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गुरूभक्तियोग की महत्ता – ब्रह्मलीन स्वामी शिवानन्दजी

जिस प्रकार शीघ्र ईश्वरदर्शन के लिए कलियुग-साधना के रूप में कीर्तन-साधना है उसी प्रकार इस संशय, नास्तिकता, अभिमान और अहंकार के युग में योग की एक नई पद्धति यहाँ प्रस्तुत है-.गुरूभक्तियोग। यह योग अदभुत है। इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है। इसकी महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिए उपयोगी इस विशेष योग-पद्धति के द्वारा आप इस हाड़-चाम के पार्थिव देह में रहते हुए ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए निहार सकते हैं। . . . . .

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परमात्मा का पूरा पता ! तात्विक सत्संग

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जानिए भगवान क्या हैं ? किधर हैं और उनसे हमारी मुलाकात कैसे हों ?

क्या आपने कभी सोचा की हमे भगवन का ‘पूरा पता’ मिलेगा !

नहीं ना ! पर संतों की ऐसी कृपा बरसती रहती हीं की हम अधिकारी हों या ना हों फिर भी ऐसे ज्ञान के भंडार हमारे लिए वे खुले चोदते हैं !

सुनिए यहा पूरा पता भगवान का !

तात्विक सत्संग परमात्मा का पूरा पता

ईश्वर कहाँ रहता है? कैसे मिलता है? वह करता क्या है?

अकबर ने बीरबल के सामने अचानक 3 प्रश्न उछाल दिये।
प्रश्न थे- ‘ईश्वर कहाँ रहता है?
वह कैसे मिलता है
और वह करता क्या है?”

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बीरबल इन प्रश्नों को सुनकर सकपका गये और बोले- ”जहाँपनाह! इन प्रश्नों के उत्तर मैं कल आपको दूँगा।”

जब बीरबल घर पहुँचे तो वह बहुत उदास थे। उनके पुत्र ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया- ”बेटा! आज अकबर बादशाह ने मुझसे एक साथ तीन प्रश्न ‘ईश्वर कहाँ रहता है? वह कैसे मिलता है? और वह करता क्या है?’ पूछे हैं।
मुझे उनके उत्तर सूझ नही रहे हैं और कल दरबार में इनका उत्तर देना है।”

बीरबल के पुत्र ने कहा- ”पिता जी! कल आप मुझे दरबार में अपने साथ ले चलना मैं बादशाह के प्रश्नों के उत्तर दूँगा।”

पुत्र की हठ के कारण बीरबल अगले दिन अपने पुत्र को साथ लेकर दरबार में पहुँचे। बीरबल को देख कर
बादशाहअकबर ने कहा- ”बीरबल मेरे प्रश्नों के उत्तर दो।
बीरबल ने कहा- जहाँपनाह आपके प्रश्नों के उत्तर
तो मेरा पुत्र भी दे सकता है।”

अकबर ने बीरबल के पुत्र से पहला प्रश्न पूछा- ”बताओ! ‘ईश्वर कहाँ रहता है?”
बीरबल के पुत्र ने एक गिलास शक्कर मिला हुआ दूध बादशाह से मँगवाया और कहा- जहाँपनाह दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखा और कहा कि ये मीठा है। परन्तु बादशाह सलामत या आपको इसमें शक्कर दिखाई दे रही है। बादशाह बोले नही। वह
तो घुल गयी।

जी हाँ, जहाँपनाह! ईश्वर भी इसी प्रकार संसार की हर वस्तु में रहता है। जैसे शक्कर दूध में घुल
गयी है परन्तु वह दिखाई नही दे रही है।

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा- ”बताओ! ईश्वर मिलता केसे है?”

बालक ने कहा- ‘जहाँपनाह थोड़ा दही मँगवाइए।”

बादशाह ने दही मँगवाया तो
बीरबल के पुत्र ने कहा- ”जहाँपनाह! क्या आपको इसमं मक्खन दिखाई दे रहा है।

बादशाह ने कहा- ”मक्खन तो दही में है पर इसको मथने प ही दिखाई देगा।” बालक ने कहा-
”जहाँपनाह! मन्थन करने पर ही ईश्वर
के दर्शन हो सकते हैं।”

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब अन्तिम प्रश्न का उत्तर पूछा- ”बताओ! ईश्वर करता क्या है?” बीरबल के पुत्र ने कहा- ”महाराज! इसके लिए आपको मुझे अपना गुरू स्वीकार करना पड़ेगा।”
अकबर बोले- ”ठीक है, तुम गुरू और मैं तुम्हारा शिष्य।”
अब बालक ने कहा- ”जहाँपनाह गुरू तो ऊँचे आसन पर बैठता है और शिष्य नीचे।”

अकबर ने बालक के लिए सिंहासन खाली कर दिया और स्वयं नीचे बैठ गये।
अब बालक ने सिंहासन पर बैठ कर कहा- ”महाराज! आपके अन्तिम प्रश्न का उत्तर तो यही है।”
अकबर बोले- ”क्या मतलब? मैं कुछ समझा नहीं।”
बालक ने कहा- ”जहाँपनाह! ईश्वर यही तो करता है। “पल भर में राजा को रंक बना देता है और
भिखारी को सम्राट बना देता है।”

हिमालय की तरह दृढ़ होकर . . . .

 

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हिमालय की तरह दृढ़ होकर अपनी रुकावटों को काटो।
यह विश्वास रखो कि जो सोचूँगा वही हो जाऊँगा। सत्यसंक्लप आत्मा तुम्हारे साथ है….
नहीं नहीं, तुम ही सत्यसंकल्प आत्मा हो।
उठो, अपनी शक्ति को पहचानो।
तमाम शक्तियाँ तुम्हारे साथ हैं।
यह ख्याल न करो कि तमाम चीजें पहले इकट्ठी हों, बाद में मैं आगे बढ़ूँ। बल्कि दृढ़ संकल्प करो अपने परम लक्ष्य को हासिल करने का।
चीजें अपने-आप तुम्हारे कदम चूमेंगी।
क्या आप सुख चाहते हैं?…
तो विषय भोग से सुख मिलेगा यह कल्पना मन से निकाल दीजिये। उसमें बड़ी पराधीनता है। पराधीनता दुःख है। भोग्य वस्तु चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, कभी मिलेगी कभी नहीं।
इन्द्रियों में भोग का सामर्थ्य सदा नहीं रहेगा। मन में एक-सी रूचि भी नहीं होगी। योग-वियोग, शत्रु-मित्र, कर्म-प्रकृति आदि उसमें बाधक हो सकते हैं। यदि विषयभोग में आप सुख को स्थापित कर देंगे तो निश्चय ही आपको परवश और दुःखी होना पड़ेगा।

— पूज्य बापूजी

 

Unique way to Birthday celebrations – Avtaran Divas

April 20, 2014, Spiritual Guru Sant Asharamji Bapu turned 74 yesterday and Devotees celebrated the propitious occasion of his Birth also known as Avtaran Diwas or Incarnation day in their words, with traditional Vedic holdings. How an Avtaran Divas differs from normal birth is very well explained by Sant Asharamji Bapu. Bapuji says that the Soul is eternal and neither does it ever take birth nor will it ever die. To understand ourselves as the soul and not as the body is called Self Realization, when the jiv realizes its true identity then its said to be self-realized . Its to celebrate its birth the term Avtaran/Incarnation is used.  

Param Pujya Sant Shri Asahram JI Bapu Avtaran Divas kise bolte hain?

 

The celebrations were quite exclusive to observe when the entrance gate of JodhpurCentral Jail was adorned with balloons and Candle lightening.

 Across the globe, 50-70 million followers, 1200 Ashrams, and 17000 Bal Sanskaar orgs (Children moral development centre), had enumerated the day with Havan , meditation camps , Mantra chanting , prayer gatherings etc which was later  accomplished by sharing Prasad and food with everyone.

Pujya Asaram Bapu 74th Avtaran Divas (Birthday) bhajan and divya lila darshan – Adharam Madhuram

Apart from the reverence scheduled, massive number of charity programs were also organized which included distribution of clothes, blankets, money among the underprivileged and poor populace.

Sudarshan News Coverge Pujya Bapuji Avtaran Divas 20-Apr-2014

Vishwa Seva Diwas – Celebration of the Divine Birth of Asaram Bapuji!

As summers prevails in most part of country, different stall were found distributing sweet rose water as well. Shortly in evening Twitter PAN India trended with #VishwaSewaDiwas by the followers of Spiritual guru.

 

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संत आशारामजी बापू का समर्थन नरेन्द्र मोदी को ? जानिये सच !

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क्या पूज्य संत श्री आशारामजी का समर्थन श्री नरेन्द्र मोदी को है ? हमारे अनुसार शत प्रतिशत है !

यदि ऐसा न होता तो पूज्य श्री के आश्रम से प्रकाशित मासिक पत्रिका “c”  में मोदी जी के लिये क्या इतने सराहनीय शब्द होते ?

“ऋषि प्रसाद” में उनके माध्यम से भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन करने की भी बात की गयी है !

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संस्कृत : समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी

क्या आप जानते हैं ?

समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी – संस्कृत ……….

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विविध भाषाओँ की स्त्रोत “संस्कृत” भाषा के संबंध में प्रचलित सभी धारणाएं भ्रमपूर्ण हैं |

वर्तमान में पाश्चात्य सिद्धांतों को अधिक मान्यता प्राप्त है, क्योंकि “जिसकी लाठी उसकी भैंस ” | पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अन्धानुकर्ता यह समझ बैठे हैं कि “ग्रीक”,“लैटिन”,“संस्कृत तीनों किसी न किसी प्राचीन भाषा की संतान हैं | हमारी ज्येष्ठ भाषा “संस्कृत“का तो वे नाम भी ढंग से नहीं जानते, अतः अपनी काल्पनिक “जननी भाषा” को”इंडो – यूरोपियन” ऐसा ऊटपटांग नाम देकर काम चला लेते हैं | वास्तव में समस्त भाषओं की जननी संस्कृत ही है |

दूसरा भ्रम उन्हें “संस्कृत” नाम के निर्माण से हुआ है | पाश्चात्य लोग कहते हैं कि “संस्कृत-यानी अच्छी गढ़ी हुई भाषा” | ऐसा वो इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि “संस्कृत” किसी अन्य भाषा से बनी भाषा है , ठीक उसी प्रकर जैसे निराकार पत्थर से मूर्ति बनती है | लेकिन वास्तव में “संस्कृत” शब्द का अर्थ है कि जो भाषा, ईश्वर द्वारा निर्मित होने के कारण अच्छी बनी हुई है | अतः संस्कृत किसी अन्य कच्ची या अधपकी भाषा से बनी है यह बिल्कुल बेबुनियाद व आधारहीन तर्क हैं |

The Science of Sanskrit Language Explained by Rajiv Dixit

पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार प्राचीनकाल का मानव वानर था जो कि बर्बर प्रकृति था | तो सोच का विषय है कि ऐसी अवस्था का मानव भला संस्कृत जैसी भाषा कैसे बना पाता ? सच तो यह है कि संस्कृत के टूट- फूट जाने से ही अन्य प्रादेशिक भाषाएँ बनी हैं न कि प्राकृति भाषाओं से संस्कृत बनी है |

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“प्राकृति” शब्द की रचना ‘प्र’ व ‘आकृति’ की संधि से हुयी है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “प्राकृति” वे भाषाएँ हैं जिन्हें किसी अन्य मूल भाषा से आकार प्राप्त हुआ है | संस्कृत भाषा के टूट जाने पर उसका व्याकरण भी टुकड़ों – टुकड़ों में अन्य भाषाओँ में बंट गया | अतः पाणिनि का ही व्याकरण अन्य सभी भाषाओँ पर लागू हुआ है | संस्कृत जैसी आप्राकृतिक भाषा मानव बना ही नहीं पाता | मानव का हाथ लगते ही वस्तुएं दूषित हो जातीं हैं | इसका उदाहरण है – आजकल कारखानों में जो भी खाद्यसामग्री अथवा दवाइयां बनतीं हैं, वे एकदम :”शुद्ध” हैं, यह जताने के लिए उन पर लिखा होता है “Untouched by any Human hand” अर्थात् किसी भी व्यक्ति के हाथ स्पर्श बिना बनी वस्तु’ |

 

रॉयल एशियाटिक सोसायटी, लंदन में पढ़े गये, एक वक्तृत्व में कहा गया है कि “बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस भारत के ऊपर कई क्रुद्ध आक्रामकों का आक्रमण होता रहा जिनके पद चिन्ह उस भूमि पर पाए जाते हैं, उसी भारत में समय और शासन बदलते रहने पर भी एक भाषा ऐसी टिकी हुई है कि उसके विभिन्न पहलुओं और वैभवता की कोई सीमा नहीं; जो “ग्रीक”, “लैटिन” जैसी मान्यता प्राप्त यूरोपीय भाषायों की जननी है तथा जो “ग्रीक” से भी लचीली और “रोमन” भाषा से भी सशक्त है | यह वह भाषा है जिसके दर्शनशास्त्र की तुलना में पायथागोरस के कथन “कल जन्मे हुए शिशु” जैसे बालिश लगते हैं; जिसकी वैचारिक उड़ान के आगे प्लेटो की ऊँची से ऊँची कल्पनाएँ निष्प्रभावित और समान्य सी लगती हैं; जिसके काव्यों में व्यक्त प्रतिभा अकल्पित – सी है और जिसके शास्त्रीय ग्रन्थ तो इतने प्राचीन हैं कि उनका कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया और शायद आगे लगा भी नहीं सकता | संस्कृत का सारा साहित्य इतना विपुल और विशाल है कि उसका तो जितना वर्णन किया जाये, उतना कम ही पड़ेगा | उसके सहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान है | उसकी पौराणिक कथाओं की तो सीमा ही नहीं है | उसके दर्शनशास्त्र में हर प्रकार की समस्या या पहेली का विचार किया गया है तथा वैदिक समाज के प्रत्येक वर्ण और वर्ग के लिए उसके धर्मशास्त्र के नियम बने हुए हैं |”

 

Panini’s Sanskrit Grammar in Computational Linguistics goes uncredited? – Rajiv Malhotra

“Indian Antiquities” नाम का सात खंडों का ग्रन्थ, जिसके सम्पादक थॉमस मॉरिस हैं, सन् 1792 से 1800 तक प्रकाशित हुआ | उसके चौथे खंड के पृष्ठ 415 पर उल्लेख है कि – “Hollhead का सुझाव है कि संस्कृत भाषा ही पृथ्वी की मूल भाषा है |”

देश – विदेश के अन्य विद्वान् भी यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो वे भी इस निष्कर्ष पर पहुचेगें कि संस्कृत ही विश्व – भर के मानवों कों देवों ने भेंट स्वरूप दी है | वह भाषा किसी मानव द्वारा बनाई नहीं गई , बल्कि अन्य भाषाएँ का उद्गम “संस्कृत” से हुआ है |

हमारे देश के प्रशासन को भी इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए तथा भारत के युवाओं को भी अपने देश की प्राचीन भाषा और संस्कृति की अस्मिता और पहचान कायम रखने के लिए कदम बढ़ाना होगा; अन्यथा हम अपनी वैदिक भाषा मात्र किताबों में बंद किसी प्रदर्शनी में ही देख पायेगें |

read at ; http://nextfuture.aurosociety.org/sanskrit

 

Myths about Sanskrit

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