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यज्ञार्थ कर्म

 

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यज्ञार्थ कर्म

मानव तन पाकर विषय भोगना उचित नहीं है। विषय भोग भोगना है तो पशुयोनि में खूब मजे से भोगा जा सकता है। पशुओं को कोई बाधा नहीं। हम असंयमी बनकर अपना जीवन व्यतीत कर दें तो हम पशुता की ओर गये। अतः जीवन-सरिता को संयम के दो किनारों के बीच में बहाते हुए यज्ञार्थ कर्म करने चाहिए। भोजन करें तो भी यज्ञार्थ, पानी पियें तो भी यज्ञार्थ। हमारे पेट में जठराग्नि यानि भगवान अग्निदेव विराजमान हैं उनको आहुति देना है।

‘मैं खा रहा हूँ… मजा ले रहा हूँ…’

नहीं….। मैं वैश्वानर को भोजन करा रहा हूँ। अपने बच्चे को भोजन कराते समय बच्चे में स्थित आदि नारायण को भोजन कराने की भावना करो। इससे भोजन कराना भी यज्ञ हो जाएगा।

बंगाल में एक स्त्री की शादी होते ही उसी वर्ष में उसका पति मर गया। एकाएक पति की मृत्यु होने से वह विधवा महिला विह्वल हो गई, बावरी सी बन गई। किसी सज्जन व्यक्ति ने सोचा कि पति की याद में कहीं पागल न हो जाय यह लड़की ! उसके घरवालों को समझाया कि, ‘फलानी जगह पर संत-महात्मा रहते हैं उनके पास ले जाओ इस बच्ची को। उनके दर्शन कराओ, सत्संग में बैठाओ, सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

वह विधवा युवती, सोलह वर्ष की बच्ची संत-दर्शन को गई। पति के वियोग में विह्वल। सौभाग्य-चिह्न बिन्दी विहीन ललाट, चूड़ियाँ विहीन हाथ, तन पर विधवा के धवल वस्त्र। आँखों में आँसू बहाती संत श्री के चरणों में पहुँची। बाबाजी ने आत्मिक प्यार भरे स्वर में पूछाः

“बेटा ! कैसे आयी ?”

वह रो पड़ी। सिसकते हुए बोलीः “दुनिया में मेरा कोई नहीं….. मैं क्या करूँ ?”

बाबाजी ने कहाः “अरे बेटी ! तू आज जितना झूठ बोल रही है उतना कभी नहीं बोली। तुझे इतना पता नहीं कि संत महात्मा के आगे कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए ?”

वह युवती चौंक उठी एकदम। बाबाजी को यकीन दिलाते हुए कहने लगीः “बाबाजी ! मैं सच बोलती हूँ। इस दुनिया में मेरा कोई नहीं। मेरी बुढ़िया माँ थी उसने कन्यादान कर दिया और कुछ महीनों में वह प्रभु धाम में चली गई। फिर उसका जमाई भी चल बसा। मैं अकेली रह गई। मेरा कोई न रहा।”

“तू झूठ बोल रही है। तेरा कोई नहीं ? अरे ! तेरे हृदय में परमात्मा बैठा है वह तेरा है। हृदय की धड़कनें चला रहा है, तेरे तन में रक्त बहा रहा है, श्वास चला रहा है, आँखों को देखने की शक्ति दे रहा है, कानों को सुनने की शक्ति दे रहा है वह सर्वान्तर्यामी परमात्मा तेरा है, तेरे साथ है, तेरे भीतर है और तू बोलती है मेरा कोई नहीं ? पगली ! वह तेरे और सबके हृदय में बैठा हुआ सृष्टिकर्त्ता कभी मरता नहीं। शरीर मरता है तब भी सूक्ष्म शरीर में अन्तर्यामी रहता है, प्रेरणा देता है, आगे की यात्रा करवाता है। सूक्ष्म शरीर भी विलीन हो जाता है तब वह सर्वव्यापक ब्रह्म हो जाता है, विश्व चैतन्य हो जाता है।

ऐसे परब्रह्म परमात्मा जैसे सबके हैं वैसे तेरे भी हैं। जिसका कोई नहीं होता उसके तो वे पूरे के पूरे हैं। ….और तू रोती है। धैर्य रख बेटी ! करूणामूर्ति महात्मा ने बच्ची को आश्वासन दिया।

लौकिक दृष्टि से कोई अनाथ सोचे कि दुनियाँ में मेरा कोई नहीं है, केवल परमात्मा ही मेरा है, तो उसकी सारी की सारी वृत्तियाँ एक ही जगह पर लग जाती हैं, केन्द्रित हो जाती हैं। उसका मन परमात्मा में लगने लगता है।

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वज्रात् त्रायते इति पवित्रः।

 

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वज्रात् त्रायते इति पवित्रः।

शास्त्र कहते हैं पवित्र व्यक्ति पर वज्र भी गिरे तो उसका बाल बाँका नहीं कर सकता। वज्रात्  त्रायते इति पवित्रः। जो पवि अर्थात् वज्र से भी रक्षा  करे उसका नाम है पवित्र। वज्र पवित्र व्यक्ति का स्पर्श नहीं कर सकता।

हमारे धर्माचार की विधि है कि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठें तब जरूरत लगे तो लघुशंका, शौचादि करके अथवा ऐसे ही थोड़ी देर तक बिस्तर पर बैठकर ब्राह्ममुहूर्त का सदुपयोग करें, पवित्र चिंतन करें क्योंकि सोते समय सभी वासनाएँ शांत हो जाती है एवं जागने के बाद धीरे-धीरे उदित होती हैं। प्रभातकाल में नींद उड़ी है, सांसारिक वासनाओं का उदय अभी नहीं हुआ है – ऐसे समय में यदि अपने आत्मस्वरूप का, परम सत्य परमात्मा का चिंतन करोगे तो खूब-खूब लाभ होगा। जैसे विद्युत के प्रवाह के साथ जुड़ते ही बैटरी चार्ज (आवेशित) हो जाती है ऐसे ही प्रातःकाल में अपने चित्त एवं जीवन को पवित्र करने वाले आत्मा-परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जुड़ जाय तो हृदय में उसकी शक्ति का आविर्भाव हो जाता है। वह जीवनशक्ति फिर दिन भर के क्रिया-कलापों में पुष्टि देती रहेगी।

प्रभात काल में यदि बहुत सुस्ती लगती हो, शरीर में अशुद्धि हो तो भले स्नान करके फिर आत्मचिंतन के लिए बैठो, परमात्म-स्मरण के लिए बैठो लेकिन नित्य कर्म के नाम पर दूसरी खटपट में नहीं पड़ना। सबसे पहले परमात्मा का ही चिंतन करना परमावश्यक है क्योंकि सबसे पवित्र वस्तु परमात्मा है। परमात्मा के चिंतन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। यदि ब्राह्ममुहूर्त में 5-10 मिनट के लिए आत्मा-परमात्मा का ठीक स्मरण हो जाय तो पूरे दिन के लिए एवं प्रतिदिन ऐसा करने पर पूरे जीवन के लिए काफी शक्ति मिल जाय।

अपना शरीर यदि मलीन लगता हो तो ऐसा ध्यान कर सकते हैं-

“मेरे मस्तक में भगवान शिव विराजमान हैं। उनकी जटा से गंगाजी की धवल धारा बह रही है और मेरे तन को पवित्र कर रही है। मूलाधार चक्र के नीचे शक्ति एवं ज्ञान का स्रोत निहित है। उसमें से शक्तिशाली धारा ऊपर की ओर बह रही है एवं मेरे ब्रह्मरंध्र तक के समग्र शरीर को पवित्र कर रही है। श्री सदगुरु के चरणारविंद ब्रह्मरंध्र में प्रगट हो रहे हैं, ज्ञान-प्रकाश फैला रहे हैं।”

ऐसा ध्यान न कर सको तो मन-ही-मन गंगा किनारे के पवित्र तीर्थों में चले जाओ। बद्री-केदार एवं गंगोत्री तक चले जाओ। उन पवित्र धामों में मन-ही-मन भावपूर्वक स्नान कर लो। पाँच-सात मिनट तक पावन तीर्थों में स्नान करने का चिंतन कर लोगे तो जीवन में पवित्रता आ जायेगी। घर-आँगन को स्वच्छ रखने के साथ-साथ इस प्रकार तन-मन को भी स्वस्थ, स्वच्छ एवं भावना के जल से पवित्र करने में जीवन के पाँच-सात मिनट प्रतिदिन लगा दोगे तो कभी हानि नहीं होगी। इसमें तो लाभ ही लाभ है।

सूर्योदय से पूर्व अवश्य उठ जाना चाहिए। सूर्य हमें प्रकाश देता है। प्रकाशदाता का आदर नहीं करेंगे तो ज्ञानादाता गुरुदेव का भी आदर नहीं कर सकेंगे। सूर्योदय से पहले उठकर पूजा करने का अर्थ है ज्ञानादाता का आदर करना। पूजा अर्थात् अपने जीवन में सत्कार की क्रिया। यह मानव का कर्त्तव्य है। भगवान भास्कर, ज्ञानदाता सदगुरुदेव एवं देवी-देवताओं का आदर तो करना ही चाहिए। इतना ही नहीं, अपने शरीर का भी आदर करना चाहिए। शरीर का आदर कैसे करें ? नीतिशास्त्र में एक श्लोक आता हैः

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं

बह्णशिनं निष्ठुरभाषिणं च।

सूर्योदये चास्मिते च शायिनं

विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्।।

“मैले वस्त्र पहनने वाले, दाँत गंदे रखने वाले, ज्यादा खाने वाले, निष्ठुर बोलने वाले, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाले स्वयं विष्णु भगवान हों तो उन्हें भी लक्ष्मी जी त्याग देती है।”

आदि नारायण स्वयं को गंदा देखें, मुँह में से दुर्गन्ध आने लगे, आलसी हो जायें तो लक्ष्मी जी उनसे तलाक ले लें। स्वच्छता एवं पवित्रता द्वारा लोगों की प्रीति प्राप्त करना, सुरुचि प्राप्त करना यह भी पूजा का, धर्म का एक अंग है। इसमें दूसरों की भी पूजा है एवं स्वयं की भी।

जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

 

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जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

जिनकी दृष्टि मात्र से जीव आनन्द को प्राप्त होता है, जिसकी महिमा गाते शास्त्र थकते नहीं, युद्ध के मैदान में न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण जिस ज्ञान की श्रेष्ठता व पवित्रता बताते हैं उस ज्ञान को प्राप्त किये हुए आत्मवेत्ता जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन करने की कई दिनों की इच्छा पूर्ण हुई। सुना था कि ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष श्री रमण महर्षि के सान्निध्य में बैठने मात्र से हृदय शान्ति व आनन्द का अनुभव करता है। आज वह सुअवसर प्राप्त हो गया।

भक्त-मण्डल महर्षि को प्रणाम करके बैठा। किसी ने श्रीकृष्ण की आराधना की थी तो किसी ने अम्बाजी की, किसी ने रामजी को रिझाने के प्रयास किये थे तो किसी ने सूर्यनारायण को अर्घ्य दिये थे किसी ने व्रत किये थे तो किसी ने फलाहार से वर्ष बिताए थे। किसी ने दो देव बदले थे तो किसी ने तीन, चार या पाँच देव बदले थे।

जब तक ज्ञानवान, आत्मारामी, प्रबुद्ध महापुरुष के चरणों में जाकर साधना का मार्ग सुनिश्चित नहीं होता तब तक मनमानी साधना जमती नहीं। हृदय की गहराई में आशंका बनी रहती है कि साधना पूर्ण होगी कि नहीं, फलदायी बनेगी कि नहीं। गहराई में यह संदेह विद्यमान हो तो ऊपर-ऊपर से कितने ही व्रत नियम करो, कितनी ही साधना करो, शरीर को कष्ट दो लेकिन पूर्णरूपेण लाभ नहीं होता। अचेतन मन में सन्देह बना ही रहता है। यही हम लोगों के लिए बड़े में बड़ा विघ्न है।

योगवाशिष्ठ महारामायण में आया है कि शमवान पुरुष के सर्व सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, उसके चित्त में शोक के प्रसंग में शोक नहीं होता, हर्ष के प्रसंग में हर्ष नहीं होता, भय के प्रसंग में भयभीत दिखता हुआ भी भयभीत नहीं होता, रूदन के प्रसंग में रोता हुआ दिखता है फिर भी नहीं रोता है, सुख के प्रसंग में सुखी दिखता है फिर भी सुखी नहीं होता।

जो सुखी होता है वह दुःखी भी होता है। जितना अधिक सुखी होता है उतना अधिक दुःख के आघात सहता है। मान के दो शब्दों से जितना अधिक खुश होता है उतना अधिक अपमान के प्रसंग में व्यग्र होता है। धन की प्राप्ति से जितना अधिक हर्ष होता है, धन चले जाने से उतना अधिक शोक होता है। चित्त जितना तुच्छ, हल्का और अज्ञान से आक्रान्त होता है उतना ही छोटी-छोटी बातों से क्षोभित होता है। चित्त जब बाधित हो जाता है तब क्षोभित होता हुआ दिखे उसको क्षोभ स्पर्श नहीं कर सकता। अष्टावक्र मुनि ने राजा जनक को कहाः

धीरो न द्वेष्टि ससारं आत्मानं न दिदृक्षति।

हर्षाभर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति।।

“हर्ष और द्वेष से रहित ज्ञानी संसार के प्रति न द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है। वह न मरा हुआ है और न जीता है।”

(अष्टावक्र गीताः 83)

जो धीर पुरुष हैं, शम को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने जीवन के परम लक्ष्य को सिद्ध कर लिया, परमात्म-दर्शन कर लिया, ब्रह्मा-विष्णु-महेश समन्वित विश्व के तमाम देवों की मुलाकात कर ली, जो अपने स्वरूप में परिनिष्ठित हो गये वे ही कृतकृत्य हैं। शास्त्रों में उन्हीं को धीर कहा है।

जो क्षुधा-तृषा, सर्दी-गर्मी सहन करते हैं उनमें तो धैर्य तो है लेकिन वे तपस्वी हैं। वे व्यावहारिक धैर्यवान हैं। शास्त्र किनको धैर्यवान कहते हैं? अष्टावक्र मुनि कहते हैं- धीरो न द्वेष्टि संसारम्…. संसार की किसी भी परिस्थिति में उद्विग्न नहीं होता, उसे द्वेष नहीं होता। आत्मानं न दिदृक्षति। आत्मा-परमात्मा का दर्शन करने की, उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। संसार की प्राप्ति तो नहीं चाहता, इतना ही नहीं प्रभु को प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रही। क्योंकि अपना आत्मा ही प्रभु के रूप में प्रत्यक्ष हो गया है। फिर प्राप्त करना कहाँ बाकी रहा? जैसे, मेरे को आसारामजी महाराज के दर्शन करने की इच्छा नहीं। अगर मैं इच्छा करूँ तो मेरी इच्छा फलेगी क्या? मैं जानता हूँ कि आसारामजी महाराज कौन हैं।

जिसने अपने-आत्मस्वरूप को जान लिया, परमात्म-स्वरूप को जान लिया उसको परमात्म-प्राप्ति की इच्छा नहीं रहती।

अव्यक्त तत्व का अनुसंधान

 

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अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।

‘बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।”

(गीताः 7.24)

जो बुद्धिमान हैं, मेधावी हैं वे भगवान को साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्तरूप में मानते हैं। जो बुद्धिमान नहीं हैं वे भगवान को साकार रूप में मानते हैं और निराकार तत्त्व के तरफ उनकी गति नहीं होती। जो मूर्ख हैं, बुद्धु हैं वे न भगवान के साकार रूप को मानते हैं न निराकार रूप को मानते हैं, वरन् अपनी मति एवं कल्पना में जो बात आती है उसी को मानते हैं

चार प्रकार की कृपा होती हैः

ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा।

ईश्वरकृपाः ईश्वर में प्रीति हो जाये, ईश्वर के वचनों को समझने की रूचि हो जाये, ईश्वर की ओर हमारा चित्त झुक जाये, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा हो जाये यह ईश्वर की कृपा है।

शास्त्रकृपाः शास्त्र का तत्त्व समझ में आ जाये, शास्त्र का लक्ष्यार्थ समझ में आने लग जाये यह शास्त्रकृपा है।

गुरुकृपाः गुरु हमें अपना समझकर, शिष्य, साधक या भक्त समझकर अपने अनुभव को व्यक्त करने लग जायें यह गुरुकृपा है।

आत्मकृपाः हम उस आत्मा परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त हो जायें, अपने देह, मन, इन्द्रियों से परे, इन सबको सत्ता देने वाले उस अव्यक्त स्वरूप को पहचानने की क्षमता हममें आ जायें यह आत्मकृपा है।

आत्मज्ञान हो लेकिन ज्ञान होने का अभिमान न हो तो समझ लेना की आत्मकृपा है। अपने को ज्ञान हो जाये फिर दूसरे अज्ञानी, मूढ़ दिखें और अपने को श्रेष्ठ मानने का भाव आये तो यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम होता है क्योंकि ज्ञान से सर्वव्यापक वस्तु का बोध होता है। उसमें अपने को पृथक करके दूसरे को हीन देखने की दृष्टि रह ही नहीं सकती। फिर तो भावसहित सब अपना ही स्वरूप दिखता है।

गर्मी-सर्दी देह को लगती है, मान-अपमान, हर्ष-शोक मन में होता है तथा राग-द्वेष मति के धर्म होते हैं यह समझ में आ जाये तो मति के साथ, मन के साथ, इन्द्रियों के साथ हमारा जो तादात्म्य जुड़ा है वह तादात्म्य दूर हो जाता है। शरीर चाहे कितना भी सुडौल हो, मजबूत हो, मन चाहे कितना भी शुद्ध और पवित्र हो, बुद्धि एकाग्र हो लेकिन जब तक अपने स्वरूप को नहीं जाना तब तक न जाने कब शरीर धोखा दे दे? कब मन धोखा दे दे? कब बुद्धि धोखा दे दे? कोई पता नहीं। क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है और प्रकृति परिवर्तनशील है।

संसार की चीजें बदलती हैं। शरीर बदलता है। अन्तःकरण बदलता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जो कुछ देखने में आता है वह सब व्यक्त है। भूख-प्यास भी तो मन से देखने में आती है। सर्दी-गर्मी का पता त्वचा से चलता है किन्तु उसमें वृत्ति का संयोग होता है अतः वह भी तो व्यक्त ही है। इसीलिए भगवान कहते हैं किः ‘जो मूढ़ लोग हैं वे मेरे अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानते और मुझे जन्मने-मरने वाला मानते हैं। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्तिभाव को प्राप्त होते हैं।

….और मजे की बात है कि जो आदमी जहाँ है और जैसा है, वहीं से और वैसा ही वह दूसरे को देखता है।

बुद्धिहीन से तात्पर्य अँगूठाछाप से नहीं है वरन् जिसको पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, जिस तत्त्व को समझने के लिए बुद्धि मिली है उस तत्त्व में बुद्धि के न लगाकर हीन पदार्थों में उसे खर्च कर दिया, वह बुद्धिहीन है।

भगवान ने क्रियाशक्ति दी है तो क्रियाशक्ति से क्रिया को बढ़ाकर अपने को जंजाल में न डालें लेकिन क्रियाशक्ति को सत्कर्म में लगाकर अनंत जन्मों के कर्मों को काटने का प्रयत्न करें। जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है ऐसे ही कर्म से कर्म काटे जायें।

ईश्वर ने बुद्धिशक्ति दी है तो बुद्धि से हम जगत के पदार्थों के साथ बँधे नहीं लेकिन जहाँ से बुद्धि को सत्ता मिलती है उस अव्यक्त स्वरूप में बुद्धि को लगायें ताकि बुद्धि बुद्धि न बचे बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये।

बुद्धि को ऋतंभरा प्रज्ञा बनाने के दो तरीके हैं-

योगमार्ग और ज्ञानमार्ग।

योगमार्ग में धारणा-ध्यान करके, चित्त की वृत्ति का निरोध करके अपने स्वरूप का अनुसंधान किया जाये। बारंबार निरोधाकार वृत्ति बन जाये तो इससे भी बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा होने लगती है।

ज्ञानमार्ग के अनुसार दूसरा तरीका यह है कि बारंबार उस सच्चिदानंदघन, अज, अविनाशी, शुद्ध, बुद्ध, साक्षी, दृष्टा, असंग, निर्विकार, चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया जाये और जगत का व्यवहार करते हुए, बातचीत करते हुए फिर जगत का बाध कर दिया जाये…. यह ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ की प्रक्रिया है। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः ”कोई ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण बार-बार पढ़े और आत्मज्ञान न हो तो राम बादशाह सिर कटायेगा।”

‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में लीलावती, चुडाला, मंकी ऋषि आदि की कथाएँ आयेंगी और बाद में वशिष्ठ जी महाराज कहेंगे किः “हे रामजी ! वास्तव में बना कुछ नहीं।यह चित्त का फुरना मात्र है।” यही बात शंकराचार्य जी ने कही हैः

नास्ति अविद्या मनसोऽतिरक्ता

मनैवऽविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन्विलीने सकलं विलीनं

तस्मिन्जिगीर्णे सकलं जिगीर्णम्।।

यह अविद्या मन से अलग नहीं है। माया… माया…. माया… माया कोई लाल, पीली, हरी या सफेद साड़ी पहनी हुई महिला नहीं है। माया का मतलब हैः या मा सा माया। जो है नहीं फिर भी दिखे उसका नाम है माया। यह जो कुछ भी दिखता है वह नहीं है। जो नहीं है वह दिख रहा है और जो है वह दिखता नहीं है।

जो है वह दिखता क्यों नहीं? क्योंकि वह अव्यक्त है और हम लोग जीते हैं व्यक्त में। हम लोग व्यक्त होने वाले को मैं मानते हैं तो व्यक्त सच्चा लगता है लेकिन जिसके आधार पर है, उसका पता नहीं।

जीवन का सर्वांगीण विकास…

 

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जीवन का सर्वांगीण विकास…

निश्चिन्तता, निर्भीकता और प्रसन्नता से जीवन का सर्वांगीण विकास होगा । अतः उन्हें बढ़ाते जाओ । ईश्वर और संतों पर श्रद्धा-प्रीति रखने से निश्चिन्तता, निर्भीकता, प्रसन्नता अवश्य बढ़ती है ।

आत्मिक ऐश्वर्य, माधुर्य और पूर्ण प्रेम….। निष्कामता और एकाग्रता से आत्मिक ऐश्वर्य बढ़ता है । आत्मिक ऐश्वर्य से, सर्वात्मभाव से शुद्ध प्रेम की अभिव्यक्ति होती है । आप सबके जीवन में इसके लिए पुरुषार्थ हो और दिव्य सामर्थ्य प्रकट हो….।

थके, हारे, निराशावादी को सूर्य भले पुराना दिखे लेकिन आशावादी, उत्साही, प्रसन्नचित्त समझदार को तो पुराणपुरुषोत्तम सूर्य नित्य नया भासता है । आपका हर पल नित्य नये आनन्द और चमकता दमकता व्यतीत हो ।

आपका जीवन सफलता, उत्साह, आरोग्यता और आनन्द के विचार से सदैव चमकता दमकता रहे… आप विघ्न-बाधाओं के सिर पर नृत्य करते हुए आत्म-नारायण में निरन्तर आनन्द पाते रहें यह शुभ कामना….

नूतन वर्ष के मंगल प्रभात में जीवन को तेजस्वी बनाने का संकल्प करें । ईश्वर और संतों के मंगलमय आशीर्वाद आपके साथ हैं ।

दीप-प्राकट्य के साथ साथ आपकी आन्तर ज्योत का भी प्राकट्य हो ।

ज्योत से ज्योत जगाओ सदगुरु !

ज्योत से ज्योत जगाओ…..

मेरा अन्तर तिमिर मिटाओ सदगुरु !

ज्योत से ज्योत जगाओ…..

संसार की लहरियाँ तो बदलती जाएँगी, इसलिए हे मित्र ! हे मेरे भैया ! हे वीर पुरुष ! रोते, चीखते, सिसकते क्या जीना? मुस्कराते रहो…. हरि गीत गाते रहो…. हरि रस पाते रहो… यही शुभ कामना । आज से आपके नूतन वर्ष का प्रारम्भ…..

दुर्बल एवं हल्के विचारों से आपने बहुत-बहुत सहन किया है । अब इसका अन्त कर दो । दीपावली के दीपक के साथ साहस एवं सज्जनता को प्रकटाओ । जय हो ! शाबाश वीर ! शाबाश!

हे मानव ! अभी तुम चाहो तो जीवन का सूर्य डूब जाये उससे पहले सूर्यों के सूर्य, देवों के देव आत्मदेव का अनुभव करके मुक्त हो सकते हो । जीवनदाता में स्थिर हो सकते हो । सोहं के संगीत का गुँजन कर दो । फिर तो सदा दीवाली है ।

हम भारत वासी सचमुच भाग्यशाली हैं । भिन्न-भिन्न भगवानों की, देवी-देवताओं की उपासना-अर्चना से हमारे बहुआयामी मन को आन्तरिक माधुर्य मिल पाता है, जो तथाकथित धनाढ्य देशों में मिलना संभव नहीं है । भिन्नता में अभिन्न आत्मा-परमात्मा एक ही है ।

संयम और सदाचार के साथ संस्कृति के प्रचार में लगकर भारतभूमि की सेवा करो ।

कदम अपने आगे बढ़ाता चला जा….

दिलों के दिये जगमगाता चला जा….

भय, चिन्ता एवं बेचैनी से ऊपर उठो । आपकी ज्ञान ज्योति जगमगा उठेगी ।

सदा साहसी बनो । धैर्य न छोड़ो । हजार बार असफल होने पर भी ईश्वर के मार्ग पर एक कदम और रखो ।

यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

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यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

संसार की कोई भी चीज केवल देखने भर को तथा कहने भर को ही हमारी है, आखिर में तो छूट ही जायेगी। जब चीज छूट जाय तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उससे पहले ही उसकी असारता को समझकर उससे ममता हटा लें। जो छूटने वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें। व्यक्ति का ऐसा विवेक जग जाय तो बेड़ा पार हो जाय।

जिसके जीवन में विवेक नहीं है उसका जीवन नश्वर भोगों और ऐहिक आपाधापी में खत्म हो जाता है, बर्बाद हो जाता है। अंत में कुछ भी हाथ नहीं लगता तब वह पछताता है। मनुष्य को चाहिए कि अपनी विवेकदृष्टि सदा जागृत रखकर सफल जीवन जीने का यत्न करे। विवेकी मनुष्य किसी भी ऐहिक चीज-वस्तु या परिस्थिति में उलझेगा नहीं। धन हो, सत्ता हो, सामर्थ्य हो, मित्र-परिवार हो – सर्व प्रकार के ऐहिक सुख हों पर विवेकी उनसे चिपकेगा नहीं, उनका उपयोग करेगा। मूर्ख आदमी उनमें आसक्त हो जायेगा, ‘मोर-तोर’ की जेवरी (‘मेरे-तेरे की रस्सी) में बँध जायेगा फिर अंतकाल में पछतायेगा।

एक रात राजा भोज अपने सर्वाधिक आरामदायक एवं मणियों से जड़े बहुमूल्य पलंग पर विश्राम कर रहे थे। अपने जीवनकाल में किये सर्वोत्कृष्ट कार्यों एवं महान उपलब्धियों पर उन्हें बहुत अभिमान हो रहा था। मानवहित के लिए उन्होंने अनेक उपयोगी कार्य किये थे, विविध लोकोपयोगी योजनाओं को कार्यान्वित किया था और प्रजा भी उन्हें भूदेव अर्थात् धरती का देव मानती थी।

वे विद्वानों का बहुत आदर करते थे एवं उनके विचारों, विशेषतः उनकी काव्य-रचनाओं को सुनकर उन्हें खूब पुरस्कार देते थे। काव्य-प्रेम और मानवता की सेवा उनके चरित्र के गौरव में सदैव वृद्धि करते रहते थे।

उनका कवि-हृदय कल्पनालोक में हिलोरें ले रहा था। मन में भाव आया कि ‘मनुष्य जीवन लोकहित के लिए ही प्राप्त हुआ है और मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि अपनी प्रजा की भलाई में लगा रहता हूँ तथा मेरी प्रजा भी मेरे कार्यों से प्रसन्न है।”

संयोग से पलंग पर लेटे-लेटे काव्य की कुछ पंक्तियाँ भाव-जगत में खोये उन कवि के हृदय में गंगाजी की तरंगों की भाँति लहराने लगीं और वे भाव-विभोर होकर गुनगुनाने लगेः

चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः।

‘अहा ! मुझे चित्त को मयूर की भाँति नृत्य से लुभाने वाली सुंदर कमनीय युवतियों का अक्षय प्यार और स्वभावानुकूल स्नेही मित्र के संग का सुख मिला है, मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ !”

इस पंक्ति को दोहरा-दोहराकर वे आत्मगौरव का अनुभव कर रहे थे। इन्द्रियसुख पाकर मनुष्य को अभिमान हो जाता है। फिर वह अहं-तृप्ति में ही सुख का अनुभव करता है।

राजा भोज सोच रहे थे कि ‘किसी राजा को वह ऐश्वर्य नहीं मिला जो मुझे प्राप्त है। मेरे भाग्य में कितना अक्षय आनंद भरा हुआ है !’ और इसी मिथ्या अतिशयानंद से उनके मन में कविता की एक और पंक्ति लहराने लगी। वे बोल उठेः

सद् बान्धवाः प्रणतिमगर्भगिरश्च भृत्याः।

‘अपने निजी स्नेही बंधुओं का साहचर्य और अनुरागी सेवकों की अटूट सेवावृत्ति मुझे मिली है, वाह ! मेरा कितना अहोभाग्य है !’

वे उपरोक्त दोनों पंक्तियों का पुनः-पुनः गर्व से उच्चारण करते रहे और अधिकाधिक हर्ष-विभोर होते गये। कवि का हृदय कल्पनाओं का भंडार होता है और इसी कल्पना के संसार में उनका काव्य-निर्माण आगे बढ़ा।

कुछ देर और विचारमग्न हो वे तीसरी पंक्ति यों कहने लगेः

गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरंगाः।

”मेरे द्वार पर गर्व और शक्ति से सम्पन्न चंचल घोड़े हिनहिनाते हैं तथा बड़े-बड़े दाँतों वाले मदमत्त हाथी चिंघाड़ते हैं। अहो ! मैं सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न हूँ। मेरे ऊपर भगवान की असीम कृपा है। मुझे अपने अद्वितीय भाग्य पर गर्व है ! मैं कितना भाग्यशाली हूँ !”

फिर तीनों पंक्तियों को एक साथ जोड़कर वे बार-बार हर्षित मन से उच्च स्वर में गाने लगे। बहुत देर तक वे काव्य की चतुर्थ पंक्ति जोड़ने का प्रयत्न करते रहे पर सफल न हो पाये।

अहंकार का विकार मनुष्य की नैतिक शक्ति का क्षय कर देता है, उसे हिंसा और विनाश के पथ पर ले जाता है। उसके अंदर का स्वार्थ उसे प्रत्येक कार्य, बातचीत, आचार-व्यवहार से दूसरों पर अत्याचार करने के लिए उत्साहित करता है। वह काल्पनिक जगत में रहने लगता है।

राजा भोज मन ही मन अपने काव्य-जगत में विचरण कर रहे थे। अपने को हर प्रकार से धन्य समझ मिथ्या गर्व में चूर थे परंतु काव्य गी चौथी पंक्ति नहीं बन पा रही थी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।

उनके पलंग के नीचे छिपे एक निर्धन, संस्कृत के कवि उदभट्ट से और अधिक छिपा तथा चुप न रहा गया। लक्ष्मी जी सदा उनसे रुष्ट ही रहती थीं। वे राजा भोज से कुछ दान-दक्षिणा की याचना करने आये थे किंतु दण्ड के भय से पलंग के नीचे छिपकर ही रात काट रहे थे। वे भी संस्कृत के सिरमौर काव्यधर्मी थे। वे राजा के मिथ्या दर्प को सहन न कर सके और उन्होंने छिपे-छिपे नीचे से चौथी पंक्ति बोलीः

सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति।

‘हे राजन् ! यह ठीक है कि आपको अपने सत्कार्यों तथा पुण्यों से ये सब लौकिक सम्पदायें और सुख वैभव प्राप्त हो गये हैं। आज आपको सांसारिक आनंद-उपभोग के समस्त भौतिक साधन भी उपलब्ध हैं, किंतु जीवन के अंतिम समय में जब मृत्यु की छाया में मनुष्य के नेत्र बंद होने लगते हैं, तब उसके पास कुछ भी नहीं रहता।

हे उदार-शिरोमणि ! यह सांसारिक सुख-वैभव तो क्षणिक एवं अस्थिर है। इन सब सम्पदाओं में स्थायी रूप से आपके साथ रहने वाला कुछ भी नहीं है। सदा आपके साथ रहने वाला, शास्वत, अनादि अनंत तो आपका अपना आत्मा ही है और उसका ज्ञान ही सदा टिकने वाली सम्पदा है।

क्षमा करें राजन् ! आपको अहंकार के क्षुद्र काल्पनिक जगत से निकालकर ठोस वास्तविकता की ओर आपका ध्यान दिलाने के नैतिक कर्तव्य ने मुझे यह चौथी पंक्ति जोड़ने पर विवश कर दिया।”

विनीत भाव से यह कवि उदभट्ट बाहर निकलकर राजा के सामने खड़े हो गये। उनके शब्द राजा भोज के अंतर्मन में गहरे उतर गये। राजा मोह-निद्रा से जाग उठे। उनका विशुद्ध, निर्मल विवेक जागृत हुआ और वे नश्वर वैभव का क्षुद्र अहं त्यागकर शाश्वत पद की प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़े।

अविनाशी आतम अमर, जग तातें प्रतिकूल।

ऐसी ज्ञान विवेक है, सब साधन को मूल।।

आत्मा सत्, चित्त और आनन्दस्वरूप है तथा शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अमर, अपरिवर्तनशील है और शरीर मरणधर्मा, परिवर्तनशील है-ऐसा विवेक जिसका जग गया है वह परम विवेकी है।

‘श्रीरामचरितमानस’ में आता हैः

जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब विषय बिलास बिरागा।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए जब उसे सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाय। विवेक होने पर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) भगवान के चरणों में प्रेम होता है। मन, वचन और कर्म से भगवान के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है। (अयो.कां. 92.2-3)

 

चित्त का निर्माण

 

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चित्त का निर्माण

एक समय था जब बूँद भी दरिया होकर डुबाया करती थी, गौ का खुर भी खाई होकर गिराया करता था लेकिन जब सत्संग में गये, गुरूओं की कृपा को पचाया तब अनुकूलता और प्रतिकूलता के दरिये भी बूँद से मालूम होते हैं। आत्मज्ञान की महिमा ऐसी है। साधक जब आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता है तब जीवन से सारे दुःख विदा होने लगते हैं।

ध्यान का मतलब केवल चुपचाप हो जाना नहीं है। ध्यान में चित्त अत्यंत एकाग्र हो जाय, शान्त हो जाय, स्थिर हो जाय उससे भी वह ऊँची अवस्था है कि चित्त का निर्माण हो। चित्त का शान्त होना एक बात है और चित्त का निर्माण होना दूसरी बात है। चित्त शान्त हो जायेगा उतनी देर शान्ति मिलेगी, आनन्द आयेगा, बाद में फिर जगत सच्चा भासेगा, थोड़ा सा सुख आकर्षित कर देगा, थोड़ा सा दुःख दबा देगा। लेकिन ध्यान में अगर आत्मविचार आता है, ब्रह्मविचार आता है, परमात्मभाव के संस्कारों को दुहराकर आत्माकार भाव पैदा होते हैं तो उससे चित्त का निर्माण होता है। चित्त के शान्त हो जाने से भी चित्त का निर्माण होना ऊँची बात है।

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ। इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया। वे भी दिन थे कि जब बूँद भी दरिया होकर दिखती थी और हमें डुबा ले जाती थी। जरा सा अपमान भी दरिया होकर दिखता था। जरा सा हवा का झोंका भी आँधी की नाईं दिखता था। लेकिन जब सत्संग और गुरूदेव की कृपा से, आत्मवेत्ता महापुरूष के उपदेश की कृपा से बड़े-बड़े दरिये भी कतरों की नाईं दिखते हैं। क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।

मोहमूल परमारथ नाँही।।

चित्त का अज्ञान से निर्माण हुआ इसीलिए यह जगत सत्य भासता है और जरा-जरा सी बातें सुख-दुःख, आकर्षण, परेशानी देकर हमें नोंच रही हैं।

ध्यान के द्वारा, सत्संग के द्वारा चित्त का ठीक रूप में निर्माण करना है, चित्त का परिमार्जन करना है। चित्त शान्त हो गया तो उसके संस्कार दब गये। जब उठे तो संस्कार फिर चालू हो गये। नींद में गये ते मैं यह हूँ…. मैं वह हूँ… ये सब संस्कार दब गये। नींद में कर्जे की चिन्ता नहीं रहती। लेकिन ये दुःख दूर नहीं हुए क्योंकि चित्त में जो संस्कार पड़े हैं वे गये नहीं। ये संस्कार दबे हैं। नींद से उठने पर सारा प्रपंच चालू हो जायगा, सारी चिन्ताएँ सिर पर सवार हो जायगी।

ध्यान-भजन का लक्ष्य यह नहीं है कि तुम्हारा चित्त केवल स्थिर हो जाय, बस। ध्यान-भजन का लक्ष्य है चित्त स्थिर हो और साथ ही साथ चित्त का निर्माण हो। ब्रह्माकार वृत्ति से, ब्रह्माकार भाव से चित्त का निर्माण होगा तो तुम्हारे चित्त पर कल्पित संसार के सुख-दुःख की ठोकर नहीं लगेगी। मिथ्या संसार का आकर्षण नहीं होगा। तुम्हारे हृदय में संसार का आकर्षण नहीं होगा तो वासना नहीं उठेगा। वासना नहीं उठेगी तो दुबारा जन्म लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका मोक्ष हो जायगा, बेड़ा पार हो जायगा।

पूजा करते हैं ठाकुरजी की, मंदिर में जाते हैं, मस्जिद में जाते हैं, गिरजाघर में जाते हैं लेकिन चित्त का निर्माण नहीं करते हैं तो संसारयात्रा का अन्त नहीं आता। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढ़ाः पदमव्ययं तत्।।

‘जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं’ – वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है।

चित्त के साथ, मन-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य का जो संग है, संसार के सम्बन्धों से जो दोष लग जाता है वह गिरा देता है। चित्त का ठीक से निर्माण हो जाय तो अध्यात्म में नित्य रमण हो जाय, कामनाएँ निवृत्त हो जायें, द्वन्द्वों से मुक्ति हो जाये। सुख और दुःख, मान और अपमान, अनुकूलता और प्रतिकूलता यश और अपयश, तन्दुरूस्ती और बीमारी, जीवन और मृत्यु, ये सब द्वन्द्व हैं। जो तन्दुरूस्ती से सुखी है वह बीमारी से दुःखी होगा। जो यश से सुखी होता है वह अपयश से दुःखी होगा। जो जीने में सुख मानेगा वह मरने में दुःखी होगा। लेकिन जीना मरना, मान-अपमान ये सब चित्त में देहात्मभाव के संस्कार पड़े हैं। अगर चित्त का निर्माण हो गया कि जीना मरना ये सब मेरा नहीं, माया का है, मेरा नहीं, इस देहरूपी खिलौने का है, यह देहरूपी खिलौने कई बार जीते हुए दिखते है, कई बार मरते हुए दिखते हैं फिर भी मेरी कभी मौत नहीं होती, तो शूली पर चढ़ते हुए भी दुःख नहीं होगा। लोगों को लगेगा कि मनसूर शूली पर चढ़े, ईसा क्रॉस पर चढ़े, अमुक बुद्ध पुरूष ने ध्यान करते हुए शरीर छोड़ा और मर गये। लोगों को ऐसा लगेगा लेकिन उन महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है। बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें। ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त। इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।

सारे जप, तप, सेवा, पूजा, यज्ञ, होम, हवन, दान, पुण्य ये सब चित्त को शुद्ध करते हैं, चित्त में पवित्र संस्कार भरते हैं। प्रतिदिन कुछ समय अवश्य निष्काम कर्म करना चाहिए। चित्त के कोष में कुछ आध्यात्मिकता की भरती हो। तिजोरी को भरने के लिए हम दिनरात दौड़ते हैं। जेब को भरने के लिए छटपटाते हैं लेकिन तिजोरी और जेब तो यहीं रह जायेंगे। हृदय की तिजोरी साथ में चलेगी। इस आध्यात्मिक कोष को भरने के लिए दिन भर में कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। संध्या-वन्दन, पूजा-प्रार्थना, ध्यान-जप, निष्काम कर्म इत्यादि के द्वारा चित्त का निर्माण कीजिये।

उच्च विचार करते हुए हृदय में खुले आकाश की विशालता भर जाने दो। ॐकार का पवित्र जप करते-करते हृदय को विशाल होता अनुभव करो। शान्ति और आनन्द से हृदय भरा जा रहा है। यह आत्मानन्द की… विशुद्ध परमात्मा की, चिदानन्द-स्वरूप परमात्मा की झलक पाने का तरीका है।

 

नमस्कार की महिमा

 

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नमस्कार की महिमा

प्रतिदिन सुबह-शाम माता-पिता एवं गुरुजनों के चरणों में प्रणाम करना चाहिए। नमस्कार की बड़ी महिमा है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य बर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।

जो प्रतिदिन बड़ों की सेवा करता है, उनके चरणों में प्रणाम करता है एवं उनकी सीख के अनुसार चलता है उसकी आयुष्य, विद्या, यश एवं बल चारों बढ़ते हैं।

मृकन्डु नामक ऋषि थे। उनके पुत्र थे मार्कण्डेय। वे बाल्यकाल से ही पिता के संस्कार-सिंचन के अनुसार माता-पिता, गुरूजनों एवं संत-महात्माओं को नमस्कार करते। एक बार कोई सिद्ध महात्मा उनके यहाँ आये। पिता ने बालक मार्कण्डेय से कहाः”बेटा ! महात्माजी को प्रणाम करो।”

बालक मार्कण्डेय ने झुककर चरणस्पर्श किया एवं सिद्धपुरुष की चरणरज को सादर मस्तक पर चढ़ाया। महात्मा उस बालक को एकटक देखते रहे मानो, उसके भावी जीवन पर दृष्टिपात कर रहे हों ! ऋषि ने पूछाः

“महाराज ! आप इस प्रकार एकटक क्या देख रहे हैं ?”

“बालक तो सुंदर है किंतु इसकी आयु अब बहुत ही कम शेष है।”

इतना कहकर उन सिद्धपुरुष ने पुनः विषादपूर्ण नेत्रों से बालक की तरफ निहारा।

ऋषि तो अपने लाडले पुत्र के विषय में यह दुःखद बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये ! उन्होंने हाथ जोड़कर महात्मा से विनती कीः

“प्रभो ! इसका कोई उपाय ?”

“जो भी संत-महापुरुष आयें, ऋषि-मुनि आयें, उनके चरणों में इस बालक से प्रणाम करवाओ।” यह कहकर सिद्धपुरुष चल पड़े। मृकण्डु ऋषि ऐसा ही करवाने लगे। एक दिन सप्तऋषि पधारे। पिता ने बालक से प्रेम से कहाः “बेटा ! ऋषियों को नमस्कार करो।”

मार्कण्डेय ने खूब भावपूर्वक प्रणाम किया। सप्तऋषियों ने बालक के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दियाः “चिरंजीवी हो।”

पिता ने कहाः “महाराज ! इसकी आयु कम है एवं इसको आपके द्वारा चिरंजीवी होने का आशीर्वाद मिला है। प्रभो ! अब आपके आशीर्वाद के अनुकूल होने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?”

“अब ऐसा करो, इस बालक को भगवान शंकर की सेवा में, पूजा-आराधना-उपासना में लगा दो। सब ठीक होगा।”

मृकण्डु ऋषि ने बालक मार्कण्डेय को देवाधिदेव महादेव की उपासना-आराधना में प्रवृत्त कर दिया। निर्दोष बालक मार्कण्डेय शिवजी की सेवा-पूजा में मग्न हो गया। प्रातःकाल जल्दी उठकर, स्नानादि से पवित्र होकर वह भगवान शिव के लिंग को स्नान कराता, बिलिपत्र, फल-फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि चढ़ाता, प्रार्थना कराता, आसन पर बैठकर हाथ में माला लेकर ॐ नमः शिवाय का जप करता, ध्यान करता, स्तुति-स्तोत्रों का गान करता। इस प्रकार समय बीत रहा था।

मृत्यु की घड़ियाँ निकट आ गयीं। काले विकराल भैंसे पर लाल-लाल वर्णवाले यमराज प्रगट हुए। उन्हें देखकर बालक डर गया। घबराकर भगवान शंकर के लिंग को आलिंगन करके कहने लगाः “हे भगवान ! ये यमराज आ गये। बचाओ…. बचाओ।”

भगवान शंकर हाथ में त्रिशूल लेकर प्रगट हो गये एवं यमराज से बोलेः

“इस बालक को कहाँ ले जाते हो ?”

यमराजः “महाराज ! इसकी आयुष्य पूरी हो गयी है। सृष्टि के क्रम के अनुसार मैं अपने कर्त्तव्य का पालन करने आया हूँ।”

“अरे यमराज ! देखो तो अपने बहीखाते में…. इसकी आयु कहाँ पूरी हुई है ?”

यमराज ने बहीखाता देखा तो बालक के खाते में लंबी आयु जमा देखी। सृष्टि का सहार करने वाले देवाधिदेव योगीश्वर पशुपतिनाथ जिसका रक्षण करें उसका कोई बाल तक बाँका कैसे कर सकता है ?

“चलो, भागो यहाँ से” रूद्र गरज उठे। यमराज ने विदा ली। मार्कण्डेय चिरंजीवी बन गये। किसके प्रभाव से ? नमस्कार के प्रभाव से। ऐसी महिमा है नमस्कार की !

नमस्कार से रामदास, कर्म सभी कट जाय।

जाय मिले परब्रह्म में, आवागमन मिटाय।।

प्रतिदिन सुबह माता-पिता एवं पूजनीय-आदरणीय गुरुजनों को नमस्कार करो, प्रणाम करो। उनके आशीर्वाद लो। बड़े भाई, बड़ी बहन को भी नमस्कार करो। घर में यदि बड़े लोग इस नियम को अपनायेंगे तो छोटे बालक स्वयं ही उसका अनुकरण करेंगे। परस्पर नमस्कार करने से कुटुम्ब में दिव्य भावनाएँ प्रबल होंगी तो लड़ाई-झगड़ों एवं कटुता के लिए अवकाश ही नहीं रहेगा। संयोगवशात् यदि कुछ खटपट होगी भी तो लंबी नहीं टिकेगी। परिवार का जीवन मधुर बन जायेगा। परमार्थ साधना सरल हो जायेगा।

दुःख पुण्य का फल है।

 

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दुःख पुण्य का फल है।

सुख अगर अपने में फँसाता है तो वह दुःख भी खतरनाक है। दुःख अगर उद्वेग और आवेश देकर बहिर्मुख बनाता है, गलत प्रवृत्ति में घसीटता है तो वह पाप का फल है। दुःख अगर सत्संग में ले जाता है तो वह दुःख पुण्य का फल है। वह पुण्यमिश्रित पुण्य है।

जिसका शुद्ध पुण्य होता है, वह शुद्ध सुख में आता है। जिसका शुद्ध पुण्य होता है, उसको दुःख भी परम सुख के द्वार पर ले जाता है। पुण्य अगर पाप मिश्रित है तो सुख भी विकारी खड्डों में गिरता है और दुःख भी आवेश की गहरी खाइयों में गिराता है।

पुण्यात्मा सुख से भी फायदा उठाते हैं और दुःख से भी फायदा उठाते हैं। पापात्मा दुःख से ज्यादा दुःखी होते हैं और सुख में भी भविष्य के लिए बड़ा दुःख बनाने की कुचेष्टा करते हैं।

इसलिए परमात्मा को प्यार करते हुए पुण्यात्मा होते जाओ। परमात्मा के नाते कर्म करते हुए पुण्यात्मा होते जाओ। परमात्मा अपना आपा है, ऐसा ज्ञान बढ़ाते हुए महात्मा होते जाओ।

वस्त्र गेरूए बनाकर महात्मा होने को मैं नहीं कहता। एक आदमी अपने आपको विषय-विलास या विकार में, शरीर के सुखों में खर्च रहा है। वह गलत राह पर है। उसका भविष्य दुःखद और अन्धकार होगा। दूसरा आदमी सब कुछ छोड़कर निर्जन जंगल में रहता है, अपने शरीर को सुखाता है, मन को तपाता है। ‘संसार में खराब है, मायाजाल है…. यह ऐसा है… वह ऐसा है…. इनसे बचो….’ ऐसा करके जो बिल्कुल त्याग करता है… त्याग… त्याग… त्याग.. ज्ञान सहित त्याग नहीं बल्कि एक धारा में बहता चला जाता है, वह भी गलत रास्ते की यात्रा करता है।

बुद्धिमान तो वह है जो सब में सब होकर बैठा है उस पर निगाह डाले, मोह-ममता का त्याग करे, संकीर्णता का त्याग करे, अहंकार का त्याग करे, उद्वेग और आवेश का त्याग करे, विषय विकारों का त्याग करे। ऐसा त्याग तब सिद्ध होगा, जब आत्मज्ञान की निगाहों से देखोगे, ब्रह्मज्ञान की निगाहों से देखोगे।

भगवान के अवतार

 

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भगवान के अवतार

जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।

ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।

भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।

अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा…. और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।

शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।

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