Category Archives: Suvachan

Vows which can be taken during Guru-Purnima

समस्त साधक परिवार को गुरु पूर्णिमा की बधाइयाँ 

 

Man either make progress or slides downwards. It is good to make progress but to save himself from sliding down, the sadhaka should submit to some Sattvik vows.

Take some pious vows for daily observations in your life.Write the vows on a piece of paper.

 

 

To make the mind serious in observance of the vows, touch the paper to the Barhdada (sacred banyan tree in the Ashram infused with divine potency by Pujya Bapuji) or to the rostrum (व्यासपीठ from where Pujya Bapuji delivers satsang) and keep it with you.

 

You can touch the paper to the place where you offer prayers or meditate at your house.

Take some vow like-

  • ‘I will do japa for so many counts of the rosary;
  • I will do so many Pranayamas;
  • I will observe silence for so many hours in the week,
  • I will reserve one, two, or five days in a month for intensive spiritual practice;
  • I will live in complete solitude for so many days in the year;
  • I will spend so many days in the year for spreading the messages of dharma;
  • I will employ my time and resources in Gurudev’s divine endeavours in order to propitiate Him and to attain to the Supreme State…’

If  the sadhaka takes some pious vow of this nature on the Vyas Purnima day desiring to see Maharshi Veda Vyasji in the form of a God-realized saint adorn the throne in his heart, his effort will be aided by the good wishes of gods and the grace of Gurus and his goal will be accomplished sooner rather than later.

There is improvement at times and deterioration at others in one’s spiritual orientation; one happens to be in good company at times and in bad company at others. The animate beings other than man are subjected to bearing the fruits of their past actions but God has given some freedom to man. Man can go up also and he can slide down as well. He should try to make progress but should definitely strive not to slide down and to that end should observe some pious vows in life.
The true and worthy disciples apply themselves whole-heartedly in body and mind to worshipping the Guru. If the disciple maintains the attributes required of a disciple, the gift of assimilating Guru’s spiritual experiences is bestowed upon him. If the Guru is a true Guru and maintains the attributes of a Guru, he can bless his disciples with the gift of realization.

Those who deserve to be granted the gift of God-realization are sadhakas or disciples and those who are capable of granting such true such gift are Gurus. The congregation of such true disciples and Satgurus is the festival of Vyas Purnima.

On this day,

  • the sadhaka takes moderate and light food like milk and fruits and
  • with the help of activities, selfless service,
  • remembrance of God,
  • observing silence(मौन) etc.

makes a firm resolve to awaken his latent potencies (शुषुप्त शक्ति).

By and by as he is blessed with the gift of realization within, he becomes sinless. This is a festival of becoming sinless of being blessed with the gift of realization within and in due course of time of bridging the gap between Guru and disciple, God and the devotee, breaking the cycle of birth and death and realizing the Supreme Consciousness, the Ulitmate Truth beyond the power of nature.

Advertisements

हिमालय की तरह दृढ़ होकर . . . .

 

himalay vedic inspiration  hindu win asharam bapu

 

 

हिमालय की तरह दृढ़ होकर अपनी रुकावटों को काटो।
यह विश्वास रखो कि जो सोचूँगा वही हो जाऊँगा। सत्यसंक्लप आत्मा तुम्हारे साथ है….
नहीं नहीं, तुम ही सत्यसंकल्प आत्मा हो।
उठो, अपनी शक्ति को पहचानो।
तमाम शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं।
यह ख्याल न करो कि तमाम चीजें पहले इकट्ठी हों, बाद में मैं आगे बढ़ूँ। बल्कि दृढ़ संकल्प करो अपने परम लक्ष्य को हासिल करने का।
चीजें अपने-आप तुम्हारे कदम चूमेंगी।
क्या आप सुख चाहते हैं?…
तो विषय भोग से सुख मिलेगा यह कल्पना मन से निकाल दीजिये। उसमें बड़ी पराधीनता है। पराधीनता दुःख है। भोग्य वस्तु चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, कभी मिलेगी कभी नहीं।
इन्द्रियों में भोग का सामर्थ्य सदा नहीं रहेगा। मन में एक-सी रूचि भी नहीं होगी। योग-वियोग, शत्रु-मित्र, कर्म-प्रकृति आदि उसमें बाधक हो सकते हैं। यदि विषयभोग में आप सुख को स्थापित कर देंगे तो निश्चय ही आपको परवश और दुःखी होना पड़ेगा।

— पूज्य बापूजी

 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम !

hanumant

रामावतार को लाखों वर्ष हो गये लेकिन श्रीरामजी अभी भी जनमानस के हृदय-पटल से विलुप्त नहीं हुए। क्यों? क्योंकि श्रीरामजी का आदर्श जीवन, उनका आदर्श चरित्र हर मनुष्य के लिए अनुकरणीय है।

एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श पिता, आदर्श शिष्य, आदर्श योद्धा और आदर्श राजा के रूप में यदि किसीका नाम लेना हो तो भगवान श्रीरामजी का ही नाम सबकी जुबान पर आता है। इसीलिए राम-राज्य की महिमा आज लाखों-लाखों वर्षों के बाद भी गायी जाती है।

shri ram with mata        shri ram janm

भगवान श्रीरामजी के सद्गुण ऐसे तो विलक्षण थे कि पृथ्वी के प्रत्येक धर्म, सम्प्रदाय और जाति के लोग उन सद्गुणों को अपनाकर लाभान्वित हो सकते हैं।

श्रीरामजी सारगर्भित बोलते थे। उनसे कोई मिलने आता तो वे यह नहीं सोचते थे कि पहले वह बात शुरू करे या मुझे प्रणाम करे। सामनेवाले को संकोच न हो इसलिए श्रीरामजी अपनी तरफ से ही बात शुरू कर देते थे।

shri ram gurukul

श्रीरामजी दूसरों की बात बड़े ध्यान व आदर से सुनते थे। बोलनेवाला जब तक अपने और औरों के अहित की बात नहीं कहता, तब तक वे उसकी बात सुन लेते थे। जब वह किसीकी निंदा आदि की बात करता तब देखते कि इससे इसका अहित होगा या इसके चित्त का क्षोभ बढ़ जायेगा या किसी दूसरे की हानि होगी, तब वे सामनेवाले की बातों को सुनते-सुनते इस ढंग से बात मोड़ देते कि बोलनेवाले का अपमान नहीं होता था।

युद्ध के मैदान में श्रीरामजी एक बाण से रावण के रथ को जला देते, दूसरा बाण मारकर उसके हथियार उड़ा देते फिर भी उनका चित्त शांत और सम रहता था। वे रावण से कहते : ‘लंकेश! जाओ, कल फिर तैयार होकर आना।’

ऐसा करते-करते काफी समय बीत गया तो देवताओं को चिंता हुई कि रामजी को क्रोध नहीं आता है, वे तो समता-साम्राज्य में स्थिर हैं, फिर रावण का नाश कैसे होगा? लक्ष्मणजी, हनुमानजी आदि को भी चिंता हुई, तब दोनों ने मिलकर प्रार्थना की : ‘प्रभु! थोड़े कोपायमान होइये।’

vivah   vanvas

तब श्रीरामजी ने क्रोध का आवाहन किया : क्रोधं आवाहयामि। ‘क्रोध! अब आ जा।’

श्रीरामजी क्रोध का उपयोग तो करते थे किंतु क्रोध के हाथों में नहीं आते थे। हम लोगों को क्रोध आता है तो क्रोधी हो जाते हैं, लोभ आता है तो लोभी हो जाते हैं, मोह आता है तो मोही हो जाते हैं, शोक आता है तो शोकातुर हो जाते हैं लेकिन श्रीरामजी को जिस समय जिस साधन की आवश्यकता होती थी, वे उसका उपयोग कर लेते थे।

श्रीरामजी का अपने मन पर बड़ा विलक्षण नियंत्रण था। सामनेवाला व्यक्ति अपने ढंग से सोचता है, अपने ढंग से जीता है, अतः वह आपके साथ अनुचित व्यवहार कर सकता है परंतु उसके ऐसे व्यवहार से अशांत होना-न होना आपके हाथ की बात है। यह जरूरी नहीं है कि सब लोग आपके मन के अनुरूप ही जियें।

hanuman 4         hanuman 1

 

श्रीरामजी अर्थव्यवस्था में भी निपुण थे। ‘शुक्रनीति’ और ‘मनुस्मृति’ में भी आया है कि जो धर्म, संग्रह, परिजन और अपने लिए – इन चार भागों में अर्थ की ठीक से व्यवस्था करता है वह आदमी इस लोक और परलोक में सुख-आराम पाता है। कई लोग लोभ-लालच में इतना अर्थसंग्रह कर लेते हैं कि वही अर्थ उनके लिए अनर्थ का कारण हो जाता है और कई लोग इतने खर्चीले हो जाते हैं कि कमाया हुआ सब धन उड़ा देते हैं, फिर कंगालियत में जीते हैं। श्रीरामजी धन के उपार्जन में भी कुशल थे और उपयोग में भी। जैसे मधुमक्खी पुष्पों को हानि पहुँचाये बिना उनसे परागकण ले लेती है, ऐसे ही श्रीरामजी प्रजा से ऐसे ढंग से कर (टैक्स) लेते कि प्रजा पर बोझ नहीं पड़ता था। वे प्रजा के हित का चिंतन तथा उसके भविष्य का सोच-विचार करके ही कर लेते थे।

hanuman 2


प्रजा के संतोष तथा विश्वास-सम्पादन के लिए श्रीरामजी राज्यसुख, गृहस्थसुख और राज्यवैभव का त्याग करने में भी संकोच नहीं करते थे। इसीलिए श्रीरामजी का राज्य आदर्श राज्य माना जाता है।

 

 

शहद सेवन से फायदे ही फायदे

the-amazing-benefits-of-honey1

शहद खाने में जितना मीठा होता है, उससे कहीं ज्यादा ये हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होता है ! इसमें पाए जाने वाले विटामिन ए, बी और सी हमें सेहतमंद रखने में कारगर साबित होतेहैं !

आज हम आपको शहद खाने के क्या-क्या फायदे होते हैं, उसके बारे में बताने जा रहे हैं !

शहद का प्रयोग जहां आंखों की रोशनी बढ़ाने तथा कफ एवं अस्थमा और उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में कारगर सिद्ध हुआ है, वहीं रक्त शुद्धि तथा दिल को मजबूत करने में भी सहायक है ! सर्दियों में कफ और गला खराब होने की समस्याओं से निपटने में शहद बहुत मददगार है। खासतौर पर बच्चों के लिए ठंड में शहद का सेवन उन्हें पूरे मौसम में कफ और गले की समस्याओं से बचाकर रखता है।इसके सेवन से नींद भी अच्छी आती है।

1) छोटे बच्चों को दूध पिलाने से पहले शहद चटा दें। फिर दूध पिलाएं ये रोग निरोधक क्षमता बढ़ाता है।

2) बेसन, मलाई में शहद मिलाकर त्वचा पर लगाएं। थोड़ी देर बाद धो लें, चेहरा चमक उठेगा ।

3) प्रतिदिन 25 ग्राम शहद दूध के साथ जरूर लें । इससे शरीर को ताकत मिलती है।

4) त्वचा सम्बन्धी रोग हो या कहीं जल-कट गया हो तो शहद लगाएं। जादू सा असर दिखाई देगा।

5) रात को सोने से पहले दूध के साथ शहद लेने पर बहुत अच्छी नींद आती है।

6) दूध में शक्कर की जगह शहद लेने से गैस नहीं बनती और पेट के कीड़े भी निकल जाते हैं।

7) सूखी खाँसी में शहद व नींबू का रस समान मात्रा में सेवन करने पर लाभ होता है।

8) अदरक का रस और शहद समान मात्रा में लेकर चाटने से श्वास कष्ट दूर होता है और हिचकियाँ बंद हो जाती हैं।

शांतात्मा को दुख कहाँ – पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

Amrit Bindu -- Aakhir Kya Kaam Aayega

मनुष्य का अपना क्या है ?

Slide2                    Slide3 Slide4                     Slide5

 

This slideshow requires JavaScript.

Slide6

%d bloggers like this: