक है।।
सर्वत्र एक किसे बतलाये, सर्वव्याप्त कहाँ आये जाये।
अनन्त शक्तिवाला अविनाशी, रिद्धि सिद्धि उसकी दासी।।
सारा ही ब्रह्माण्ड पसारा, चले उसकी इच्छानुसारा।
यदि वह संकल्प चलाये, मुर्दा भी जीवित हो जाये।।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे ना शेष।
मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।
पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।
आसुमल से हो गये, साँई 
आशाराम।।

जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति चेते, ब्रह्मानन्द का आनन्द लेते।
खाते पीते मौन या कहते, ब्रह्मानन्द मस्ती में रहते।।
रहो गृहस्थ गुरु का आदेश, गृहस्थ साधु करो उपदेश।
किये गुरु ने वारे न्यारे, गुजरात डीसा गाँव पधारे।
मृत गाय दिया जीवन दाना, तब से लोगों ने पहचाना।।
द्वार पै कहते नारायण हरि, लेने जाते कभी मधुकरी।
तब से वे सत्संग सुनाते, सभी आर्ती शांति पाते।।
जो आया उद्धार कर दिया, भक्त का बेड़ा पार कर दिया।
कितने मरणासन्न जिलाये, व्यसन मांस और मद्य छुड़ाये।।

एक दिन मन उकता गया, किया डीसा से कूच।
आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक।।

वे नारेश्वर धाम पधारे, जा पहुँचे नर्मदा किनारे।
मीलों पीछे छोड़ा मन्दर, गये घोर जंगल के अन्दर।।
घने वृक्ष तले पत्थर पर, बैठे ध्यान निरंजन का घर।
रात गयी प्रभात हो आई, बाल रवि ने सूरत दिखाई।।
प्रातः पक्षी कोयल कूकन्ता, छूटा ध्यान उठे तब संता।
प्रातर्विधि निवृत्त हो आये, तब आभास क्षुधा का पाये।।
सोचा मैं न कहीं जाऊँगा, यहीं बैठकर अब खाऊँगा।
जिसको गरज होगी आयेगा, सृष्टिकर्त्ता खुद लायेगा।।
ज्यूँ ही मन विचार वे लाये, त्यूँ ही दो किसान वहाँ आये।
दोनों सिर बाँधे साफा, खाद्यपेय लिये दोनों हाथा।।
बोले जीवन सफल है आज, अर्घ्य स्वीकारो महाराज।
बोले संत और पै जाओ, जो है तुम्हारा उसे खिलाओ।।
बोले किसान आपको देखा, स्वप्न में मार्ग रात को देखा।
हमारा न कोई संत है दूजा, आओ गाँव करें तुमरी पूजा।।
आशाराम तब में धारे, निराकार आधार हमारे।
पिया दूध थोड़ा फल खाया, नदी किनारे जोगी धाया।।

गाँधीनगर गुजरात में, है मोटेरा ग्राम।
ब्रह्मनिष्ठ श्री संत का, यहीं है पावन धाम।।
आत्मानंद में मस्त हैं, करें वेदान्ती खेल।
भक्तियोग और ज्ञान का, सदगुरु करते मेल।।

साधिकाओं का अलग, आश्रम नारी उत्थान।
नारी शक्ति जागृत सदा, जिसका नहीं बयान।।

बालक वृद्ध और नरनारी, सभी प्रेरणा पायें भारी।
एक बार जो दर्शन पाये, शांति का अनुभव हो जाये।।
नित्य विविध प्रयोग करायें, नादानुसन्धान बतायें।
नाभ से वे ओम कहलायें, हृदय से वे राम कहलायें।।
सामान्य ध्यान जो लगायें, उन्हें वे गहरे में ले जायें।
सबको निर्भय योग सिखायें, सबका आत्मोत्थान करायें।।
हजारों के रोग मिटाये, और लाखों के शोक छुड़ाये।
अमृतमय प्रसाद जब देते, भक्त का रोग शोक हर लेते।।
जिसने नाम का दान लिया है, गुरु अमृत का पान किया है।
उनका योग क्षेम वे रखते, वे न तीन तापों से तपते।।
धर्म कामार्थ मोक्ष वे पाते, आपद रोगों से बच जाते।
सभी शिष्य रक्षा पाते हैं, सूक्ष्म शरीर गुरु आते हैं।।
सचमुच गुरु हैं दीनदयाल, सहज ही कर देते हैं निहाल।
वे चाहते सब झोली भर लें, निज आत्मा का दर्शन कर लें।।
एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे।
गंगाराम शील है दासा, होंगी पूर्ण सभी अभिलाषा।।

वराभयदाता सदगुरु, परम हि भक्त कृपाल।
निश्छल प्रेम से जो भजे, साँई करे निहाल।।
मन में नाम तेरा रहे, मुख पे रहे सुगीत।
हमको इतना दीजिए, रहे चरण में प्रीत।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

श्री गुरु-महिमा

गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिटे न भेद।
गुरु बिन संशय न मिटे, जय जय जय गुरुदेव।।
तीरथ का है एक फल, संत मिले फल चार।
सदगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार।।
भव भ्रमण संसार दुःख, ता का वार ना पार।
निर्लोभी सदगुरु बिना, कौन उतारे पार।।
पूरा सदगुरु सेवतां, अंतर प्रगटे आप।
मनसा वाचा कर्मणा, मिटें जन्म के ताप।।
समदृष्टि सदगुरु किया, मेटा भरम विकार।
जहँ देखो तहँ एक ही, साहिब का दीदार।।
आत्मभ्रांति सम रोग नहीं, सदगुरु वैद्य सुजान।
गुरु आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान।।
सदगुरु पद में समात हैं, अरिहंतादि पद सब।
तातैं सदगुरु चरण को, उपासौ तजि गर्व।।
बिना नयन पावे नहीं, बिना नयन की बात।
सेवे सदगुरु के चरण, सो पावे साक्षात्।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

(गुजराती)

जेह स्वरूप समज्या विना, पाम्यो दुःख अनंत।
समजाव्युं ते पद नमुं, श्री सदगुरु भगवंत।।
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत।
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वन्दन अगणित।।
गुरु दीवो गुरु देवता, गुरु विण घोर अँधार।
जे गुरुवाणी वेगळा, रडवड़िया संसार।।
परम पुरुष प्रभु सदगुरु, परम ज्ञान सुखधाम।
जेणे आप्युं भान निज, तेने सदा प्रणाम।।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

श्री नारायण साईं जी के जन्मोत्सव की खूब खूब बधाई !!

श्री नारायण साईं जी के जन्मोत्सव की खूब खूब बधाई !!

२९ जनवरी : बापुनंदन श्रद्धेय श्री नारायण साईं जी के जन्मोत्सव की खूब खूब बधाई !!

Ramgopalji Maharaj – Matri Devo Bhav

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Sant Asharamji Bapu – Aaj Ke Darshan

Sant Asharamji Bapu - Aaj Ke Darshan

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