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महात्मा की कृपा

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महात्मा की कृपा

एक लड़के के पिता मर गये थे। वह लड़का करीब 18-19 साल का होगा। उसका नाम था प्रताप। एक बार भोजन करते समय उसने अपनी भाभी से कहाः “भाभी ! जरा नमक दे दे।”

भाभीः “अरे, क्या कभी नमक माँगता है तो कभी सब्जी माँगता है ! इतना बड़ा बैल जैसा हुआ, कमाता तो है नहीं। जाओ, जरा कमाओ, फिर नमक माँगना।”

लड़के के दिल को चोट लग गयी। उसने कहाः “अच्छा भाभी ! कमाऊँगा तभी नमक माँगूगा।”

वह उसी समय उठकर चल दिया। पास में पैसे तो थे नहीं। उसने सुन रखा था कि मुंबई में कमाना आसान है। वह बिहार से ट्रेन में बैठ गया और मुंबई पहुँचा। काम-धंधे के लिए इधर-उधर भटकता रहा परंतु अनजान आदमी को कौन रखे ! आखिर भूख-प्यास से व्याकुल होकर रात में एक शिवमंदिर में पड़ा रहा और भगवान से प्रार्थना करने लगा कि “हे भगवान ! अब तू ही मेरी रक्षा कर।”

दूसरे दिन की सुबह हुई। थोड़ा सा पानी पीकर निकला, दिन भर घूमा परंतु कहीं काम न मिला। रात्रि को पुनः सो गया। दूसरे दिन भी भूखा रहा। ऐसा करते-करते तीसरा दिन हुआ।

हर जीव सच्चिदानंद परमात्मा से जुड़ा है। जैसे शरीर के किसी भी अंग में कोई जंतु काटे तो हाथ तुरंत वहाँ पहुँच जाता है क्योंकि वह अंग शरीर से जुड़ा है, वैसे ही आपका व्यष्टि श्वास समष्टि से जुड़ा है। उस लड़के के दो दिन तक भूखे-प्यासे रहने परि प्रकृति में उथल-पुथल मच गयी।

तीसरी रात्रि को एक महात्मा आये और बोलेः “बिहारी ! बिहारी ! बेटा, उठ। तू दो दिन से भूखा है। ले, यह मिठाई खा ले। कल सुबह नौकरी भी मिल जायेगी, चिंता मत करना। सब भगवान का मानना, अपना मत मानना।”

महात्मा लँगोटधारी थे। उनका वर्ण काला व कद ठिगना था। लड़के ने मिठाई खायी। उसे नींद आ गयी। सुबह काम की तलाश में निकला तो एक हलवाई ने नौकरी पर रख लिया। लड़के का काम तो अच्छा था, स्वभाव भी अच्छा था। प्रतिदिन वह प्रभु का स्मरण करता और प्रार्थना करता। हलवाई को कोई संतान नहीं थी तो उसने उसी को अपना पुत्र मान लिया। जब हलवाई मर गया तो वही उस दुकान का मालिक बन गया।

अब उसने सोचा कि ‘भाभी ने जरा सा नमक तक नहीं दिया था, उसे भी पता चले कि उसका देवर लाखों कमाने वाला हो गया है।’ उसने 5 हजार रूपये का ड्राफ्ट भाभी को भेज दिया ताकि उसको भी पता चले कि साल दो साल में ही वह कितना अमीर हो गया है। तब महात्मा स्वप्न में आये और बोले कि ‘तू अपना मानने लग गया ?’

उसने इसे स्वप्न मानकर सुना-अनसुना कर दिया और कुछ समय के बाद फिर से 5000 हजार रूपये का ड्राफ्ट भेजा। उसके बाद वह बुरी तरह से बीमार पड़ गया।

इतने में महात्मा पधारे और बोलेः “तू अपना मानता है ? अपना हक रखता है ? किसलिए तू संसार में आया था और यहाँ क्या करने लग गया ? आयुष्य नष्ट हो रहा है, जीवन तबाह हो रहा है। कर दिया न धोखा ! मैंने कहा था कि अपना मत मानना। तू अपना क्यों मानता है ?”

“गुरुजी ! गल्ती हो गयी। अब आप जो कहेंगे वही करूँगा।”

महात्माः “तीन दिन में दुकान का पूरा सामान गरीब गुरबों को लुटा दे। तू खाली हो जा।”

उसने सब लुटा दिया। तब महात्मा ने कहाः

“चल मेरे साथ।”

महात्मा उसे अपने साथ मुंबई से कटनी ले गये। कटनी के पास लिंगा नामक गाँव है, वहाँ से थोड़ी दूरी पर बैलोर की गुफा है। वहाँ उसको बंद कर दिया और कहाः “बैठ जा, बाहर नहीं आना है। जगत की आसक्ति छोड़ और एकाग्रता कर। एकाग्रता और अनासक्ति-ये दो पाठ पढ़ ले, इसमें सब आ जायेगा।

जब तक ये पाठ पूरे न होंगे, तब तक गुफा का दरवाजा नहीं खुलेगा। इस खिड़की से मैं भोजन रख दिया करूँगा। डिब्बा रखता हूँ, वह शौचालय का काम देगा। उसमें शौच करके रोज बाहर रख दिया करना, सफाई हो जायेगी।”

इस प्रकार वह वर्षों तक भीतर ही रहा। उसका देखना, सुनना, सूँघना, खाना-पीना आदि कम हो गया, आत्मिक बल बढ़ गया, शान्ति बढ़ने लगी। नींद को तो उसने जीत ही लिया था। इस प्रकार 11 साल हुए तब महात्मा ने जरा सा तात्त्विक उपदेश दिया और दुनिया के सारे वैज्ञानिक और प्रधानमंत्री भी जिस धन से वंचित हैं, ऐसा महाधन पाकर वह बिहारी लड़का महापुरुष बन गया। महात्मा ने कहाः “अब तुम मुक्तात्मा बन गये हो, ब्रह्मज्ञानी बन गये हो। मौज है तो जाओ, विचरण करो।”

तब वे महापुरुष बिहार में अपने गाँव के निकट कुटिया बनाकर रहने लगे। किंतु वे किसी से कुछ न कहते, शांति से बैठे रहते थे। सुबह 6 से 10 बजे तक कुटिया का दरवाजा खुलता। इस बीच वे अपनी कुटिया की झाड़ू बुहारी करते, खाना पकाते, किसी से मिलना-जुलना आदि कर लेते, फिर कुटिया का दरवाजा बंद हो जाता।

वे अपने मीठे वचनों से और मुस्कान से शोक, पाप, ताप हरने वाले, शांति देने वाले हो गये। चार वेद पढ़े हुए लोग भी न समझ न पायें ऐसे ऊँचे अनुभव के वे धनी थे। बड़े-बड़े धनाढ्य, उद्योगपति, विद्वान और बड़े-बड़े महापुरुष उनके दर्शन करके लाभान्वित होते थे।

ब्रह्मनिष्ठ स्वामी अखंडानंदजी सरस्वती, जिनके चरणों में इन्दिरा गांधी की गुरू, माँ आनंदमयी कथा सुनने बैठती थीं, वे भी उनके दर्शन करने के लिए गये थे।

ईश्वर के दर्शन के बाद भी आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार करना बाकी रह जाता है। रामकृष्ण परमहंस, हनुमानजी और अर्जुन को भी ईश्वर के दर्शन करने के बाद भी आत्मसाक्षात्कार करना बाकी था। वह उन्होंने कर लिया था-महात्मा की कृपा, अपने संयम और एकांत से। वह साक्षात्कार उस बिहारी युवक को ही नहीं, देश के किसी भी युवक को हो सकता है। है कोई माई का लाल ?

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निजस्वरूप का बोध

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निजस्वरूप का बोध

तरंगे सागर में लीन होने लगती है तो वे अपना तरंगपना छोड़कर जलरूप हो जाती है। हमारी तमाम वृत्तियों का मूल उदगम्-स्थान…. अधिष्ठान परमात्मा है। हम यह शरीरधारी हैं…. हमारा यह नाम है…. हमारी वह जाति है….. हमारे ये सगे-सम्बन्धी हैं…. हम इस जगत में रहते हैं…. ये तमाम प्रपंच हमारी वृत्तियों के खेल हैं। हमारी वृत्ति अपने मूल उदगम्-स्थान आनन्दस्वरूप परमात्मा में डूब गई, लीन हो गई तो न यह शरीर है न उसका कोई नाम है, न उसकी कोई जाति है, न उसके कोई सगे सम्बन्धी हैं और न कोई जगत ही है। केवल आनंदस्वरूप परमात्मा ही परमात्मा है। वह परमात्मा मैं हूँ। एक बार यह सत्य आत्मसात हो  गया, भली प्रकार निजस्वरूप का बोध हो गया, फिर चाहे करोड़ों-करोड़ों वृत्तियाँ उठती रहें, करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड बनते रहें….. बिगड़ते रहें फिर भी उस बुद्ध पुरुष को कोई हानि नहीं।

अव्यक्त तत्व का अनुसंधान

 

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अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।

‘बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।”

(गीताः 7.24)

जो बुद्धिमान हैं, मेधावी हैं वे भगवान को साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्तरूप में मानते हैं। जो बुद्धिमान नहीं हैं वे भगवान को साकार रूप में मानते हैं और निराकार तत्त्व के तरफ उनकी गति नहीं होती। जो मूर्ख हैं, बुद्धु हैं वे न भगवान के साकार रूप को मानते हैं न निराकार रूप को मानते हैं, वरन् अपनी मति एवं कल्पना में जो बात आती है उसी को मानते हैं

चार प्रकार की कृपा होती हैः

ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा।

ईश्वरकृपाः ईश्वर में प्रीति हो जाये, ईश्वर के वचनों को समझने की रूचि हो जाये, ईश्वर की ओर हमारा चित्त झुक जाये, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा हो जाये यह ईश्वर की कृपा है।

शास्त्रकृपाः शास्त्र का तत्त्व समझ में आ जाये, शास्त्र का लक्ष्यार्थ समझ में आने लग जाये यह शास्त्रकृपा है।

गुरुकृपाः गुरु हमें अपना समझकर, शिष्य, साधक या भक्त समझकर अपने अनुभव को व्यक्त करने लग जायें यह गुरुकृपा है।

आत्मकृपाः हम उस आत्मा परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त हो जायें, अपने देह, मन, इन्द्रियों से परे, इन सबको सत्ता देने वाले उस अव्यक्त स्वरूप को पहचानने की क्षमता हममें आ जायें यह आत्मकृपा है।

आत्मज्ञान हो लेकिन ज्ञान होने का अभिमान न हो तो समझ लेना की आत्मकृपा है। अपने को ज्ञान हो जाये फिर दूसरे अज्ञानी, मूढ़ दिखें और अपने को श्रेष्ठ मानने का भाव आये तो यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम होता है क्योंकि ज्ञान से सर्वव्यापक वस्तु का बोध होता है। उसमें अपने को पृथक करके दूसरे को हीन देखने की दृष्टि रह ही नहीं सकती। फिर तो भावसहित सब अपना ही स्वरूप दिखता है।

गर्मी-सर्दी देह को लगती है, मान-अपमान, हर्ष-शोक मन में होता है तथा राग-द्वेष मति के धर्म होते हैं यह समझ में आ जाये तो मति के साथ, मन के साथ, इन्द्रियों के साथ हमारा जो तादात्म्य जुड़ा है वह तादात्म्य दूर हो जाता है। शरीर चाहे कितना भी सुडौल हो, मजबूत हो, मन चाहे कितना भी शुद्ध और पवित्र हो, बुद्धि एकाग्र हो लेकिन जब तक अपने स्वरूप को नहीं जाना तब तक न जाने कब शरीर धोखा दे दे? कब मन धोखा दे दे? कब बुद्धि धोखा दे दे? कोई पता नहीं। क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है और प्रकृति परिवर्तनशील है।

संसार की चीजें बदलती हैं। शरीर बदलता है। अन्तःकरण बदलता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जो कुछ देखने में आता है वह सब व्यक्त है। भूख-प्यास भी तो मन से देखने में आती है। सर्दी-गर्मी का पता त्वचा से चलता है किन्तु उसमें वृत्ति का संयोग होता है अतः वह भी तो व्यक्त ही है। इसीलिए भगवान कहते हैं किः ‘जो मूढ़ लोग हैं वे मेरे अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानते और मुझे जन्मने-मरने वाला मानते हैं। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्तिभाव को प्राप्त होते हैं।

….और मजे की बात है कि जो आदमी जहाँ है और जैसा है, वहीं से और वैसा ही वह दूसरे को देखता है।

बुद्धिहीन से तात्पर्य अँगूठाछाप से नहीं है वरन् जिसको पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, जिस तत्त्व को समझने के लिए बुद्धि मिली है उस तत्त्व में बुद्धि के न लगाकर हीन पदार्थों में उसे खर्च कर दिया, वह बुद्धिहीन है।

भगवान ने क्रियाशक्ति दी है तो क्रियाशक्ति से क्रिया को बढ़ाकर अपने को जंजाल में न डालें लेकिन क्रियाशक्ति को सत्कर्म में लगाकर अनंत जन्मों के कर्मों को काटने का प्रयत्न करें। जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है ऐसे ही कर्म से कर्म काटे जायें।

ईश्वर ने बुद्धिशक्ति दी है तो बुद्धि से हम जगत के पदार्थों के साथ बँधे नहीं लेकिन जहाँ से बुद्धि को सत्ता मिलती है उस अव्यक्त स्वरूप में बुद्धि को लगायें ताकि बुद्धि बुद्धि न बचे बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये।

बुद्धि को ऋतंभरा प्रज्ञा बनाने के दो तरीके हैं-

योगमार्ग और ज्ञानमार्ग।

योगमार्ग में धारणा-ध्यान करके, चित्त की वृत्ति का निरोध करके अपने स्वरूप का अनुसंधान किया जाये। बारंबार निरोधाकार वृत्ति बन जाये तो इससे भी बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा होने लगती है।

ज्ञानमार्ग के अनुसार दूसरा तरीका यह है कि बारंबार उस सच्चिदानंदघन, अज, अविनाशी, शुद्ध, बुद्ध, साक्षी, दृष्टा, असंग, निर्विकार, चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया जाये और जगत का व्यवहार करते हुए, बातचीत करते हुए फिर जगत का बाध कर दिया जाये…. यह ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ की प्रक्रिया है। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः ”कोई ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण बार-बार पढ़े और आत्मज्ञान न हो तो राम बादशाह सिर कटायेगा।”

‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में लीलावती, चुडाला, मंकी ऋषि आदि की कथाएँ आयेंगी और बाद में वशिष्ठ जी महाराज कहेंगे किः “हे रामजी ! वास्तव में बना कुछ नहीं।यह चित्त का फुरना मात्र है।” यही बात शंकराचार्य जी ने कही हैः

नास्ति अविद्या मनसोऽतिरक्ता

मनैवऽविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन्विलीने सकलं विलीनं

तस्मिन्जिगीर्णे सकलं जिगीर्णम्।।

यह अविद्या मन से अलग नहीं है। माया… माया…. माया… माया कोई लाल, पीली, हरी या सफेद साड़ी पहनी हुई महिला नहीं है। माया का मतलब हैः या मा सा माया। जो है नहीं फिर भी दिखे उसका नाम है माया। यह जो कुछ भी दिखता है वह नहीं है। जो नहीं है वह दिख रहा है और जो है वह दिखता नहीं है।

जो है वह दिखता क्यों नहीं? क्योंकि वह अव्यक्त है और हम लोग जीते हैं व्यक्त में। हम लोग व्यक्त होने वाले को मैं मानते हैं तो व्यक्त सच्चा लगता है लेकिन जिसके आधार पर है, उसका पता नहीं।

जीवन का सर्वांगीण विकास…

 

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जीवन का सर्वांगीण विकास…

निश्चिन्तता, निर्भीकता और प्रसन्नता से जीवन का सर्वांगीण विकास होगा । अतः उन्हें बढ़ाते जाओ । ईश्वर और संतों पर श्रद्धा-प्रीति रखने से निश्चिन्तता, निर्भीकता, प्रसन्नता अवश्य बढ़ती है ।

आत्मिक ऐश्वर्य, माधुर्य और पूर्ण प्रेम….। निष्कामता और एकाग्रता से आत्मिक ऐश्वर्य बढ़ता है । आत्मिक ऐश्वर्य से, सर्वात्मभाव से शुद्ध प्रेम की अभिव्यक्ति होती है । आप सबके जीवन में इसके लिए पुरुषार्थ हो और दिव्य सामर्थ्य प्रकट हो….।

थके, हारे, निराशावादी को सूर्य भले पुराना दिखे लेकिन आशावादी, उत्साही, प्रसन्नचित्त समझदार को तो पुराणपुरुषोत्तम सूर्य नित्य नया भासता है । आपका हर पल नित्य नये आनन्द और चमकता दमकता व्यतीत हो ।

आपका जीवन सफलता, उत्साह, आरोग्यता और आनन्द के विचार से सदैव चमकता दमकता रहे… आप विघ्न-बाधाओं के सिर पर नृत्य करते हुए आत्म-नारायण में निरन्तर आनन्द पाते रहें यह शुभ कामना….

नूतन वर्ष के मंगल प्रभात में जीवन को तेजस्वी बनाने का संकल्प करें । ईश्वर और संतों के मंगलमय आशीर्वाद आपके साथ हैं ।

दीप-प्राकट्य के साथ साथ आपकी आन्तर ज्योत का भी प्राकट्य हो ।

ज्योत से ज्योत जगाओ सदगुरु !

ज्योत से ज्योत जगाओ…..

मेरा अन्तर तिमिर मिटाओ सदगुरु !

ज्योत से ज्योत जगाओ…..

संसार की लहरियाँ तो बदलती जाएँगी, इसलिए हे मित्र ! हे मेरे भैया ! हे वीर पुरुष ! रोते, चीखते, सिसकते क्या जीना? मुस्कराते रहो…. हरि गीत गाते रहो…. हरि रस पाते रहो… यही शुभ कामना । आज से आपके नूतन वर्ष का प्रारम्भ…..

दुर्बल एवं हल्के विचारों से आपने बहुत-बहुत सहन किया है । अब इसका अन्त कर दो । दीपावली के दीपक के साथ साहस एवं सज्जनता को प्रकटाओ । जय हो ! शाबाश वीर ! शाबाश!

हे मानव ! अभी तुम चाहो तो जीवन का सूर्य डूब जाये उससे पहले सूर्यों के सूर्य, देवों के देव आत्मदेव का अनुभव करके मुक्त हो सकते हो । जीवनदाता में स्थिर हो सकते हो । सोहं के संगीत का गुँजन कर दो । फिर तो सदा दीवाली है ।

हम भारत वासी सचमुच भाग्यशाली हैं । भिन्न-भिन्न भगवानों की, देवी-देवताओं की उपासना-अर्चना से हमारे बहुआयामी मन को आन्तरिक माधुर्य मिल पाता है, जो तथाकथित धनाढ्य देशों में मिलना संभव नहीं है । भिन्नता में अभिन्न आत्मा-परमात्मा एक ही है ।

संयम और सदाचार के साथ संस्कृति के प्रचार में लगकर भारतभूमि की सेवा करो ।

कदम अपने आगे बढ़ाता चला जा….

दिलों के दिये जगमगाता चला जा….

भय, चिन्ता एवं बेचैनी से ऊपर उठो । आपकी ज्ञान ज्योति जगमगा उठेगी ।

सदा साहसी बनो । धैर्य न छोड़ो । हजार बार असफल होने पर भी ईश्वर के मार्ग पर एक कदम और रखो ।

भावना ही प्रेम का मूल है।

 

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भावना ही प्रेम का मूल है।

हरिबाबा से एक भक्त ने कहाः “महाराज ! यह अभागा, पापी मन रूपये पैसों के लिए तो रोता पिटता है लेकिन भगवान अपना आत्मा हैं, फिर भी आज तक नहीं मिलि इसके लिए रोता नहीं है। क्या करें ?”

हरिबाबाः “रोना नहीं आता तो झूठमूठ में ही रो ले।”

“महाराज ! झूठमूठ में भी रोना नहीं आता है तो क्या करें ?”

महाराज दयालु थे। उन्होंने भगवान के विरह की दो बातें कहीं। विरह की बात करते-करते उन्होंने बीच में ही कहा कि “चलो, झूठमूठ में रोओ।” सबने झूठमूठ में रोना चालू किया तो देखते-देखते भक्तों में सच्चा भाव जग गया।

झूठा संसार सच्चा आकर्षण पैदा करके चौरासी के चक्कर में डाल देता है तो भगवान के लिए झूठमूठ में रोना सच्चा विरह पैदा करके हृदय में प्रेमाभक्ति भी जगा देता है।

अनुराग इस भावना का नाम है कि “भगवान हमसे बड़ा स्नेह करते हैं, हम पर बड़ी भारी कृपा रखते हैं। हम उनको नहीं देखते पर वे हमको देखते रहते हैं। हम उनको भूल जाते हैं पर वे हमको नहीं भूलते। हमने उनसे नाता-रिश्ता तोड़ लिया है पर उन्होंने हमसे अपना नाता-रिश्ता नहीं तोड़ा है। हम उनके प्रति कृतघ्न हैं पर हमारे ऊपर उनके उपकारों की सीमा नहीं है। भगवान हमारी कृतघ्नता के बावजूद हमसे प्रेम करते हैं, हमको अपनी गोद में रखते हैं, हमको देखते रहते हैं, हमारा पालन-पोषण करते रहते हैं।’ इस प्रकार की भावना ही प्रेम का मूल है। अगर तुम यह मानते हो कि ‘मैं भगवान से बहुत प्रेम करता हूँ लेकिन भगवान नहीं करते’ तो तुम्हारा प्रेम खोखला है। अपने प्रेम की अपेक्षा प्रेमास्पद के प्रेम को अधिक मानने से ही प्रेम बढ़ता है। कैसे भी करके कभी प्रेम की मधुमय सरिता में गोता मारो तो कभी विरह की।

दिल की झरोखे में झुरमुट के पीछे से जो टुकुर-टुकुर देख रहे हैं दिलबर दाता, उन्हें विरह में पुकारोः ‘हे नाथ !…. हे देव !… हे रक्षक-पोषक प्रभु !….. टुकुर-टुकुर दिल के झरोखे से देखने वाले देव !…. प्रभुदेव !… ओ देव !… मेरे देव !…. प्यारे देव!….. तेरी प्रीति, तेरी भक्ति दे….. हम तो तुझी से माँगेंगे, क्या बाजार से लेंगे ? कुछ तो बोलो प्रभु !…’

कैसे भी उन्हें पुकारो। वे बड़े दयालु हैं। वे जरूर अपनी करूणा-वरूणा का एहसास करायेंगे।

तुलसी अपने राम को रीझ भजो या खीज।

भूमि फैंके उगेंगे, उलटे सीधे बीज।।

विरह से भजो या प्रेमाभक्ति से, जप करके भजो या ध्यान करके, उपवास, नियम-व्रत करके भजो या सेवा करके, अपने परमात्मदेव की आराधना ही सर्व मंगल, सर्व कल्याण करने वाली है।

भगवान के अवतार

 

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भगवान के अवतार

जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।

ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।

भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।

अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा…. और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।

शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।

रामू की गुरूभक्ति

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रामू की गुरूभक्ति

संत परम हितकारी होते हैं। वे जो कुछ कहें, करने के लिए डट जाना चाहिए। इसी में हमारा कल्याण निहित होता है। महापुरूष की बात को टालना नहीं चाहिए। वशिष्ठजी महाराज योगवशिष्ठ महारामायण में कहते हैं-

“हे राम जी ! त्रिभुवन में ऐसा कौन है जो संत की आज्ञा का उल्लंघन करके सुखी रह सके ?”

गुरूगीता में भगवान शंकर कहते हैं-

गुरूणां सदसद्वापि यदुक्तं तन्न लंघयेत्।

कुर्वन्नाज्ञां दिवारात्रौ दासवन्निवसेद् गुरौ।।

‘गुरूओं की बात सच्ची हो या झूठी, उसका उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए। रात और दिन गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए गुरु के सान्निध्य में दास बनकर रहना चाहिए।’

गुरूदेव की कही हुई बात चाहे झूठी दिखती हो फिर भी शिष्य को सन्देह नहीं करना चाहिए, कूद पड़ना चाहिए उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए।

सौराष्ट्र में रामू नाम के बढ़िया गुरूभक्त शिष्य हो गये। लाल जी महाराज पर उनका खत आता रहता था। लालजी महाराज ने ही रामू के जीवन की घटना बतायी थी।

एक बार उनके गुरू ने कहाः “रामू ! घोड़ागाडी ले आ। भगत के घर भोजन करने जाना है।”

रामू घोड़ागाड़ी ले आया। गुरु नाराज होकर बोलेः “अभी सुबह के सात बजे हैं, भोजन तो 11-12 बजे होगा। बेवकूफ कहीं का, 12 बजे भोजन करने जाना है और गाड़ी अभी ले आया? बेचारा ताँगेवाला तब तक बैठा रहेगा?”

रामू गया, ताँगेवाले को छुट्टी देकर आ गया। गुरु ने पूछाः “क्या किया?”

“ताँगा वापस कर दिया।” हाथ जोड़कर रामू बोला।

गुरुजीः “जब जाना ही था तो वापस क्यों किया? जा ले आ।”

रामू गया और ताँगेवाले को बुला लाया।

“गुरुजी ! ताँगा आ गया।”

गुरुजीः “अरे ! ताँगा ले आया? हमें जाना तो बारह बजे है न? पहले इतना समझाया अभी तक नहीं समझा? भगवान को क्या समझेगा? ताँगे की छोटी-सी बात को नहीं समझता, राम को क्या समझेगा?”

ताँगा वापस कर दिया गया। रामू आया तो गुरु गरज उठे।

“वापस कर दिया? फिर समय पर मिले-न-मिले, क्या पता? जा, ले आ।”

नौ बार ताँगा गया और वापस आया। रामू यह नहीं कहता कि गुरु महाराज ! आपने ही तो कहा था। वह सत्पात्र शिष्य जरा-भी चिढ़ता नहीं। गुरुजी तो चिढ़ने का व्यवस्थित संयोग खड़ा कर रहे थे। रामू को गुरुजी के सामने चिढ़ना तो आता ही नहीं था, कुछ भी हो, गुरुजी के आगे वह मुँह बिगाड़ता ही नहीं था। दसवीं बार ताँगा स्वीकृत हो गया। तब तक बारह बज गये थे। रामू और गुरुजी भक्त के घर गये। भोजन किया। भक्त था कुछ साधन सम्पन्न। विदाई के समय उसने गुरुजी के चरणों में वस्त्रादि रखे और साथ में, रूमाल में सौ-सौ के दस नोट भी रख दिये और हाथ जोड़कर विनम्रता से प्रार्थना कीः “गुरुजी ! कृपा करें, इतना स्वीकार कर लें। इनकार न करें।”

फिर वे ताँगे में बैठकर वापस आने लगे। रास्ते में गुरुजी ताँगवाले से बातचीत करने लगे। ताँगेवाले ने कहाः

“गुरुजी ! हजार रुपये में यह घोड़ागाडी बनी है, तीन सौ का घोड़ा लाया हूँ और सात सौ की गाड़ी। परंतु गुजारा नहीं होता। धन्धा चलता नहीं, बहुत ताँगेवाले हो गये हैं।”

“गुरुजीः “हजार रुपये में यह घोड़ागाड़ी बनी है तो हजार रुपये में बेचकर और कोई काम कर।”

ताँगेवालाः “गुरुजी ! अब इसका हजार रुपया कौन देगा? गाड़ी नयी थी तब कोई हजार दे भी देता, परंतु अब थोड़ी-बहुत चली है। हजार कहाँ मिलेंगे?”

गुरुजी ने उसे सौ-सौ के दस नोट पकड़ा दिये और बोलेः “जा बेटा ! और किसी अच्छे धन्धे में लग जा। रामू ! तू चला ताँगा।”

रामू यह नहीं कहता कि ‘गुरुजी मुझे नहीं आता। मैंने ताँगा कभी नहीं चलाया’। गुरुजी कहते हैं तो बैठ गया कोचवान होकर।

रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष आया। गुरुजी ने उसके पास ताँगा रुकवा दिया। उस समय पक्की सड़कें नहीं थीं, देहाती वातावरण था। गुरुजी सीधे आश्रम में जानेवाले नहीं थे। सरिता के किनारे टहलकर फिर शाम को जाना था। ताँगा रख दिया वटवृक्ष की छाया में। गुरुजी सो गये। सोये थे तब छाया थी, समय बीता तो ताँगे पर धूप आ गयी। घोड़ा जोतने के डण्डे थोड़े तप गये थे। गुरुजी उठे, डण्डे को छूकर देखा तो बोलेः

“अरे, रामू ! इस बेचारी गाड़ी को बुखार आ गया है। गर्म हो गयी है। जा पानी ले आ।”

रामू ने पानी लाकर गाड़ी पर छाँट दिया। गुरुजी ने फिर गाड़ी की नाड़ी देखी और रामू से पूछाः

रामूः “हाँ।”

गुरुजीः “तो यह गाड़ी मर गयी…. ठण्डी हो गयी है बिल्कुल।”

रामूः “जी, गुरुजी !”

गुरुजीः “मरे हुए आदमी का क्या करते हैं?”

रामूः “जला दिया जाता है।”

गुरुजीः “तो इसको भी जला दो। इसकी अंतिम क्रिया कर दो।”

गाड़ी जला दी गयी। रामू घोड़ा ले आया।

“अब घोड़े का क्या करेंगे?” रामू ने पूछा।

गुरुजीः “घोड़े को बेच दे और उन पैसों से गाड़ी का बारहवाँ करके पैसे खत्म कर दे।”

घोड़ा बेचकर गाड़ी का क्रिया-कर्म करवाया, पिण्डदान दिया और बारह ब्राह्मणों को भोजन कराया। मृतक आदमी के लिए जो कुछ किया जाता है वह सब गाड़ी के लिए किया गया।

गुरुजी देखते हैं कि रामू के चेहरे पर अभी तक फरियाद का कोई चिह्न नहीं ! अपनी अक्ल का कोई प्रदर्शन नहीं ! रामू की अदभुत श्रद्धा-भक्ति देखकर बोलेः”अच्छा, अब पैदल जा और भगवान काशी विश्वनाथ के दर्शन पैदल करके आ।”

कहाँ सौराष्ट्र (गुज.) और कहाँ काशी विश्वनाथ (उ.प्र.) !

रामू गया पैदल। भगवान काशी विश्वनाथ के दर्शन पैदल करके लौट आया।vanath

गुरुजी ने पूछाः “काशी विश्वनाथ के दर्शन किये?”

रामूः “हाँ गुरुजी।”

गुरुजीः “गंगाजी में पानी कितना था?”

रामूः “मेरे गुरुदेव की आज्ञा थीः ‘काशी विश्वनाथ के दर्शन करके आ’ तो दर्शन करके आ गया।”

गुरुजीः “अरे ! फिर गंगा-किनारे नहीं गया? और वहाँ मठ-मंदिर कितने थे?”

रामूः “मैंने तो एक ही मठ देखा है – मेरे गुरुदेव का।”

गुरुजी का हृदय उमड़ पड़ा। रामू पर ईश्वरीय कृपा का प्रपात बरस पड़ा। गुरुजी ने रामू को छाती से लगा लियाः “चल आ जा…. तू मैं है…. मैं तू हूँ…. अब अहं कहाँ रहेगा !”

ईशकृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहिं वेद पुरान।।

रामू का काम बन गया, परम कल्याण उसी क्षण हो गया। रामू अपने आनन्दस्वरूप आत्मा में जग गया, उसे आत्मसाक्षात्कार हो गया….

आत्म-साक्षात्कार या तत्त्वबोध तब तक संभव नहीं जब तक ब्रह्मवेत्ता महापुरूष साधक के अन्तःकरण का संचालन नहीं करते। आत्मवेत्ता महापुरूष जब हमारे अन्तःकरण का संचालन करते हैं तब अन्तःकरण तत्त्व में स्थित हो सकता है, नहीं तो किसी अवस्था में, किसी मान्यता में, किसी वृत्ति में, किसी आदत में साधक रूक जाता है। रोज आसन किये, प्राणायाम किये, शरीर स्वस्थ रहा, सुख-दुःख के प्रसंग में चोटें कम लगीं, घर की आसक्ति कम हुई, पर व्यक्तित्व बना रहेगा। उससे आगे जाना है तो महापुरूषों के आगे बिलकुल मर जाना पड़ेगा। ब्रह्मवेत्ता सदगुरू के हाथों मे जब हमारे अन्तःकरण का स्टीयरिंगव्हील आता है तो तब आगे की यात्रा होती है। कबीर जी ने कहाः

सहजो कारज संसार को गुरू बिन होत नाहीं।

हरि तो गुरू बिन क्या मिले समझ ले मन माँहीं।।

 

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

asaramji

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

 

जब भगवान के सिवाय सब बेकार लगे तो समझो कि वह पहली भूमिका पर पहुँचा है । उसके लिए विघ्न-बाधाएँ साधन बन जाएँगी । विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है । विघ्न-बाधाएँ नहीं आयें तो संगीत छिड़ेगा नहीं ।

भौंरी कीड़े को उठाकर अपने बिल में रखती है । एक डंक मारती है, वह कीड़ा छटपटाता है । उसके शरीर से पसीने जैसा कुछ प्रवाह निकलता है । फिर भौंरी जब दूसरा डंक मारती है तब कीड़ा तेजी से छटपटाता है और वह पसीना कड़ा हो जाता है, जाला बन जाता है । जब तीसरा डंक मारती है तो कीड़ा खूब छटपटाता है, बहुत दुःखी होता है मगर उस डंक के कारण पसीने से जो जाला बना है उसी में से पंख फूट निकलते हैं और वह उड़ान भरता है ।

वैज्ञानिकों ने कीड़े में से मकड़ी बनने की इस प्रक्रिया को देखा । भौंरी के द्वारा तीसरे डंक सहने की तीव्र पीड़ा से उन कीड़ों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बारीक कैंची बनाई और तीसरे डंक से कीड़ा छटपटाकर जाला काटे उसकी अपेक्षा उन्होंने कैंची से वह जाला काट दिया । कीड़े को राहत मिली, पीड़ा तो नहीं हुई, मगर फिर उसके पंख नहीं फूटे । उड़ान भरने की योग्यता उसमें नहीं आयी ।

ऐसे ही परमात्मा जब अपने साधक को अपनी दिव्य अनुभूति में उड़ान भरवाते हैं तब उसको चारों तरफ से विघ्न-बाधाएँ देते हैं ताकि उसका विचारबल, मनोबल, समझशक्ति एवंआत्मशक्ति बढ़ जाये । मीरा के लिए परमात्मा ने राणा को तैयार कर दिया । नरसिंह मेहता का भाई ही उनका विरोध करता था, साथ में पूरी नगरी जुड़ गयी । शबरी भीलनी हो, चाहे संतकबीर हो, चाहे एकनाथ जी हों या संत तुकाराम हों, कोई भी हो, लोग ऐसे भक्तों के लिए एक प्रकार का जाला बना लेते हैं । एकनाथ जी महाराज के खिलाफ हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर एक चांडाल चौकड़ी बनायी थी ।

जैसे कीड़े के लिए तीसरा डंक पंख फूट निकलने के लिए होता है ऐसे ही प्रकृति की ओर से यह सारा खिलवाड़ साधक के उत्थान के लिए होता है । जिन्हे सत्संग का सहारा नहीं है, पहली दूसरी भूमिका में दृढ़ता नहीं है वे हिल जाते हैं ।

बुद्ध के मन में एक बार आया कि यहाँ तो कोई पहचानता भी नहीं, खाने का भी ठिकाना नहीं है, लोग मुझ पर थूकते हैं, हालाँकि मैं उन्हें कुछ कहता भी नहीं । यह भी कोई ज़िन्दगी है! चलो, वापस घर चलें । उस समय वे सिद्धार्थ थे । सत्संग का सहारा नहीं था । पहली भूमिका में दृढ़ता चाहिए । बचपन का वैराग्य हो तो ठीक है मगर बुढ़ापे में वैराग्य जगा है या फिर भी भोग भोगने के बाद, बच्चों को जन्म देने के बाद पहली भूमिका मिली हो तो जरा कमजोर है । बुद्ध के मन में आया कि चलो घर जायें । उन्हीं विचारों में खोये से बैठे थे । इतने में देखते हैं कि सामने पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया । सिद्धार्थ उसको ध्यान से देख रहे थे । उन्होंने सोचा कि यह कोई झूठी घटना नहीं है । यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

सिद्धार्थ की पहली भूमिका थी । अपने आप संस्कार जग गये । सिद्धार्थ ने निश्चय कर लियाः “कार्यं साधयामि व देहं पातयामि । या तो कार्य साध लूँगा या मर जाऊँगा । महल में भी एक दिन मर ही जाना है । साधना करते-करते भी मर जाऊँगा तो हर्ज नहीं । ऐसा सोचकर पक्की गाँठ बाँध ली और चल पड़े । सात साल के अन्दर ही उन्हें परम शांति मिल गयी ।

जब आदमी के शुभ विचार जगते हैं तब स्नान, दान, सेवा, स्मरण, सत्संग परहित उसे अच्छे लगते हैं । जिसे पहली भूमिका प्राप्त नहीं हुई उसे इन सब कार्यों के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी । वहाँ से वह पलायन हो जायेगा । उसे वह सब अच्छा नहीं लगेगा । वाह-वाही पाने, यश कमाने को तो आगे आ जायेगा पर फिर खिसक जायेगा । ऐसे लोग फिर पशु, पक्षी, कीट की निम्न योनियों में जाते हैं ।

दूसरी भूमिका होती है शुभेच्छा । ‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि परमात्मा मिले, ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह से देहातीत तत्त्व का साक्षात्कार हो जाये? अफसर, साहब, सेठ, साहूकार बन गये मगर आखिर क्या?’ ऐसा विचार उसे आता रहता है ।

यह दूसरी भूमिका जिसे प्राप्त हो गई वह घर में भी है तो घर वाले उसे दबा नहीं सकेंगे । सत्संग और सत्कर्म में रूचि रहेगी । भोग-वासना फीकी पड़ जायेगी । मगर फिर रोकने वाले आ जायेंगे । उसे महसूस होगा कि ईश्वर के रास्ते में जाने में बहुत सारे फायदे हैं । विघ्न करने वाले साधक के आगे आखिर हार मान जायेंगे । ईश्वर का दर्शन तो इतने में नहीं होगा मगर जो संसार कोसता था वह अनुकूल होने लगेगा ।

उसके बाद तीसरी भूमिका आयेगी, उसमें सत्संग के वचन बड़े मीठे लगेंगे । उन्हीं वचनों का निदिध्यासन करेगा, ध्यान करेगा, श्वासोच्छोवास को देखेगा । ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ’ ऐसा चिन्तन-ध्यान करेगा । गुरुदेव का ध्यान करेगा तो गुरुदेव दिखने लगेंगे । गुरुदेव से मानसिक बातचीत भी होगी, प्रसन्नता और आनंद आने लगेगा । संसार का आकर्षण बिल्कुल कम हो जायेगा। फिर भी कभी-कभी संसार लुभाकर गिरा देगा । फिर से उठ खड़ा होगा । फिर से गिरायेगा, फिर खड़ा होगा । परमात्मा का रस भी मिलता रहेगा और संसार का रस कभी-कभी खींचता रहेगा । ऐसा करते-करते चौथी भूमिका आ जाती है तब साक्षात्कार हो जाता है फिर संसार का आकर्षण नहीं रहता । जब स्वप्न में से उठे तो फिर स्वप्न की चीजों का आकर्षण खत्म हो गया । चाहे वे चीज़ें अच्छी थीं या बुरी थीं । चाहे दुःख मिला, चाहे सुख मिला, स्वप्न की चीज़ें साथ में लेकर कोई भी आदमी जग नहीं सकता । उन्हें स्वप्न में ही छोड़ देता है । ऐसे ही जगत की सत्यता साथ में लेकर साक्षात्कार नहीं होता । चौथी भूमिका में जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है । वृत्ति व्यापक हो जाती है । वह महापुरुष होते हुए भी अनेक ब्रह्माण्डों में फैल जाता है । उसको यह अनुभव होता है कि सूरज मुझमें है, चन्द्र मुझमें है, नक्षत्र मुझमें हैं । यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद भी मुझमें हैं । ऐसा उन महापुरुषों का अनुभव होता है । उनको कहा जाता हैब्रह्मवेत्ता । वे ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं ।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता

ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरुष विधाता

ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाईं आधा आखर

नानक! ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर

माया के दो आवरण

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माया के दो आवरण

 

तुम्हारे ‘स्व’ पर, आत्मा पर माया के दो आवरण हैं। माया की यह शक्ति है। जैसे विद्युत के तार में विद्युत दिखती नहीं लेकिन बल्बों के द्वारा, पंखों के द्वारा विद्युत की उपस्थिति का पता चलता है। ऐसे ही माया कोई आकृति धारण करके नहीं बैठी है लेकिन माया का विस्तार यह जगत दिख रहा है उससे माया के अस्तित्व का पता चलता है।

आपका ‘स्व’ इतना स्वतन्त्र है और शरीर ‘पर’ है। बेवकूफी से क्या हो गया है कि ‘स्व’ का पता नहीं और ‘पर’ को ‘स्व’ मान लिया….. शरीर को ‘मैं’ मान लिया।

व्यवहार में कहते हैं, ‘मेरा हाथ….’ तो तुम हाथ नहीं हो, हाथ से अलग हो। ‘मेरा पैर….’ तो तुम पैर नहीं हो, पैर से अलग हो। ‘मेरा पेट…’ तो तुम पेट नहीं हो, पेट से अलग हो। ‘मेरा शरीर….’ तो तुम शरीर नहीं हो, शरीर से अलग हो। ‘मेरा मन…..’ तो तुम मन नहीं हो, मन से अलग हो। ‘मेरी बुद्धि….’ तो तुम बुद्धि नहीं हो, बुद्धि से अलग हो।

इस माया की दो शक्तियाँ हैः आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति। आवरण बुद्धि पर पड़ता है और विक्षेप मन पर पड़ता है। सत्कार्य करके, जप तप करके, निष्काम कर्म करके विक्षेप हटाया जाता है। विचार करके आवरण हटाया जाता है।

पचास वर्ष तपस्या की, एकान्त का सेवन किया, मौन रहे, समाधि की, बहुत प्रसन्न रहे, सुखी रहे लेकिन भीड़ भड़ाके में आते ही गड़बड़ होगी। भीड़ में वाहवाही होगी तो मजा आयेगा लेकिन लोग तुम्हारे विचार के विरोधी होंगे तो तुम्हारा विक्षेप बढ़ जाएगा। क्योंकि अभी बुद्धि पर से आवरण गया नहीं। अगर आवरण चला गया तो तुम्हें शूली पर भी चढ़ा दिया जाय, कंकड़-पत्थर मारे जाएँ, अपमान किया जाय फिर भी आत्मनिष्ठ के कारण तुम दुःखी जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर दुःख का प्रभाव नहीं पड़ेगा, अपमान में तुम अपमानित जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर अपमान का प्रभाव नहीं पड़ेगा। मृत्यु के समय लोगों को तुम्हारी मृत्यु होती हुई दिखेगी परन्तु तुम पर मृत्यु का प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम खाते-पीते, आते-जाते, लेते-देते हुए दिखोगे फिर भी तुम इन सबसे परे होगे। तुम आत्म-स्वरूप से कितने स्वतंन्त्र हो !

वासना से परतन्त्रता का जन्म होता है और आत्म विचार से स्वतन्त्रता का।

गुरु और शास्त्र

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गुरु और शास्त्र

                                                             जगन्मिथ्यात्वप्रतिपादन
वशिष्ठजी बोले, हे देव! शिव किसको कहते हैं और ब्रह्म, आत्म, परमात्म, तत्सत्, निष्किञ्चन, शून्य, विज्ञान इत्यादिक किसको कहते हैं और ये भेदसंज्ञा किस निमित्त हुई हैं कृपा करके कहो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जब सबका अभाव होता है तब अनादि अनन्त अनाभास सत्तामात्र शेष रहता है जो इन्द्रियों का विषय नहीं उसको निष्किञ्चन कहते हैं | फिर मैंने पूछा, हे ईश्वर! जो इन्द्रियाँ बुद्धि आदिक का विषय नहीं उसको क्योंकर पा सकते हैं? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर! जो मुमुक्षु हैं और जिनको वेद के आश्रयसंयुक्त सात्त्विकी वृत्ति प्राप्त हुई है उनको सात्त्विकीरूप जो गुरु शास्त्रनाम्नी विद्या प्राप्त होती है उससे अविद्या नष्ट हो जाती है और आत्मतत्त्व प्रकाश हो आता है | जैसे साबुन से धोबी वस्त्र का मल उतारता है तैसे ही गुरु और शास्त्र अविद्या को दूर करते हैं | जब कुछ काल में अविद्या नष्ट होती है तब अपना आप ही दिखता है | हे मुनीश्वर! जब गुरु और शास्त्रों का मिलकर विचार प्राप्त होता है, तब स्वरूप की प्राप्ति होती है द्वैतभ्रम मिट जाता है और सर्व आत्मा ही प्रकाशता है और जब विचार द्वारा आत्मतत्त्व निश्चय हुआ कि सर्व आत्मा ही है उससे कुछ भिन्न नहीं तो अविद्या जाती रहती है | हे मुनीश्वर! आत्मा की प्राप्ति में गुरु और शास्त्र प्रत्यक्ष कारण नहीं क्योंकि जिनके क्षय हुए से वस्तु पाइये उनके विद्यमान हुए कैसे पाइये? देह इन्द्रियों सहित गुरु होता है और ब्रह्म सर्व इन्द्रियों से अतीत है, इनसे कैसे पाइये? अकारण है परन्तु कारण भी है, क्योंकि गुरु और शास्त्र के क्रम से ज्ञान की सिद्धता होती है और गुरु और शास्त्र बिना बोध की सिद्धता नहीं होती | आत्मा निर्देश और अदृश्य है तो भी गुरु और शास्त्र से मिलता है और गुरु और शास्त्र से भी मिलता नहीं अपने आप ही से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है | जैसे अन्धकार में पदार्थ हो और दीपक के प्रकाश से दीखे तो दीपक से नहीं पाया अपने आपसे पाया है | तैसे ही गुरु और शास्त्र भी है | यदि दीपक हो और नेत्र न हों तब कैसे पाइये और नेत्र हों और दीपक न हो तो भी नहीं पाया जाता जब दोनों हों तब पदार्थ पाया जाता है, तैसे ही गुरु और शास्त्र भी हों और अपना पुरुषार्थ और तीक्ष्णबुद्धि हो तब आत्मतत्त्व मिलता है अन्यथा नहीं पाया जाता | जब गुरु, शास्त्र और शिष्य की शुद्ध बुद्धि तीनों इकट्ठे मिलते हैं तब संसार के सुख दुःख दूर होते हैं और आत्मपद की प्राप्ति होती है | जब गुरु और शास्त्र आवरण को दूर कर देते हैं तब आपसे आप ही आत्मपद मिलता है | जैसे जब वायु बादल को दूर करती है तब नेत्रों से सूर्य दीखता है | अब नाम के भेद सुनो | जब बोध के वश से कर्म इन्द्रियाँ और ज्ञान इन्द्रियाँ क्षय हो जाती हैं उसके पीछे जो शेष रहता है उसका नाम संवित््तत्त्व आत्मसत्ता आदिक हैं | जहाँ ये सम्पूर्ण नहीं और इनकी वृत्ति भी नहीं उसके पीछे जो सत्ता शेष रहती है सो आकाश से भी सूक्ष्म और निर्मल अनन्त परमशून्यरूप है- कहाँ शून्य का भी अभाव है | हे मुनीश्वर! जो शान्तरूप मुमुक्षु मनन कलना से संयुक्त है उनको जीवन्मुक्त पद के बोध के निमित्त शास्त्र मोक्ष उपाय, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, लोकपाल, पण्डित, पुराण, वेद शास्त्र और सिद्धान्त रचे हैं और शास्त्रों ने चैतन्य ब्रह्म, शिव, आत्मा, परमात्मा, ईश्वर, सत्, चित्,आनन्द आदिक भिन्न भिन्न अनेक संज्ञा कही हैं पर ज्ञानी को कुछ भेद नहीं | हे मुनीश्वर! ऐसा जो देव है, उसका ज्ञानवान् इस प्रकार अर्चन करते हैं और जिस पद के हम आदिक टहलुये हैं उस परमपद को वे प्राप्त होते हैं | फिर मैंने पूछा, हे भगवन्! यह सब जगत् अविद्यमान है और विद्यमान की नाईं स्थित है सो कैसे हुआ है | समस्त कहने को तुमहीं योग्य हो? ईश्वर बोले, हे मुनीश्वर!जो ब्रह्म आदिक नाम से कहाता है वह केवल शुद्ध संवित्मात्र है और आकाश से भी सूक्ष्म है | उसके आगे आकाश भी ऐसा स्थूल है जैसा अणु के आगे सुमेरु होता है | उसमें जब वेदनाशक्ति आभास होकर फुरती है तब उसका नाम चेतन होता है | फिर जब अहन्तभाव को प्राप्त हुआ-जैसे स्वप्न में पुरुष आपको हाथी देखने लगे तैसे आपको अहं मानने लगा, फिर देशकाल आकाश आदिक देखने लगा तब चेतन कला जीव अवस्था को प्राप्त हुई और वासना करनेवाली हुई, जब जीवभाव हुआ तब बुद्धि निश्चयात्मक होकर स्थित हुई और शब्द और क्रियाज्ञान संयुक्त हुई और जब इनसे मिलकर कल्पना हुई तब मन हुआ जो संकल्प का बीज है | तब अन्तवाहक शरीर में अहंरूप होकर ब्रह्मसत्ता स्थित हुई | इस प्रकार यह उत्पन्न हुई है | फिर वायुसत्ता स्पन्द हुई जिससे स्पर्श सत्ता त्वचा प्रकट हुई, फिर तेजसत्ता हुई प्रकाश सत्ता हुई और प्रकाश से नेत्रसत्ता प्रकट हुई, फिर जलसत्ता हुई जिससे स्वादरूप-रससत्ता हुई और उससे जिह्वा प्रकट हुई, फिर गन्धसत्ता से भूमि, भूमि से घ्राणसत्ता और उससे पिण्डसत्ता प्रकट हुई | फिर देशसत्ता, कालसत्ता और सर्व सत्ता हुईं जिनको इकट्ठा करके अहंसत्ता फुरी | जैसे बीज, पत्र, फूल, फलादिक के आश्रय होता है तैसे ही इस पुर्यष्टका को जानो | यही अन्तवाहक देह है | इन सबका आश्रय ब्रह्मसत्ता है | वास्तव में कुछ उपजा नहीं केवल परमात्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | जैसे तरंगादि में जल स्थित है तैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है | हे मुनीश्वर! संवित् में जो संवेदन पृथकरूप होकर फुरे उसे निस्स्पन्द करके जब स्वरूप को जाने तब वह नष्ट हो जाती है | जैसे संकल्प का रचा नगर संकल्प के अभाव हो जाता है, तैसे ही आत्मा के ज्ञान से संवेदन का अभाव हो जाता है | हे मुनीश्वर! संवेदन तबतक भासता है जबतक उसको जाना नहीं, जब जानता है तब संवेदन का अभाव हो जाता है और संवित् में लीन हो जाता है, भिन्नसत्ता इसकी कुछ नहीं रहती | हे मुनीश्वर! जो प्रथम अणु तन्मात्रा थी सो भावना के वश से स्थूल देह को प्राप्त हुई और स्थूल देह होकर भासने लगी, आगे जैसे जैसे देशकाल पदार्थ की भावना होती गई तैसे तैसे भासने लगी और जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर भासता है तैसे ही भावना के वश से ये पदार्थ भासने लगे हैं मैंने पूछा, हे भगवन्! गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर के समान इसको कैसे कहते हो? यह जगत् तो प्रत्यक्ष दीखता है? वासना के वश से दीखता है कि अविद्यमान में स्वरूप के प्रमाद करके विद्यमान बुद्धि हुई है और जगत् के पदार्थौं को सत् जानकर जो वासना फुरती है उससे दुःख होता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् अविद्यमान है | जैसे मृगतृष्णा का जल असत्य होता है तैसे ही यह जगत् असत्य है उसमें वासना, वासक और वास्य तीनों मिथ्या हैं जैसे मृगतृष्णा का जल पान करके कोई तृप्त नहीं होता, क्योंकि जल ही असत् है, तैसे ही यह जगत् ही असत् है इसके पदार्थों की वासना करनी वृथा है | ब्रह्मा से आदि तृणपर्यन्त सब जगत मिथ्यारूप है | वासना, वासक और वास्य पदार्थों के अभाव हुए केवल आत्मतत्त्व रहता है और सब भ्रम शान्त हो जाता है | हे मुनीश्वर! यह जगत् भ्रममात्र है-वास्तव में कुछ नहीं जैसे बालक को अज्ञान से अपनी परछाहीं में वैताल भासता है और जब विचार करके देखे तब वैताल का अभाव हो जाता है तैसे ही अज्ञान से यह जगत् भासता है और आत्म विचार से इसका अभाव हो जाता है | जैसे मृगतृष्णा की नदी भासती है और आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासता है, तैसे ही आत्मा में अज्ञान से देह भासता है | जिसकी बुद्धि देहादिक में स्थिर है वह हमारे उपदेश के योग्य नहीं है | जो विचारवान् है उसको उपदेश करना योग्य है और जो मूर्ख भ्रमी और असत््वादी सत््कर्म से रहित अनार्य है उसको ज्ञानवान् उपदेश न करे | जिनमें विचार, वैराग्य, कोमलता और शुभ आचार हों उनको उपदेश करना योग्य है और जो इन गुणों से रहितृ हों उनको उपदेश करना ऐसे होता है जैसे कोई महासुन्दर और सुवर्णवत् कान्तिवाली कन्या को नपुंसक को विवाह देने की इच्छा करे |

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