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निजस्वरूप का बोध

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निजस्वरूप का बोध

तरंगे सागर में लीन होने लगती है तो वे अपना तरंगपना छोड़कर जलरूप हो जाती है। हमारी तमाम वृत्तियों का मूल उदगम्-स्थान…. अधिष्ठान परमात्मा है। हम यह शरीरधारी हैं…. हमारा यह नाम है…. हमारी वह जाति है….. हमारे ये सगे-सम्बन्धी हैं…. हम इस जगत में रहते हैं…. ये तमाम प्रपंच हमारी वृत्तियों के खेल हैं। हमारी वृत्ति अपने मूल उदगम्-स्थान आनन्दस्वरूप परमात्मा में डूब गई, लीन हो गई तो न यह शरीर है न उसका कोई नाम है, न उसकी कोई जाति है, न उसके कोई सगे सम्बन्धी हैं और न कोई जगत ही है। केवल आनंदस्वरूप परमात्मा ही परमात्मा है। वह परमात्मा मैं हूँ। एक बार यह सत्य आत्मसात हो  गया, भली प्रकार निजस्वरूप का बोध हो गया, फिर चाहे करोड़ों-करोड़ों वृत्तियाँ उठती रहें, करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड बनते रहें….. बिगड़ते रहें फिर भी उस बुद्ध पुरुष को कोई हानि नहीं।

अव्यक्त तत्व का अनुसंधान

 

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अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।

‘बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।”

(गीताः 7.24)

जो बुद्धिमान हैं, मेधावी हैं वे भगवान को साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्तरूप में मानते हैं। जो बुद्धिमान नहीं हैं वे भगवान को साकार रूप में मानते हैं और निराकार तत्त्व के तरफ उनकी गति नहीं होती। जो मूर्ख हैं, बुद्धु हैं वे न भगवान के साकार रूप को मानते हैं न निराकार रूप को मानते हैं, वरन् अपनी मति एवं कल्पना में जो बात आती है उसी को मानते हैं

चार प्रकार की कृपा होती हैः

ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा।

ईश्वरकृपाः ईश्वर में प्रीति हो जाये, ईश्वर के वचनों को समझने की रूचि हो जाये, ईश्वर की ओर हमारा चित्त झुक जाये, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा हो जाये यह ईश्वर की कृपा है।

शास्त्रकृपाः शास्त्र का तत्त्व समझ में आ जाये, शास्त्र का लक्ष्यार्थ समझ में आने लग जाये यह शास्त्रकृपा है।

गुरुकृपाः गुरु हमें अपना समझकर, शिष्य, साधक या भक्त समझकर अपने अनुभव को व्यक्त करने लग जायें यह गुरुकृपा है।

आत्मकृपाः हम उस आत्मा परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त हो जायें, अपने देह, मन, इन्द्रियों से परे, इन सबको सत्ता देने वाले उस अव्यक्त स्वरूप को पहचानने की क्षमता हममें आ जायें यह आत्मकृपा है।

आत्मज्ञान हो लेकिन ज्ञान होने का अभिमान न हो तो समझ लेना की आत्मकृपा है। अपने को ज्ञान हो जाये फिर दूसरे अज्ञानी, मूढ़ दिखें और अपने को श्रेष्ठ मानने का भाव आये तो यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम होता है क्योंकि ज्ञान से सर्वव्यापक वस्तु का बोध होता है। उसमें अपने को पृथक करके दूसरे को हीन देखने की दृष्टि रह ही नहीं सकती। फिर तो भावसहित सब अपना ही स्वरूप दिखता है।

गर्मी-सर्दी देह को लगती है, मान-अपमान, हर्ष-शोक मन में होता है तथा राग-द्वेष मति के धर्म होते हैं यह समझ में आ जाये तो मति के साथ, मन के साथ, इन्द्रियों के साथ हमारा जो तादात्म्य जुड़ा है वह तादात्म्य दूर हो जाता है। शरीर चाहे कितना भी सुडौल हो, मजबूत हो, मन चाहे कितना भी शुद्ध और पवित्र हो, बुद्धि एकाग्र हो लेकिन जब तक अपने स्वरूप को नहीं जाना तब तक न जाने कब शरीर धोखा दे दे? कब मन धोखा दे दे? कब बुद्धि धोखा दे दे? कोई पता नहीं। क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है और प्रकृति परिवर्तनशील है।

संसार की चीजें बदलती हैं। शरीर बदलता है। अन्तःकरण बदलता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जो कुछ देखने में आता है वह सब व्यक्त है। भूख-प्यास भी तो मन से देखने में आती है। सर्दी-गर्मी का पता त्वचा से चलता है किन्तु उसमें वृत्ति का संयोग होता है अतः वह भी तो व्यक्त ही है। इसीलिए भगवान कहते हैं किः ‘जो मूढ़ लोग हैं वे मेरे अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानते और मुझे जन्मने-मरने वाला मानते हैं। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्तिभाव को प्राप्त होते हैं।

….और मजे की बात है कि जो आदमी जहाँ है और जैसा है, वहीं से और वैसा ही वह दूसरे को देखता है।

बुद्धिहीन से तात्पर्य अँगूठाछाप से नहीं है वरन् जिसको पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, जिस तत्त्व को समझने के लिए बुद्धि मिली है उस तत्त्व में बुद्धि के न लगाकर हीन पदार्थों में उसे खर्च कर दिया, वह बुद्धिहीन है।

भगवान ने क्रियाशक्ति दी है तो क्रियाशक्ति से क्रिया को बढ़ाकर अपने को जंजाल में न डालें लेकिन क्रियाशक्ति को सत्कर्म में लगाकर अनंत जन्मों के कर्मों को काटने का प्रयत्न करें। जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है ऐसे ही कर्म से कर्म काटे जायें।

ईश्वर ने बुद्धिशक्ति दी है तो बुद्धि से हम जगत के पदार्थों के साथ बँधे नहीं लेकिन जहाँ से बुद्धि को सत्ता मिलती है उस अव्यक्त स्वरूप में बुद्धि को लगायें ताकि बुद्धि बुद्धि न बचे बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये।

बुद्धि को ऋतंभरा प्रज्ञा बनाने के दो तरीके हैं-

योगमार्ग और ज्ञानमार्ग।

योगमार्ग में धारणा-ध्यान करके, चित्त की वृत्ति का निरोध करके अपने स्वरूप का अनुसंधान किया जाये। बारंबार निरोधाकार वृत्ति बन जाये तो इससे भी बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा होने लगती है।

ज्ञानमार्ग के अनुसार दूसरा तरीका यह है कि बारंबार उस सच्चिदानंदघन, अज, अविनाशी, शुद्ध, बुद्ध, साक्षी, दृष्टा, असंग, निर्विकार, चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया जाये और जगत का व्यवहार करते हुए, बातचीत करते हुए फिर जगत का बाध कर दिया जाये…. यह ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ की प्रक्रिया है। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः ”कोई ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण बार-बार पढ़े और आत्मज्ञान न हो तो राम बादशाह सिर कटायेगा।”

‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में लीलावती, चुडाला, मंकी ऋषि आदि की कथाएँ आयेंगी और बाद में वशिष्ठ जी महाराज कहेंगे किः “हे रामजी ! वास्तव में बना कुछ नहीं।यह चित्त का फुरना मात्र है।” यही बात शंकराचार्य जी ने कही हैः

नास्ति अविद्या मनसोऽतिरक्ता

मनैवऽविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन्विलीने सकलं विलीनं

तस्मिन्जिगीर्णे सकलं जिगीर्णम्।।

यह अविद्या मन से अलग नहीं है। माया… माया…. माया… माया कोई लाल, पीली, हरी या सफेद साड़ी पहनी हुई महिला नहीं है। माया का मतलब हैः या मा सा माया। जो है नहीं फिर भी दिखे उसका नाम है माया। यह जो कुछ भी दिखता है वह नहीं है। जो नहीं है वह दिख रहा है और जो है वह दिखता नहीं है।

जो है वह दिखता क्यों नहीं? क्योंकि वह अव्यक्त है और हम लोग जीते हैं व्यक्त में। हम लोग व्यक्त होने वाले को मैं मानते हैं तो व्यक्त सच्चा लगता है लेकिन जिसके आधार पर है, उसका पता नहीं।

भगवान के अवतार

 

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भगवान के अवतार

जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।

ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।

भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।

अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा…. और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।

शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।

मरने की कला

 

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“कैसे मरें ?”

मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोई।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होई।।

बुद्ध के पास जब कोई भिक्षु बनने को आता तो बुद्ध बोलते कि एक बार मरकर फिर आ जाओ।

“कैसे मरें ?”

“जाओ स्मशान में। कोई मुर्दा जलता हो उसको देखो। उसके साथ अपने शरीर का तादात्म्य सोचो। किसी के धन के साथ, किसी के रूप-लावण्य के साथ एकता नहीं हो सकती। किसी का शरीर जल रहा है तो हमारा भी जलेगा इसमें एकता हो सकेगी। जब मुर्दा जलता हो तो हमारा जी भी जलेगा इसमें एकता हो सकेगी। जब मुर्दा जलता हो तो तब समझो कि मैं ही जल रहा हूँ…. मैं ही जल रहा हूँ…. मैं ही जल रहा हूँ….। आज तक जिसको मैं मान रहे रो उसको ठीक तरह से जलाकर आओ मन ही मन।”

इस प्रकार नये होने वाले भिक्षुकों को बुद्ध छः महीना तक सादृश्य योग करवाते। बाद में उन्हें दीक्षा देते।

तुम लोग श्मशान में जाकर सादृश्य योग करो यह संभव नहीं है। ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक में यह सादृश्य योग पद्धति है। उसको बार-बार पढ़ो। तुम्हारे मन और बुद्धि झख मारके ईश्वर में आयेंगे…..आयेंगे…. आयेंगी ही। दूसरी जगह जाने की उसकी ताकत नहीं।

भागवत की कथा के प्रारम्भ में आता है कि भक्ति रो रही थी। क्यों ? उसके दो पुत्र ज्ञान और वैराग्य मूर्छित थे। जिस माँ के दो-दो बेटे मूर्छित पड़े हों वह माँ तो रोयेगी ही। कलियुग में अगर भक्ति करना हो तो उसके दो बेटे जो ज्ञान और वैराग्य हैं उनको सचेत करना पड़ेगा । कलियुग में श्मशान में ज्ञान-वैराग्य को निवास करने का वरदान मिला है। शरीर से श्मशान में नहीं जाते तो मन से ही कभी-कभी श्मशान की मुलाकात कर लिया करो। कोई अर्थी जाती हुई दिखे तो मन को समझा दो, तेरी भी यही हालत होने वाली है। इससे विवेक वैराग्य बढ़ेगा।

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

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विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

 

जब भगवान के सिवाय सब बेकार लगे तो समझो कि वह पहली भूमिका पर पहुँचा है । उसके लिए विघ्न-बाधाएँ साधन बन जाएँगी । विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है । विघ्न-बाधाएँ नहीं आयें तो संगीत छिड़ेगा नहीं ।

भौंरी कीड़े को उठाकर अपने बिल में रखती है । एक डंक मारती है, वह कीड़ा छटपटाता है । उसके शरीर से पसीने जैसा कुछ प्रवाह निकलता है । फिर भौंरी जब दूसरा डंक मारती है तब कीड़ा तेजी से छटपटाता है और वह पसीना कड़ा हो जाता है, जाला बन जाता है । जब तीसरा डंक मारती है तो कीड़ा खूब छटपटाता है, बहुत दुःखी होता है मगर उस डंक के कारण पसीने से जो जाला बना है उसी में से पंख फूट निकलते हैं और वह उड़ान भरता है ।

वैज्ञानिकों ने कीड़े में से मकड़ी बनने की इस प्रक्रिया को देखा । भौंरी के द्वारा तीसरे डंक सहने की तीव्र पीड़ा से उन कीड़ों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बारीक कैंची बनाई और तीसरे डंक से कीड़ा छटपटाकर जाला काटे उसकी अपेक्षा उन्होंने कैंची से वह जाला काट दिया । कीड़े को राहत मिली, पीड़ा तो नहीं हुई, मगर फिर उसके पंख नहीं फूटे । उड़ान भरने की योग्यता उसमें नहीं आयी ।

ऐसे ही परमात्मा जब अपने साधक को अपनी दिव्य अनुभूति में उड़ान भरवाते हैं तब उसको चारों तरफ से विघ्न-बाधाएँ देते हैं ताकि उसका विचारबल, मनोबल, समझशक्ति एवंआत्मशक्ति बढ़ जाये । मीरा के लिए परमात्मा ने राणा को तैयार कर दिया । नरसिंह मेहता का भाई ही उनका विरोध करता था, साथ में पूरी नगरी जुड़ गयी । शबरी भीलनी हो, चाहे संतकबीर हो, चाहे एकनाथ जी हों या संत तुकाराम हों, कोई भी हो, लोग ऐसे भक्तों के लिए एक प्रकार का जाला बना लेते हैं । एकनाथ जी महाराज के खिलाफ हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर एक चांडाल चौकड़ी बनायी थी ।

जैसे कीड़े के लिए तीसरा डंक पंख फूट निकलने के लिए होता है ऐसे ही प्रकृति की ओर से यह सारा खिलवाड़ साधक के उत्थान के लिए होता है । जिन्हे सत्संग का सहारा नहीं है, पहली दूसरी भूमिका में दृढ़ता नहीं है वे हिल जाते हैं ।

बुद्ध के मन में एक बार आया कि यहाँ तो कोई पहचानता भी नहीं, खाने का भी ठिकाना नहीं है, लोग मुझ पर थूकते हैं, हालाँकि मैं उन्हें कुछ कहता भी नहीं । यह भी कोई ज़िन्दगी है! चलो, वापस घर चलें । उस समय वे सिद्धार्थ थे । सत्संग का सहारा नहीं था । पहली भूमिका में दृढ़ता चाहिए । बचपन का वैराग्य हो तो ठीक है मगर बुढ़ापे में वैराग्य जगा है या फिर भी भोग भोगने के बाद, बच्चों को जन्म देने के बाद पहली भूमिका मिली हो तो जरा कमजोर है । बुद्ध के मन में आया कि चलो घर जायें । उन्हीं विचारों में खोये से बैठे थे । इतने में देखते हैं कि सामने पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया । सिद्धार्थ उसको ध्यान से देख रहे थे । उन्होंने सोचा कि यह कोई झूठी घटना नहीं है । यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

सिद्धार्थ की पहली भूमिका थी । अपने आप संस्कार जग गये । सिद्धार्थ ने निश्चय कर लियाः “कार्यं साधयामि व देहं पातयामि । या तो कार्य साध लूँगा या मर जाऊँगा । महल में भी एक दिन मर ही जाना है । साधना करते-करते भी मर जाऊँगा तो हर्ज नहीं । ऐसा सोचकर पक्की गाँठ बाँध ली और चल पड़े । सात साल के अन्दर ही उन्हें परम शांति मिल गयी ।

जब आदमी के शुभ विचार जगते हैं तब स्नान, दान, सेवा, स्मरण, सत्संग परहित उसे अच्छे लगते हैं । जिसे पहली भूमिका प्राप्त नहीं हुई उसे इन सब कार्यों के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी । वहाँ से वह पलायन हो जायेगा । उसे वह सब अच्छा नहीं लगेगा । वाह-वाही पाने, यश कमाने को तो आगे आ जायेगा पर फिर खिसक जायेगा । ऐसे लोग फिर पशु, पक्षी, कीट की निम्न योनियों में जाते हैं ।

दूसरी भूमिका होती है शुभेच्छा । ‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि परमात्मा मिले, ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह से देहातीत तत्त्व का साक्षात्कार हो जाये? अफसर, साहब, सेठ, साहूकार बन गये मगर आखिर क्या?’ ऐसा विचार उसे आता रहता है ।

यह दूसरी भूमिका जिसे प्राप्त हो गई वह घर में भी है तो घर वाले उसे दबा नहीं सकेंगे । सत्संग और सत्कर्म में रूचि रहेगी । भोग-वासना फीकी पड़ जायेगी । मगर फिर रोकने वाले आ जायेंगे । उसे महसूस होगा कि ईश्वर के रास्ते में जाने में बहुत सारे फायदे हैं । विघ्न करने वाले साधक के आगे आखिर हार मान जायेंगे । ईश्वर का दर्शन तो इतने में नहीं होगा मगर जो संसार कोसता था वह अनुकूल होने लगेगा ।

उसके बाद तीसरी भूमिका आयेगी, उसमें सत्संग के वचन बड़े मीठे लगेंगे । उन्हीं वचनों का निदिध्यासन करेगा, ध्यान करेगा, श्वासोच्छोवास को देखेगा । ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ’ ऐसा चिन्तन-ध्यान करेगा । गुरुदेव का ध्यान करेगा तो गुरुदेव दिखने लगेंगे । गुरुदेव से मानसिक बातचीत भी होगी, प्रसन्नता और आनंद आने लगेगा । संसार का आकर्षण बिल्कुल कम हो जायेगा। फिर भी कभी-कभी संसार लुभाकर गिरा देगा । फिर से उठ खड़ा होगा । फिर से गिरायेगा, फिर खड़ा होगा । परमात्मा का रस भी मिलता रहेगा और संसार का रस कभी-कभी खींचता रहेगा । ऐसा करते-करते चौथी भूमिका आ जाती है तब साक्षात्कार हो जाता है फिर संसार का आकर्षण नहीं रहता । जब स्वप्न में से उठे तो फिर स्वप्न की चीजों का आकर्षण खत्म हो गया । चाहे वे चीज़ें अच्छी थीं या बुरी थीं । चाहे दुःख मिला, चाहे सुख मिला, स्वप्न की चीज़ें साथ में लेकर कोई भी आदमी जग नहीं सकता । उन्हें स्वप्न में ही छोड़ देता है । ऐसे ही जगत की सत्यता साथ में लेकर साक्षात्कार नहीं होता । चौथी भूमिका में जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है । वृत्ति व्यापक हो जाती है । वह महापुरुष होते हुए भी अनेक ब्रह्माण्डों में फैल जाता है । उसको यह अनुभव होता है कि सूरज मुझमें है, चन्द्र मुझमें है, नक्षत्र मुझमें हैं । यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद भी मुझमें हैं । ऐसा उन महापुरुषों का अनुभव होता है । उनको कहा जाता हैब्रह्मवेत्ता । वे ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं ।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता

ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरुष विधाता

ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाईं आधा आखर

नानक! ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर

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