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एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य

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एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य

तपः सु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः।

एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य होता है। मन अगर चंचल है विक्षिप्त है तो मनुष्य को दुःखों की गर्त में खींच ले जाता है। चंचल मन में आने वाले विचारों के मुताबिक, इच्छाओं के मुताबिक आदमी सब कार्य करता जाय बिना सोचे-समझे, बिना विवेक किये, तो मन पदार्थों की गुलामी में आदमी को दीन-हीन बना देता है।

चंचल मन कमजोर होता है। कमजोर मन अधिक सुरक्षाएँ ढूँढता है। मन जितना कमजोर, सुरक्षा की आवश्यकता उतनी ज्यादा। अपने को बुद्धिमान् मानने वाले बड़े-बड़े लोग मन की चंचलता में आकर कमजोर हो जाते हैं। अपने सुख की सुरक्षा के लिए पूरी अक्ल-होशियारी भौतिक चीजों को इकट्ठी करने में लगा देते हैं। फिर उन चीजों को, धन-सम्पत्ति को अधिक सुरक्षित करने के लिए देश छोड़कर विदेश में ले जाते हैं। वे जब पकड़े जाते हैं तो अति दीनता को प्राप्त होते हैं अथवा तो मृत्यु के समय वही संपत्ति की चिन्ता उनको प्रेत बनाकर भटकाती है।

मन भौतिक चीजों का आश्रय जितना अधिक लेता है उतना भीतर से खोखला हो जाता है। मन भीतर से जितना खोखला होता है उतनी अधिक सुरक्षा चाहता है। जितनी अधिक सुरक्षा चाहता है उतना अधिक झपेटा जाता है। यह सनातन सत्य है।

माउन्ट आबू में हम नलगुफा में रहते थे। उसके पीछे पाण्डव गुफा है। वहाँ के एक पुराने साधू ने मुझे बताया कि झरने के पास रात्रि को शेर आता है। अभी कुछ दिन पहले आया था और एक बन्दर को पकड़कर खा गया।

शेर ने बन्दर को कैसे पकड़ा? बन्दर तो वृक्ष की ऊँची डालियों पर होते हैं। शेर वहाँ पहुँच नहीं सकता। वह बन्दर को कैसे पकड़ता है?

शेर पहले आकर जोर से दहाड़ता है। यह सुनकर बन्दर घबड़ा जाते हैं। उनकी टट्टी-पेशाब छूट जाती है। शेर जब दूसरी बार दहाड़ता है तो बन्दर के लिए पेड़ पर इधर-उधर भाग-दौड़ करते हैं, चिल्लाते हैं, हताश हो जाते हैं, बुद्धि व दृष्टि ठीक से काम नहीं देती। भय के मारे सन्तुलन खो बैठते हैं और वृक्ष से गिर पड़ते हैं, शेर के शिकार बन जाते हैं।

जंगल में दूसरे प्राणी भी छिपकर बैठे होते हैं। शेर की दहाड़ सुनकर जब वे सुरक्षा के लिए भाग-दौड़ करते हैं, कोई दूसरा स्थान खोजने के लिए बाहर निकल कर भागते हैं तो शेर की झपट में आ जाते हैं। बिल्ली भी रात्रि को डरावनी आवाज करती है तो चूहे डर के मारे भाग-दौड़ करते हैं और झपेटे जाते हैं।

मन पदार्थों के साथ, प्रतिष्ठा के साथ, देहाभिमान के साथ जुड़ जाता है तो भीतर से खोखला हो जाता है। खोखला मन बाह्य साधनों में सुरक्षा खोजता है। फलतः व्यक्ति मनोबल खो बैठता है। मन एकाग्र होता है तो वह भीतर से अपने को बलवान महसूस करता है एकाग्रता के तप के आगे बाहर का धन, बाहर की सत्ता, बाहर की सुरक्षा कोई मूल्य नहीं रखती।

एकाग्र मन स्वयं प्रसन्न रहता है, बुद्धि का विकास होता है, जीवन भीतर से परितृप्त और जीने योग्य होता है। व्यक्ति का मन जितना एकाग्र होता है, समाज पर उसकी वाणी का, उसके हाव भाव का, उसके क्रिया-कलापों का उतना ही गहरा प्रभाव पड़ता है। उसका जीवन चमक उठता है।

एकाग्रतारूपी खजाना प्राप्त करने के कई तरीके हैं। उन सबमें त्राटक भी एक तरीका है। त्राटक के कुछ प्रयोग यहाँ जानेंगे। आप हिमालय में जाकर साधना नहीं कर सकते, आश्रम में सदा रहकर भी आप अभ्यास नहीं कर सकते लेकिन ये प्रयोग अपने घर में ही करके लाभ उठा सकते हैं।

अपने ध्यान-भजन-साधना के कमरे में ॐ अथवा स्वस्तिक का एक चित्र बना लो। भूमि पर बिछे हुए आसन पर आप बैठें तो वह चित्र आपकी आँखों के ठीक सामने रहे इस प्रकार तीन-चार फीट दूर रख दो। चित्र आँखों के ठीक सामने हो, न ऊँचा हो न नीचा हो।

त्राटक का अभ्यास करने के लिए हररोज एक निश्चित समय पर एक ही जगह बैठने से अधिक लाभ होगा। चित्र के सामने आसन पर स्वस्थ होकर सीधे बैठ जाओ। आँखें खुली रखकर उस चित्र को अपलक नेत्रों से देखते रहो। दृष्टि को एक ही बिन्दु पर एकाग्र कर दो। आँखों की पलकें गिरें नहीं। दृष्टि एकटक रहे, शरीर अडोल रहे।

प्रारम्भ में जरा कठिन लगेगा। थकान लगेगी, उबान आयेगी, आँखों की पलकें गिरने लगेंगी फिर भी दृढ़ होकर अभ्यास जारी रखो। जब तक आँखों से पानी न टपके तब तक उस चित्र को एकटक निहारते रहो… निहारते रहो… पाँच मिनट… सात मिनट… दस मिनट…. पंद्रह मिनट… अभ्यास बढ़ाते जाओ। जितना आगे बढ़ोगे उतना अधिक लाभ होगा। इस प्रयोग में कोई खतरा नहीं, कोई हानि नहीं।

अपने कमरे में घी का दीया जला दो। मोमबत्ती भी चल सकती है। यदि घी का दीया हो तो अच्छा है। उसको थोड़ी दूर रखकर उसकी लौ को एकटक, अपलक नेत्रों से देखते रहो। शरीर सीधा व अडोल रहे। आँखों की पलकें न गिरें। आँखों से पानी टपके तब तक देखते रहो…. निहारते रहो। आपके मन की एकाग्रता बढ़ती जायेगी।

चित्त का निर्माण

 

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चित्त का निर्माण

एक समय था जब बूँद भी दरिया होकर डुबाया करती थी, गौ का खुर भी खाई होकर गिराया करता था लेकिन जब सत्संग में गये, गुरूओं की कृपा को पचाया तब अनुकूलता और प्रतिकूलता के दरिये भी बूँद से मालूम होते हैं। आत्मज्ञान की महिमा ऐसी है। साधक जब आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता है तब जीवन से सारे दुःख विदा होने लगते हैं।

ध्यान का मतलब केवल चुपचाप हो जाना नहीं है। ध्यान में चित्त अत्यंत एकाग्र हो जाय, शान्त हो जाय, स्थिर हो जाय उससे भी वह ऊँची अवस्था है कि चित्त का निर्माण हो। चित्त का शान्त होना एक बात है और चित्त का निर्माण होना दूसरी बात है। चित्त शान्त हो जायेगा उतनी देर शान्ति मिलेगी, आनन्द आयेगा, बाद में फिर जगत सच्चा भासेगा, थोड़ा सा सुख आकर्षित कर देगा, थोड़ा सा दुःख दबा देगा। लेकिन ध्यान में अगर आत्मविचार आता है, ब्रह्मविचार आता है, परमात्मभाव के संस्कारों को दुहराकर आत्माकार भाव पैदा होते हैं तो उससे चित्त का निर्माण होता है। चित्त के शान्त हो जाने से भी चित्त का निर्माण होना ऊँची बात है।

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ। इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया। वे भी दिन थे कि जब बूँद भी दरिया होकर दिखती थी और हमें डुबा ले जाती थी। जरा सा अपमान भी दरिया होकर दिखता था। जरा सा हवा का झोंका भी आँधी की नाईं दिखता था। लेकिन जब सत्संग और गुरूदेव की कृपा से, आत्मवेत्ता महापुरूष के उपदेश की कृपा से बड़े-बड़े दरिये भी कतरों की नाईं दिखते हैं। क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।

मोहमूल परमारथ नाँही।।

चित्त का अज्ञान से निर्माण हुआ इसीलिए यह जगत सत्य भासता है और जरा-जरा सी बातें सुख-दुःख, आकर्षण, परेशानी देकर हमें नोंच रही हैं।

ध्यान के द्वारा, सत्संग के द्वारा चित्त का ठीक रूप में निर्माण करना है, चित्त का परिमार्जन करना है। चित्त शान्त हो गया तो उसके संस्कार दब गये। जब उठे तो संस्कार फिर चालू हो गये। नींद में गये ते मैं यह हूँ…. मैं वह हूँ… ये सब संस्कार दब गये। नींद में कर्जे की चिन्ता नहीं रहती। लेकिन ये दुःख दूर नहीं हुए क्योंकि चित्त में जो संस्कार पड़े हैं वे गये नहीं। ये संस्कार दबे हैं। नींद से उठने पर सारा प्रपंच चालू हो जायगा, सारी चिन्ताएँ सिर पर सवार हो जायगी।

ध्यान-भजन का लक्ष्य यह नहीं है कि तुम्हारा चित्त केवल स्थिर हो जाय, बस। ध्यान-भजन का लक्ष्य है चित्त स्थिर हो और साथ ही साथ चित्त का निर्माण हो। ब्रह्माकार वृत्ति से, ब्रह्माकार भाव से चित्त का निर्माण होगा तो तुम्हारे चित्त पर कल्पित संसार के सुख-दुःख की ठोकर नहीं लगेगी। मिथ्या संसार का आकर्षण नहीं होगा। तुम्हारे हृदय में संसार का आकर्षण नहीं होगा तो वासना नहीं उठेगा। वासना नहीं उठेगी तो दुबारा जन्म लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका मोक्ष हो जायगा, बेड़ा पार हो जायगा।

पूजा करते हैं ठाकुरजी की, मंदिर में जाते हैं, मस्जिद में जाते हैं, गिरजाघर में जाते हैं लेकिन चित्त का निर्माण नहीं करते हैं तो संसारयात्रा का अन्त नहीं आता। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढ़ाः पदमव्ययं तत्।।

‘जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं’ – वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है।

चित्त के साथ, मन-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य का जो संग है, संसार के सम्बन्धों से जो दोष लग जाता है वह गिरा देता है। चित्त का ठीक से निर्माण हो जाय तो अध्यात्म में नित्य रमण हो जाय, कामनाएँ निवृत्त हो जायें, द्वन्द्वों से मुक्ति हो जाये। सुख और दुःख, मान और अपमान, अनुकूलता और प्रतिकूलता यश और अपयश, तन्दुरूस्ती और बीमारी, जीवन और मृत्यु, ये सब द्वन्द्व हैं। जो तन्दुरूस्ती से सुखी है वह बीमारी से दुःखी होगा। जो यश से सुखी होता है वह अपयश से दुःखी होगा। जो जीने में सुख मानेगा वह मरने में दुःखी होगा। लेकिन जीना मरना, मान-अपमान ये सब चित्त में देहात्मभाव के संस्कार पड़े हैं। अगर चित्त का निर्माण हो गया कि जीना मरना ये सब मेरा नहीं, माया का है, मेरा नहीं, इस देहरूपी खिलौने का है, यह देहरूपी खिलौने कई बार जीते हुए दिखते है, कई बार मरते हुए दिखते हैं फिर भी मेरी कभी मौत नहीं होती, तो शूली पर चढ़ते हुए भी दुःख नहीं होगा। लोगों को लगेगा कि मनसूर शूली पर चढ़े, ईसा क्रॉस पर चढ़े, अमुक बुद्ध पुरूष ने ध्यान करते हुए शरीर छोड़ा और मर गये। लोगों को ऐसा लगेगा लेकिन उन महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है। बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें। ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त। इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।

सारे जप, तप, सेवा, पूजा, यज्ञ, होम, हवन, दान, पुण्य ये सब चित्त को शुद्ध करते हैं, चित्त में पवित्र संस्कार भरते हैं। प्रतिदिन कुछ समय अवश्य निष्काम कर्म करना चाहिए। चित्त के कोष में कुछ आध्यात्मिकता की भरती हो। तिजोरी को भरने के लिए हम दिनरात दौड़ते हैं। जेब को भरने के लिए छटपटाते हैं लेकिन तिजोरी और जेब तो यहीं रह जायेंगे। हृदय की तिजोरी साथ में चलेगी। इस आध्यात्मिक कोष को भरने के लिए दिन भर में कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। संध्या-वन्दन, पूजा-प्रार्थना, ध्यान-जप, निष्काम कर्म इत्यादि के द्वारा चित्त का निर्माण कीजिये।

उच्च विचार करते हुए हृदय में खुले आकाश की विशालता भर जाने दो। ॐकार का पवित्र जप करते-करते हृदय को विशाल होता अनुभव करो। शान्ति और आनन्द से हृदय भरा जा रहा है। यह आत्मानन्द की… विशुद्ध परमात्मा की, चिदानन्द-स्वरूप परमात्मा की झलक पाने का तरीका है।

 

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

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विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

 

जब भगवान के सिवाय सब बेकार लगे तो समझो कि वह पहली भूमिका पर पहुँचा है । उसके लिए विघ्न-बाधाएँ साधन बन जाएँगी । विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है । विघ्न-बाधाएँ नहीं आयें तो संगीत छिड़ेगा नहीं ।

भौंरी कीड़े को उठाकर अपने बिल में रखती है । एक डंक मारती है, वह कीड़ा छटपटाता है । उसके शरीर से पसीने जैसा कुछ प्रवाह निकलता है । फिर भौंरी जब दूसरा डंक मारती है तब कीड़ा तेजी से छटपटाता है और वह पसीना कड़ा हो जाता है, जाला बन जाता है । जब तीसरा डंक मारती है तो कीड़ा खूब छटपटाता है, बहुत दुःखी होता है मगर उस डंक के कारण पसीने से जो जाला बना है उसी में से पंख फूट निकलते हैं और वह उड़ान भरता है ।

वैज्ञानिकों ने कीड़े में से मकड़ी बनने की इस प्रक्रिया को देखा । भौंरी के द्वारा तीसरे डंक सहने की तीव्र पीड़ा से उन कीड़ों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बारीक कैंची बनाई और तीसरे डंक से कीड़ा छटपटाकर जाला काटे उसकी अपेक्षा उन्होंने कैंची से वह जाला काट दिया । कीड़े को राहत मिली, पीड़ा तो नहीं हुई, मगर फिर उसके पंख नहीं फूटे । उड़ान भरने की योग्यता उसमें नहीं आयी ।

ऐसे ही परमात्मा जब अपने साधक को अपनी दिव्य अनुभूति में उड़ान भरवाते हैं तब उसको चारों तरफ से विघ्न-बाधाएँ देते हैं ताकि उसका विचारबल, मनोबल, समझशक्ति एवंआत्मशक्ति बढ़ जाये । मीरा के लिए परमात्मा ने राणा को तैयार कर दिया । नरसिंह मेहता का भाई ही उनका विरोध करता था, साथ में पूरी नगरी जुड़ गयी । शबरी भीलनी हो, चाहे संतकबीर हो, चाहे एकनाथ जी हों या संत तुकाराम हों, कोई भी हो, लोग ऐसे भक्तों के लिए एक प्रकार का जाला बना लेते हैं । एकनाथ जी महाराज के खिलाफ हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर एक चांडाल चौकड़ी बनायी थी ।

जैसे कीड़े के लिए तीसरा डंक पंख फूट निकलने के लिए होता है ऐसे ही प्रकृति की ओर से यह सारा खिलवाड़ साधक के उत्थान के लिए होता है । जिन्हे सत्संग का सहारा नहीं है, पहली दूसरी भूमिका में दृढ़ता नहीं है वे हिल जाते हैं ।

बुद्ध के मन में एक बार आया कि यहाँ तो कोई पहचानता भी नहीं, खाने का भी ठिकाना नहीं है, लोग मुझ पर थूकते हैं, हालाँकि मैं उन्हें कुछ कहता भी नहीं । यह भी कोई ज़िन्दगी है! चलो, वापस घर चलें । उस समय वे सिद्धार्थ थे । सत्संग का सहारा नहीं था । पहली भूमिका में दृढ़ता चाहिए । बचपन का वैराग्य हो तो ठीक है मगर बुढ़ापे में वैराग्य जगा है या फिर भी भोग भोगने के बाद, बच्चों को जन्म देने के बाद पहली भूमिका मिली हो तो जरा कमजोर है । बुद्ध के मन में आया कि चलो घर जायें । उन्हीं विचारों में खोये से बैठे थे । इतने में देखते हैं कि सामने पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया । सिद्धार्थ उसको ध्यान से देख रहे थे । उन्होंने सोचा कि यह कोई झूठी घटना नहीं है । यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

सिद्धार्थ की पहली भूमिका थी । अपने आप संस्कार जग गये । सिद्धार्थ ने निश्चय कर लियाः “कार्यं साधयामि व देहं पातयामि । या तो कार्य साध लूँगा या मर जाऊँगा । महल में भी एक दिन मर ही जाना है । साधना करते-करते भी मर जाऊँगा तो हर्ज नहीं । ऐसा सोचकर पक्की गाँठ बाँध ली और चल पड़े । सात साल के अन्दर ही उन्हें परम शांति मिल गयी ।

जब आदमी के शुभ विचार जगते हैं तब स्नान, दान, सेवा, स्मरण, सत्संग परहित उसे अच्छे लगते हैं । जिसे पहली भूमिका प्राप्त नहीं हुई उसे इन सब कार्यों के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी । वहाँ से वह पलायन हो जायेगा । उसे वह सब अच्छा नहीं लगेगा । वाह-वाही पाने, यश कमाने को तो आगे आ जायेगा पर फिर खिसक जायेगा । ऐसे लोग फिर पशु, पक्षी, कीट की निम्न योनियों में जाते हैं ।

दूसरी भूमिका होती है शुभेच्छा । ‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि परमात्मा मिले, ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह से देहातीत तत्त्व का साक्षात्कार हो जाये? अफसर, साहब, सेठ, साहूकार बन गये मगर आखिर क्या?’ ऐसा विचार उसे आता रहता है ।

यह दूसरी भूमिका जिसे प्राप्त हो गई वह घर में भी है तो घर वाले उसे दबा नहीं सकेंगे । सत्संग और सत्कर्म में रूचि रहेगी । भोग-वासना फीकी पड़ जायेगी । मगर फिर रोकने वाले आ जायेंगे । उसे महसूस होगा कि ईश्वर के रास्ते में जाने में बहुत सारे फायदे हैं । विघ्न करने वाले साधक के आगे आखिर हार मान जायेंगे । ईश्वर का दर्शन तो इतने में नहीं होगा मगर जो संसार कोसता था वह अनुकूल होने लगेगा ।

उसके बाद तीसरी भूमिका आयेगी, उसमें सत्संग के वचन बड़े मीठे लगेंगे । उन्हीं वचनों का निदिध्यासन करेगा, ध्यान करेगा, श्वासोच्छोवास को देखेगा । ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ’ ऐसा चिन्तन-ध्यान करेगा । गुरुदेव का ध्यान करेगा तो गुरुदेव दिखने लगेंगे । गुरुदेव से मानसिक बातचीत भी होगी, प्रसन्नता और आनंद आने लगेगा । संसार का आकर्षण बिल्कुल कम हो जायेगा। फिर भी कभी-कभी संसार लुभाकर गिरा देगा । फिर से उठ खड़ा होगा । फिर से गिरायेगा, फिर खड़ा होगा । परमात्मा का रस भी मिलता रहेगा और संसार का रस कभी-कभी खींचता रहेगा । ऐसा करते-करते चौथी भूमिका आ जाती है तब साक्षात्कार हो जाता है फिर संसार का आकर्षण नहीं रहता । जब स्वप्न में से उठे तो फिर स्वप्न की चीजों का आकर्षण खत्म हो गया । चाहे वे चीज़ें अच्छी थीं या बुरी थीं । चाहे दुःख मिला, चाहे सुख मिला, स्वप्न की चीज़ें साथ में लेकर कोई भी आदमी जग नहीं सकता । उन्हें स्वप्न में ही छोड़ देता है । ऐसे ही जगत की सत्यता साथ में लेकर साक्षात्कार नहीं होता । चौथी भूमिका में जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है । वृत्ति व्यापक हो जाती है । वह महापुरुष होते हुए भी अनेक ब्रह्माण्डों में फैल जाता है । उसको यह अनुभव होता है कि सूरज मुझमें है, चन्द्र मुझमें है, नक्षत्र मुझमें हैं । यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद भी मुझमें हैं । ऐसा उन महापुरुषों का अनुभव होता है । उनको कहा जाता हैब्रह्मवेत्ता । वे ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं ।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता

ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरुष विधाता

ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाईं आधा आखर

नानक! ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर

आत्म-अभ्यास

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आत्म-अभ्यास

वशिष्ठजी कहते हैं: “जो ज्ञानवान ऋषि, महर्षि हैं, भले उनके जीवन में कई विघ्न-बाधाएँ भी आती हैं परंतु उनका चित्त सदा अपने आत्म-अभ्यास से सुसज्ज होता है ।”

भगवान राम ने बाल्यकाल से संध्या, प्राणायाम ध्यान आदि किया था, और सोलह साल की उम्र में तीर्थयात्रा करने निकल गये थे । साल भर तीर्थयात्रा करते संसार की स्थिति का गहन अध्ययन करते हुए इस नतीजे पर आये कि बड़े-बड़े महल खण्डहर हो जाते हैं, बड़े-बड़े नाले नदियाँ रुख बदल देती हैं । बस्ती शमशान हो जाती है और शमशान बस्ती में बदल जाता है। यह सब संसार की नश्वरता देखकर भगवान रामजी को वैराग्य हुआ । संसार के विकारी जीवन से, विकारी सुख से उन्हे वैराग्य हुआ । वे वशिष्ठजी मुनि का ज्ञान सुनते थे । ज्ञान सुनते-सुनते उसमें तल्लीन हो जाते थे । रात भर आत्मज्ञान के विचारों में जागते रहते थे । कभी घड़ी भर सोते थे और फिर झट से ब्राह्ममुहूर्त में उठ जाते थे । श्रीरामचन्द्रजी ने थोड़े ही समय में अपने सदगुरुके वचनों का साक्षात्कार कर लिया ।

विवेकानन्द सात साल तक साधना में लगे रहे । भोजन में किसी पवित्र घर की ही भिक्षा खाते थे । साधन-भजन के दिनों में बहिर्मुख निगुरे लोगों के हाथ का अन्न कभी नहीं लेते थे । पवित्र घर की रोटी भिक्षा में लेते और वह रोटी लाकर रख देते थे । ध्यान करते जब भूख लगती तो रोटी खा लेते थे । कभी तो सात दिन की बासी रोटी हो जाती । उसको चबाते-चबाते मसूढ़ोंमें खून निकल आता । फिर भी विवेकानन्द आध्यात्मिक मार्ग पर डटे रहे । ऐसा नहीं सोचते थे कि “घर जाकर ताजा रोटी खाकर भजन करेंगे ।” वे जानते थे कि कितनी भी कठिनाई आ जाये फिर भी आत्मज्ञान पाना ज़रुरी है । गुरु के वचनों का साक्षात्कार करना ज़रूरी है । जो बुद्धिमान ऐसा समझता है उसको प्रत्येक मिनट का सदुपयोग करने की रुचि होती है । उसे कहना नहीं पड़ता कि ध्यान करो, नियम करो, सुबह जल्दी उठकर संध्या में बैठो । जो अपनी ज़िन्दगी की कदर करता है वह तत्पर हो जाता है ।

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