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Antahkaran ke 3 dosh kya aur kaise door karen

 

अंतःकरण के तीन दोष कैसे दूर करें ?

परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की अमृतवाणी

सत्संग के मुख्य अंश :

* अन्तःकरण के तीन दोषों को वेदांत की भाषा में मल बोलते है |

* मल माना आगे पीछे का सोचे बिना मज़ा करो ,गन्दगी है |

* मल को दूर करने केलिए धर्म ,कर्म,नियम | वासना को नियंत्रित करने के लिए धर्म है |

* मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान का महत्त्व है |

* ध्यान से योग्यता बढ़ती है लेकिन जीव भाव बना रहता है |

* मल को मिटाने के लिए शुद्ध कर्म,चंचलता को मिटाने के लिए ध्यान-एकाग्रता लेकिन अज्ञान को मिटाने के लिए आत्मज्ञान की जरुरत पड़ती है |

There are 3 faults of ANTAHKARAN (inner instrument) . They are called MAL (Bad) in language of Vedanta.
Mal means whatever comes in mind,  eats, drink and have fun.Do not think about past and results. Have fun in present. Like a moth which gets burned in the flame just for pleasure this is Senselessness, is mal.
It is foolishness. The Mal means fault in understanding. That is called mal. DHARAMKARAMNIYAM (Religion – Act – regulation) is to remove mal. DHARAM (religion) is to control desires.
And to concentrate mind and to get  (spiritual) powers DHYAN (MEDITATION) is very important.
But DHYAN (meditation) increases abilities, gets strength, personality remains, JEEV BHAV (body gesture) exists.
If personality remains than he/she will use power of DHYAN for enjoyment,will use it to praise of himself/ herself and will use it up. Again consciousness is required and pure deeda to remove mal,
DHYAN (Meditation) and concentration to remove fickleness, but self-consciousness to remove ignorance.
My Guruji used to say –
Dirt in the house will be removed only by sweeping, but the holes of house can be removed only by filling with cement-concrete.
Darkness won’t removed by cow-dung or cement or sweeping.
That darkness can be removed only by lighting. Utterly certain true thing
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To Hell Do They Go

-Param Pujya Sri Lilashahji Maharaj

 

leelashah ji

Be humane. Learn to cultivate humanistic qualities. One who is humane listens to the good of all and does good to all. 
Sant Meera has said:
Those who defame us, to Hell do they go.
To Hell they go, cleansing our sins
The man not knowing himself, gets engaged in knowing others: “This is like that…he is like that…” Knowing oneself means knowing the Atman. One who knows the Atman is rare.
Every body says, “I am right.” You would ask: “Swamiji! Is this (knowing oneself) so important?” Yes, sure! One, who has not known his own Self, how can he know others? He isa mere animal.Having obtained the human form, if you have not awakened your real nature, not kindled the Light of Knowledge in your heart, not known your real Self, then what have you achieved by coming into this world? The real good of man lies in knowing his true Self.By indulging in calumny, hatred, deceit and trickery you are harming yourself and the society. And God knows how many wombs you will enter to reap the fruits of calumny and deceit.
It is said:One, who has no deceit in the mind, who is sincere and honest, such a saintly soul can transcend the ocean of samsara, so says the poet Narayana.Calumny and praise bind the jiva. Therefore, living in the company of the God-loving saints and listening to their satsang, know thyself. This will relieve you from the miseries of birth and death forever
Rishi Prasad ,194,February 2009

समझदारी की पगडंडी – कुप्रचार से सावधान

सच्चे ज्ञानी इस समझदारी को साथ रखते हुए ही अपने रास्ते पर चलते रहते हैं, किन्तु किसी अकल्पनीय कारण से उनके टीकाकार या विरोधी अपना गलत रास्ता नहीं छोड़ते। उन अभागों की मनोदशा ही ऐसी होती है। भर्तृहरि ने कहा है कि जैसे कुत्ता हड्डी चबाता है, उसके मसूड़ों में से रक्त निकलता है और ऐसे लगता है मानो उस हड्डी में से निकला हुआ रक्त उसे स्वाद दे रहा है। इसी प्रकार निन्दा करने वाला व्यक्ति भी किसी दूसरे का बुरा करने के प्रयत्न के साथ विकृत मज़ा लेने का प्रयत्न करता है। इस क्रिया में बोलने वाले के साथ सुनने वाले का भी सत्यानाश होता है। निन्दा एक प्रकार का तेजाब है। वह देने वाले की तरह लेने वाले को भी जलाता है।

ज्ञानी का ज्ञानदीप सर्वत्र प्रकाश फैलाता है, किन्तु मनुष्य तो आँख मूँदकर बैठा है। उस पर इस प्रकाश को कोई असर नहीं होता। ऐसा आदमी दूसरे को भी सलाह देता है कि तुम भी आँखें बन्द कर लो। इस प्रकार वह दूसरे को भी सत्संग के प्रकाश से दूर रखता है।

समाज व राष्ट्र में व्याप्त दोषों के मूल को देखा जाये तो सिवाय अज्ञान के उसका अन्य कोई कारण ही नहीं निकलेगा और अज्ञान तब तक बना ही रहता है जब तक कि किसी अनुभवनिष्ठ ज्ञानी महापुरुष का मार्गदर्शन लेकर लोग उसे सच्चाई से आचरण में नहीं उतारते।

समाज जब ऐसे किसी ज्ञानी संतपुरुष का शरण, सहारा लेने लगता है तब राष्ट्र, धर्म व संस्कृति को नष्ट करने के कुत्सित कार्यों में संलग्न असामाजिक तत्त्वों को अपने षडयन्त्रों का भंडाफोड़ हो जाने का एवं अपना अस्तित्व खतरे में पड़ने का भय होने लगता है, परिणामस्वरूप अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने के लिए वे उस दीये को ही बुझाने के लिए नफरत, निन्दा, कुप्रचार, असत्य, अमर्यादित व अनर्गल आक्षेपों व टीका-टिप्पणियों की आँधियों को अपने हाथों में लेकर दौड़ पड़ते हैं, जो समाज में व्याप्त अज्ञानांधकार को नष्ट करने के लिए महापुरुषों द्वारा प्रज्जवलित हुआ था।

Saint-dharm jagriti ki unke khilaf shadyantra - 12 in 1  bapuji narsih mehta tukaram shankracharya both mirabai kabir vivekanda nityanand kripal keshvanandu

                                                                                                                                                                                                                                                                                             ये असामाजिक तत्त्व अपने विभिन्न षडयन्त्रों द्वारा संतों व महापुरुषों के भक्तों व सेवकों को भी गुमराह करने की कुचेष्टा करते हैं। समझदार साधक या भक्त तो उनके षडयंत्रजाल में नहीं फँसते, महापुरुषों के दिव्य जीवन के प्रतिपल से परिचित उनके अनुयायी कभी भटकते नहीं, पथ से विचलित होते नहीं अपितु सश्रद्ध होकर उनके दैवी कार्यों में अत्यधिक सक्रिय व गतिशील होकर सहभागी हो जाते हैं लेकिन जिन्होंने साधना के पथ पर अभी-अभी कदम रखे हैं ऐसे नवपथिकों के गुमराह कर पथच्युत करने में दुष्टजन आंशिक रूप से अवश्य सफलता प्राप्त कर लेते हैं और इसके साथ ही आरम्भ हो जाता है नैतिक पतन का दौर, जो संतविरोधियों की शांति व पुष्पों को समूल नष्ट कर देता है, कालान्तर में उनका सर्वनाश कर देता है। कहा भी गया हैः

संत सतावे तीनों जावे, तेज बल और वंश।

ऐड़ा-ऐड़ा कई गया, रावण कौरव केरो कंस।।

साथ ही नष्ट होने लगती है समाज व राष्ट्र से मानवता, आस्तिकता, स्वर्गीय सरसता, लोकहित व परदुःखकातरता, सुसंस्कारिता, चारित्रिक सम्पदा तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना। इससे राष्ट्र नित्य-निरन्तर पतन के गर्त में गिरता जाता है।

यदि हम वर्तमान भारत के नैतिक मूल्यों के पतन का कारण खोजें तो स्पष्टतः पता चलेगा कि समाज आज महापुरुषों के उपदिष्ट मार्ग का अनुसरण करने की अपेक्षा इसकी पुनित-पावन संस्कृति के हत्यारों के षडयन्त्रों का शिकार होकर असामाजिक, अनैतिक तथा अपवित्रता युक्त विचारों व लोगों का अन्धानुकरण कर रहा है।

जिनका जीवन आज भी किसी संत या महापुरुष के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सान्निध्य में है, उनके जीवन में आज भी निश्चिन्तता, निर्विकारिता, निर्भयता, प्रसन्नता, सरलता, समता व दयालुता के दैवी गुण साधारण मानवों की अपेक्षा अधिक ही होते हैं तथा देर सवेर वे भी महान हो ही जाते हैं और जिनका जीवन महापुरुषों का, धर्म का सामीप्य व मार्गदर्शन पाने से कतराता है, वे प्रायः अशांत, उद्विग्न व दुःखी देखे जाकर भटकते रहते हैं। इनमें से कई लोग आसुरी वृत्तियों से युक्त होकर संतों के निन्दक बनकर अपना सर्वनाश कर लेते हैं।

शास्त्रों में आता है कि संत की निन्दा, विरोध या अन्य किसी त्रुटि के बदले में संत क्रोध कर दें, श्राप दे दें अथवा कोई दंड दे दें तो इतना अनिष्ट नहीं होता, जितना अनिष्ट संतों की खामोशी व सहनशीलता के कारण होता है। सच्चे संतों की बुराई का फल तो भोगना ही पड़ता है। संत तो दयालु एवं उदार होते हैं, वे तो क्षमा कर देते हैं लेकिन प्रकृति कभी नहीं छोड़ती। इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि सच्चे संतों व महापुरुषों के निन्दकों को कैसे-कैसे भीषण कष्टों को सहते हुए बेमौत मरना पड़ा है और पता नहीं किन-किन नरकों में सड़ना पड़ा है। अतैव समझदारी इसी में है कि हम संतों की प्रशंसा करके या उनके आदर्शों को अपना कर लाभ न ले सकें तो उनकी निन्दा करके अपने पुण्य व शांति भी नष्ट नहीं करनी चाहिए।

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संस्कृत : समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी

क्या आप जानते हैं ?

समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी – संस्कृत ……….

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विविध भाषाओँ की स्त्रोत “संस्कृत” भाषा के संबंध में प्रचलित सभी धारणाएं भ्रमपूर्ण हैं |

वर्तमान में पाश्चात्य सिद्धांतों को अधिक मान्यता प्राप्त है, क्योंकि “जिसकी लाठी उसकी भैंस ” | पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अन्धानुकर्ता यह समझ बैठे हैं कि “ग्रीक”,“लैटिन”,“संस्कृत तीनों किसी न किसी प्राचीन भाषा की संतान हैं | हमारी ज्येष्ठ भाषा “संस्कृत“का तो वे नाम भी ढंग से नहीं जानते, अतः अपनी काल्पनिक “जननी भाषा” को”इंडो – यूरोपियन” ऐसा ऊटपटांग नाम देकर काम चला लेते हैं | वास्तव में समस्त भाषओं की जननी संस्कृत ही है |

दूसरा भ्रम उन्हें “संस्कृत” नाम के निर्माण से हुआ है | पाश्चात्य लोग कहते हैं कि “संस्कृत-यानी अच्छी गढ़ी हुई भाषा” | ऐसा वो इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि “संस्कृत” किसी अन्य भाषा से बनी भाषा है , ठीक उसी प्रकर जैसे निराकार पत्थर से मूर्ति बनती है | लेकिन वास्तव में “संस्कृत” शब्द का अर्थ है कि जो भाषा, ईश्वर द्वारा निर्मित होने के कारण अच्छी बनी हुई है | अतः संस्कृत किसी अन्य कच्ची या अधपकी भाषा से बनी है यह बिल्कुल बेबुनियाद व आधारहीन तर्क हैं |

The Science of Sanskrit Language Explained by Rajiv Dixit

पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार प्राचीनकाल का मानव वानर था जो कि बर्बर प्रकृति था | तो सोच का विषय है कि ऐसी अवस्था का मानव भला संस्कृत जैसी भाषा कैसे बना पाता ? सच तो यह है कि संस्कृत के टूट- फूट जाने से ही अन्य प्रादेशिक भाषाएँ बनी हैं न कि प्राकृति भाषाओं से संस्कृत बनी है |

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“प्राकृति” शब्द की रचना ‘प्र’ व ‘आकृति’ की संधि से हुयी है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “प्राकृति” वे भाषाएँ हैं जिन्हें किसी अन्य मूल भाषा से आकार प्राप्त हुआ है | संस्कृत भाषा के टूट जाने पर उसका व्याकरण भी टुकड़ों – टुकड़ों में अन्य भाषाओँ में बंट गया | अतः पाणिनि का ही व्याकरण अन्य सभी भाषाओँ पर लागू हुआ है | संस्कृत जैसी आप्राकृतिक भाषा मानव बना ही नहीं पाता | मानव का हाथ लगते ही वस्तुएं दूषित हो जातीं हैं | इसका उदाहरण है – आजकल कारखानों में जो भी खाद्यसामग्री अथवा दवाइयां बनतीं हैं, वे एकदम :”शुद्ध” हैं, यह जताने के लिए उन पर लिखा होता है “Untouched by any Human hand” अर्थात् किसी भी व्यक्ति के हाथ स्पर्श बिना बनी वस्तु’ |

 

रॉयल एशियाटिक सोसायटी, लंदन में पढ़े गये, एक वक्तृत्व में कहा गया है कि “बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस भारत के ऊपर कई क्रुद्ध आक्रामकों का आक्रमण होता रहा जिनके पद चिन्ह उस भूमि पर पाए जाते हैं, उसी भारत में समय और शासन बदलते रहने पर भी एक भाषा ऐसी टिकी हुई है कि उसके विभिन्न पहलुओं और वैभवता की कोई सीमा नहीं; जो “ग्रीक”, “लैटिन” जैसी मान्यता प्राप्त यूरोपीय भाषायों की जननी है तथा जो “ग्रीक” से भी लचीली और “रोमन” भाषा से भी सशक्त है | यह वह भाषा है जिसके दर्शनशास्त्र की तुलना में पायथागोरस के कथन “कल जन्मे हुए शिशु” जैसे बालिश लगते हैं; जिसकी वैचारिक उड़ान के आगे प्लेटो की ऊँची से ऊँची कल्पनाएँ निष्प्रभावित और समान्य सी लगती हैं; जिसके काव्यों में व्यक्त प्रतिभा अकल्पित – सी है और जिसके शास्त्रीय ग्रन्थ तो इतने प्राचीन हैं कि उनका कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया और शायद आगे लगा भी नहीं सकता | संस्कृत का सारा साहित्य इतना विपुल और विशाल है कि उसका तो जितना वर्णन किया जाये, उतना कम ही पड़ेगा | उसके सहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान है | उसकी पौराणिक कथाओं की तो सीमा ही नहीं है | उसके दर्शनशास्त्र में हर प्रकार की समस्या या पहेली का विचार किया गया है तथा वैदिक समाज के प्रत्येक वर्ण और वर्ग के लिए उसके धर्मशास्त्र के नियम बने हुए हैं |”

 

Panini’s Sanskrit Grammar in Computational Linguistics goes uncredited? – Rajiv Malhotra

“Indian Antiquities” नाम का सात खंडों का ग्रन्थ, जिसके सम्पादक थॉमस मॉरिस हैं, सन् 1792 से 1800 तक प्रकाशित हुआ | उसके चौथे खंड के पृष्ठ 415 पर उल्लेख है कि – “Hollhead का सुझाव है कि संस्कृत भाषा ही पृथ्वी की मूल भाषा है |”

देश – विदेश के अन्य विद्वान् भी यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो वे भी इस निष्कर्ष पर पहुचेगें कि संस्कृत ही विश्व – भर के मानवों कों देवों ने भेंट स्वरूप दी है | वह भाषा किसी मानव द्वारा बनाई नहीं गई , बल्कि अन्य भाषाएँ का उद्गम “संस्कृत” से हुआ है |

हमारे देश के प्रशासन को भी इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए तथा भारत के युवाओं को भी अपने देश की प्राचीन भाषा और संस्कृति की अस्मिता और पहचान कायम रखने के लिए कदम बढ़ाना होगा; अन्यथा हम अपनी वैदिक भाषा मात्र किताबों में बंद किसी प्रदर्शनी में ही देख पायेगें |

read at ; http://nextfuture.aurosociety.org/sanskrit

 

Myths about Sanskrit

मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent’s Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent's Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

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मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent’s Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

जाग मुसाफिर जाग – परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

जाग मुसाफिर  जाग - परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

जाग मुसाफिर जाग – परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

#KnowTheTruth आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस- { Book 2014 }

#KnowTheTruth आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस

क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे गलत राह पर ना चले ?
क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे समाज मे आपका नाम बदनाम ना करें ?
क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे होनहार हो॓, तो फिर….

आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस

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Mpp 2014 E-book-012

#Bail4Bapuji 12-1-14 Sant Shri Asharamji Ashram News Bulletin (मंगलमय संस्था समाचार)

#Bail4Bapuji - 12-1-14 Sant Shri Asharamji Ashram News Bulletin (मंगलमय संस्था समाचार) 12th January, 2014

आज कुछ चैनलों द्वारा संत आशारामजी बापू को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही लेकिन फिर भी उन्हें पूरे भारत और विश्व से समर्थन खुलकर प्राप्त हो रहा है । आजकल हर क्षेत्र के लोगों को उनके संम्पर्क में आने से कैसी-कैसी अनुभूतियाँ हुई हैं ।

 

        सर्वेश चौरसिया अनुभव

बापूजी एक धर्म हैं । आज ४ से ५ करोड़ साधक उन्हीं की वजह से जुड़ें हुए हैं । धर्म क्या है यह मेरे जैसे कई युवानों को बापूजी ने ही समझाया है । धर्म के आलावा हिन्दू संस्कृति, सनातन धर्म का महत्व हमारे गुरुदेव ने ही हमे समझाया है । मीडिया चैनलों को चलाता कौन है ? इनके मालिक कौन हैं ? मीडिया चैनलों का उद्देश क्या है ? हम हमारे देश में मीडिया को Fourth Pillar Of Democracy  कहा है । आज यह चौथा स्तंभ गिर जाये तो देश को गिरने में समय नहीं लगेगा । पूरी की पूरी बिकी हुई खबरें, वही खबरें बार-बार दिखाना, जिसका कोई तथ्य नहीं है । हमारे देश में आज कितनी भुखामरी है, लोग मर रहे हैं, नेता लोग corruption करते जा रहे हैं । इन सबको साइड में रख कर समाज को गुमराह करने के लिए एक संत के बारे में कुछ पैसों के लिए वही गलत खबरें कई बार दिखा रही है ।

आज की युवा पीढ़ी को मैं यह संदेश देना चाहता हूँ कि हमारे गुरुदेव ने एक मुहीम शुरू की है मातृ-पितृ पूजन दिवस । इसे हम १४ फरवरी को मनाते हैं । विदेशी कम्पनियाँ अपना कारोबार करने के लिए १४ फरवरी को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहित करती है । आज का युवा वर्ग उनके मार्ग दर्शन पर चल कर अपना जीवन, तेज, ओज बिगाड़ता जा रहा है । अगर आप सूरज के ऊपर थुंकोगे तो थुंक अपने ऊपर ही आयेगी । कुप्रचार में बिलकुल तथ्य नहीं है । मेरी बहन, माताजी कई महीने वहाँ अनुष्ठान कर चुकी हैं आश्रम में हमने और लोगों को प्रोत्साहित किया है कि आश्रम में जाकर अपना जीवन बदले ।

 

एक मुसलमान भाई का अनुभव (रहीम चाचा) 

आज मुझे ५ साल हुए हैं बापूजी का साधक बनकर । जब बापू नांदेड़ आये थे तो मुझे इतना बड़ा झटका आया, मैं नांदेड़ पहुँच नहीं सका । उसी समय मेरे बापूजी मेरे पास आये और बोले कि तुम घबराओ नहीं रहीम।  मरता कौन हैं, तुम जिंदे हो और मेरे सर पर हाथ रखें और मुझे उठा के बिठा दिए । डॉकटर मेरे पैर को हाथ लगाकर कहता है कि क्या नसीब लाये हो ? २ घंटे के बाद मैं वापिस आया । बापू ने मुझे उठाया, डॉकटरों ने तो मेरा काम तमाम कर दिया था, कपड़ा डाल दिया था मेरे ऊपर । मैं तो बापू के पैर के नीचे की धूल भी नहीं हूँ । बापू मेरे लिए सब कुछ हैं और भगवान भी कह दें कि मैं भगवान हूँ तो मैं नहीं मानूंगा । मेरे भगवान तो बापू ही हैं ।

गुरु बिना कुछ नहीं, गुरु भगवान से, माँबाप से बढ़कर होते हैं

गुरु कहते हैं मैं तुझ में हूँ, तू मुझ में है

सब यह कहते हैं मेरे गुरु महान !

लेकिन ऐसे शिष्य बनो कि गुरु कहें मेरा शिष्य महान ! 

मैं एक इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर हूँ । सबकुछ गुरु के कदमों में मिलता है लेकिन गुरु को जानना चाहिए 

 

लौकिक शिक्षा के साथ अगर आध्यात्मिक ज्ञान का संगम कहीं देखा गया है तो संत आशारामजी बापू के गुरुकुलों में देखने को मिलता है । इन गुरुकुलों की स्थापना देश के निर्माण को, देश की नीवं को सुदृढ़ करने के लिए किया गया था । यहाँ बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ सर्वांगी विकास को महत्व दिया जाता है । देश को सशक्तिकरण और समृद्धि करण देने के लिए भारत के बच्चों में अच्छे संस्कार और शक्ति का सिंचन किया जाता है ।

 

पिछले २२ वर्षों से लगातार संत आशारामजी आश्रम, राजकोट के द्वारा गिरनार की परिक्रमा करने वाले भक्तों को विशाल अन्न क्षेत्र चलाकर भोजन कराया जाता है । कितनी ही सेवाएँ उनके राजकोट आश्रम द्वारा की जाती है । इस बार यह अन्न क्षेत्र लगातार ३ दिनों तक चला जिसमें रोज लगभग ६ से ७ हज़ार भक्तों ने भोजन प्रसाद पाया । इतना ही नहीं इस बार नागपुर के महिला आश्रम द्वारा कड़ाके की ठंड से जूझते हुए लोगों में कंबल तथा खजूर वितरण की गयी ।

 

संत आशारामजी बापू अपना समय, दीवाली, होली अपने भक्तो के बीच ही मनाते हैं । कितने ही गरीब क्षेत्रों में जाकर संत आशारामजी बापू उनको जीवन जरूरी वस्तुएँ बाँटते रहे हैं ।

आज संत आशारामजी बापू और उनके परिवार को प्रताड़ित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है । उनके भक्तों में यह मांग तेज हो रही है कि संत आशारामजी बापू को रिहाई कब मिलेगी ? जहां बड़े-बड़े क्रिमिनल्स को रिहाई मिलती है, तो संत आशारामजी बापू को जमानत अब तक क्यों नहीं दी जा रही है ? इस बात को लेकर पूरे भारत में उनके भक्तों ने मुहीम छेड़ी हुई है । जगह-जगह धरने, आंदोलन, मौन रैलियाँ, जप, ध्यान और अनुष्ठान भी किये जा रहे हैं । इसी श्रृंखला में अहमदाबाद में हुआ था १०८ कुण्डी हवन ।

यज्ञ के बाद वहाँपर लिये गये लोगों के अनुभव (5/12/2013)

1) आज का यज्ञ करके हमें शांति ही मिली । बापूजी निर्दोष हैं और उनकी निर्दोष छुटका हो इसीलिए हमने ये यज्ञ करवाया था । यहाँ सब कुछ अच्छा ही होता है । बापूजी पर लगाये आरोप एकदम गलत हैं । बापूजी निर्दोष हैं । ऐसा हमने कभी देखा ही नहीं की यहाँ कुछ गलत होता हो । और हमारा अपना खुद का अनुभव है हम जो भी मनोकामना रखते हैं सभी पूर्ण होती हैं ।

 

2)मैं ८० के साल से आश्रम में आ रही हूँ । तब मैं छोटी थी, मेरी नई-नई शादी हुई थी । मेरे बच्चे भी नहीं थे, तब मैं आती थी । तब आश्रम में कोई पक्का काम नहीं था । सभी जगह काटों की बाड़ थी । तबसे मैं यहाँ आती हूँ । यहाँ से मेरा गाँव दूर है, मेरे पास पैसा नहीं था आने के लिए, तो कभी किसी से पैसे लेकर भी मैं हर बुधवार, रविवार को आती थी । तब मुझे गुरूजी का ऐसा प्यार और भक्ति मिली कि मुझे लगा की मैं क्या दूँ ?  मुझे यहाँ से ज्ञान मिला कि मनुष्य जीवन किसलिए हैं । जो ज्ञान ऋषि-मुनियों के आश्रम से मिलता था वह ज्ञान हमे यहाँ मिला है । हम कभी भी अपने बापूजी के बारे में ऐसा सोच और सुन भी नहीं सकते ।

 

3)मुझे बहुत ही अच्छा लगा कि बापूजी बाहर आये इसलिए जो यज्ञ हुआ आई और मुझे अपना योगदान देने का मौका मिला । बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश हुँ । मैं ४-५ साल की थी तब से मैं बापूजी से जुडी हूँ । अनुभव तो बहुत से हैं लेकिन वे वाणी में व्यक्त नहीं कर सकती ।

 

4) षड्यंत्रकारी बापूजी को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं । बापूजी जैसे पूरे विश्व में कोई संत नहीं हैं । उनमें कितनी सादगी, आनंद भरा है वह तो हम ही जानते हैं । बापू तो हमारी हिम्मत हैं । बापू नहीं होते तो हम नहीं होते । दुनिया में उन्होंने लाखों-करोड़ों लोगों के रोग-कष्ट निवारण किये । बापू ब्रह्मज्ञानी संत हैं । जो बापूजी के लिए साजिश कर रहे हैं उनका तो विनाश ही होगा ।

 

5) मैं छोटी थी तबसे आती हूँ । ऐसा कुछ  कभी देखा, सुना नहीं । मेरे बापू बहुत दयालु हैं । मेरे बापू के साथ अन्याय हो रहा है । हमसे सहा नहीं जाता है । मैं कैसे जीती हूँ मैं ही जानती हूँ । मेरे बापू को सताना बंद कर दो अब ।

 

       6)  मैं अभी बी.कॉम. पढ़ रहा हूँ कॉलेज में । मैं जहाँ भी जाता हूँ ‘I Support Bapuji’ का ये बैच लगाकर जाता हूँ । लोग मेरे से कई प्रकार के सवाल पूछते हैं । तुमने अभी भी बाबा का बैच लगा रखा है, तुम्हे पता नहीं है कुछ इनके बारे में । मैं कहता हूँ मुझे सब पता है मैं इसलिए लगाकर घूम रहा हूँ । आपको नहीं पता इसीलिए आप लगाकर नहीं घूमते । आप गुरुदेव के बारे में क्या जानते हैं ? हम उनसे पिछले १५ सालों से जुड़ें हुए हैं । मैं कॉलेज में भी यह बैच लगाकर जाता हूँ । गर्व से मैं बोलता हूँ के मैं बापूजी का शिष्य हूँ ।  बापूजी पर लगे आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है, fabricated आरोप हैं सब, बनावटी आरोप हैं २१० % बोगस हैं । हमारे गुरुदेव ने स्वयं बोला है । वे निर्दोष छुटेंगे और जोगी का वैसे ही महकेगा जैसा कि पहले ।

 

        7) बापूजी ने युवाशक्ति की चेतना को अच्छी ओर, भगवान की ओर लगाकर हमे सत्प्रेरणा देकर पूरे विश्व के मंगल की ओर प्रेरित किया है । बापूजी १००% निर्दोष हैं ।  आज कोई भी व्यक्ति तर्क करके, अपनी बुद्धि लड़के ऐसा बता देता है कि बापूजी भगवान नहीं हैं । जब मैं ८-९ कक्षा में पढ़ता था, हमारे घर का रेनोवेशन चल रहा था । बिजली की एक तार खुली पड़ी थी । और नीचे पानी था । मैंने जैसे ही वहाँ पैर रखा तो मैं चिपक गया और मुझे काफी देर करंट लगा । उस समय मेरे पिताजी बापूजी द्वारा दिए हुए गुरुमंत्र का जप कर रहे थे । उनको अचानक अंदर से प्रेरणा हुई जैसे बापूजी बता रहे हैं कि तेरा बेटा मुश्किल में है तू जा । पिताजी माला करते-करते उठे और उनको ऐसी प्रेरणा हुई कि जहाँ वायर लगा हुआ था उसे खींचकर निकाल दिया । मैं पूरा सफेद हो गया था, सारा खून जम गया था । डॉकटर ने भी बोल दिया था कि बहुत मुश्किल है । कोई दवाई नहीं की, पर अचानक ही घर पर मुझे होश आ गया था ।

        

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हम भी है जोश मे !!!

हम भी है जोश मे !!!

फैसला अभी बाकी है, हम सोये नहीं है । जमाना भी जीता नहीं है, हम भी हारे नहीं है । सत्य की जीत हो रही है ओर होगी ।

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