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जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

 

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जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

जिनकी दृष्टि मात्र से जीव आनन्द को प्राप्त होता है, जिसकी महिमा गाते शास्त्र थकते नहीं, युद्ध के मैदान में न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण जिस ज्ञान की श्रेष्ठता व पवित्रता बताते हैं उस ज्ञान को प्राप्त किये हुए आत्मवेत्ता जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन करने की कई दिनों की इच्छा पूर्ण हुई। सुना था कि ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष श्री रमण महर्षि के सान्निध्य में बैठने मात्र से हृदय शान्ति व आनन्द का अनुभव करता है। आज वह सुअवसर प्राप्त हो गया।

भक्त-मण्डल महर्षि को प्रणाम करके बैठा। किसी ने श्रीकृष्ण की आराधना की थी तो किसी ने अम्बाजी की, किसी ने रामजी को रिझाने के प्रयास किये थे तो किसी ने सूर्यनारायण को अर्घ्य दिये थे किसी ने व्रत किये थे तो किसी ने फलाहार से वर्ष बिताए थे। किसी ने दो देव बदले थे तो किसी ने तीन, चार या पाँच देव बदले थे।

जब तक ज्ञानवान, आत्मारामी, प्रबुद्ध महापुरुष के चरणों में जाकर साधना का मार्ग सुनिश्चित नहीं होता तब तक मनमानी साधना जमती नहीं। हृदय की गहराई में आशंका बनी रहती है कि साधना पूर्ण होगी कि नहीं, फलदायी बनेगी कि नहीं। गहराई में यह संदेह विद्यमान हो तो ऊपर-ऊपर से कितने ही व्रत नियम करो, कितनी ही साधना करो, शरीर को कष्ट दो लेकिन पूर्णरूपेण लाभ नहीं होता। अचेतन मन में सन्देह बना ही रहता है। यही हम लोगों के लिए बड़े में बड़ा विघ्न है।

योगवाशिष्ठ महारामायण में आया है कि शमवान पुरुष के सर्व सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, उसके चित्त में शोक के प्रसंग में शोक नहीं होता, हर्ष के प्रसंग में हर्ष नहीं होता, भय के प्रसंग में भयभीत दिखता हुआ भी भयभीत नहीं होता, रूदन के प्रसंग में रोता हुआ दिखता है फिर भी नहीं रोता है, सुख के प्रसंग में सुखी दिखता है फिर भी सुखी नहीं होता।

जो सुखी होता है वह दुःखी भी होता है। जितना अधिक सुखी होता है उतना अधिक दुःख के आघात सहता है। मान के दो शब्दों से जितना अधिक खुश होता है उतना अधिक अपमान के प्रसंग में व्यग्र होता है। धन की प्राप्ति से जितना अधिक हर्ष होता है, धन चले जाने से उतना अधिक शोक होता है। चित्त जितना तुच्छ, हल्का और अज्ञान से आक्रान्त होता है उतना ही छोटी-छोटी बातों से क्षोभित होता है। चित्त जब बाधित हो जाता है तब क्षोभित होता हुआ दिखे उसको क्षोभ स्पर्श नहीं कर सकता। अष्टावक्र मुनि ने राजा जनक को कहाः

धीरो न द्वेष्टि ससारं आत्मानं न दिदृक्षति।

हर्षाभर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति।।

“हर्ष और द्वेष से रहित ज्ञानी संसार के प्रति न द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है। वह न मरा हुआ है और न जीता है।”

(अष्टावक्र गीताः 83)

जो धीर पुरुष हैं, शम को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने जीवन के परम लक्ष्य को सिद्ध कर लिया, परमात्म-दर्शन कर लिया, ब्रह्मा-विष्णु-महेश समन्वित विश्व के तमाम देवों की मुलाकात कर ली, जो अपने स्वरूप में परिनिष्ठित हो गये वे ही कृतकृत्य हैं। शास्त्रों में उन्हीं को धीर कहा है।

जो क्षुधा-तृषा, सर्दी-गर्मी सहन करते हैं उनमें तो धैर्य तो है लेकिन वे तपस्वी हैं। वे व्यावहारिक धैर्यवान हैं। शास्त्र किनको धैर्यवान कहते हैं? अष्टावक्र मुनि कहते हैं- धीरो न द्वेष्टि संसारम्…. संसार की किसी भी परिस्थिति में उद्विग्न नहीं होता, उसे द्वेष नहीं होता। आत्मानं न दिदृक्षति। आत्मा-परमात्मा का दर्शन करने की, उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। संसार की प्राप्ति तो नहीं चाहता, इतना ही नहीं प्रभु को प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रही। क्योंकि अपना आत्मा ही प्रभु के रूप में प्रत्यक्ष हो गया है। फिर प्राप्त करना कहाँ बाकी रहा? जैसे, मेरे को आसारामजी महाराज के दर्शन करने की इच्छा नहीं। अगर मैं इच्छा करूँ तो मेरी इच्छा फलेगी क्या? मैं जानता हूँ कि आसारामजी महाराज कौन हैं।

जिसने अपने-आत्मस्वरूप को जान लिया, परमात्म-स्वरूप को जान लिया उसको परमात्म-प्राप्ति की इच्छा नहीं रहती।

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भगवान के अवतार

 

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भगवान के अवतार

जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।

ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।

भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।

अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा…. और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।

शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।

दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।

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दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।

 

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।28।।

‘(निष्काम भाव से) श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादिजनित द्वन्द्वरूप मोह से मुक्त और दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।’

(गीताः 7.28)

जगत की वासनाएँ ही पाप हैं और निष्काम कर्म पुण्य हैं। पुण्यकर्मों  के द्वारा जिनके पापों का अन्त हो गया है वे द्वन्द्व और मोह से मुक्त होकर, ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात दृढ़ता पूर्वक मुझे भजते हैं।

मोह विचार से दूर होता है और द्वन्द्व ज्ञाननिष्ठा से। इसलिए पहले मोह दूर होगा और फिर द्वन्द्व समाप्त होंगे क्योंकि द्वन्द्वों की उत्पत्ति मोह से ही होती है। द्वन्द्व-मोह से मुक्ति, दृढ़ व्रत और भजन ये तीनों बातें एक साथ ही होनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि विवेक होने के पश्चात जो भजन करता है उसे द्वन्द्व चलायमान नहीं कर सकते क्योंकि विवेक द्वारा उसने अपनी असंगता का अनुभव कर लिया है।

निष्काम कर्म से, श्रेष्ठ कर्म से, पुण्यकर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। शुद्ध हृदयवाला ही दृढ़व्रती होकर, कृतनिश्चयी होकर भगवान का भजन कर सकता है।

लोग भगवान के भजन का प्रारंभ तो करते हैं किन्तु बीच में ही भजन छूट जाता है। चार दिन भजन करते हैं, फिर छूट जाता है। नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए। समय का नियम छूट जाये, कोई बात नहीं। स्थान का नियम छूट जाये कोई बात नहीं। किन्तु जो व्रत अपने जीवन में ग्रहण करें उसका पालन अवश्य करना चाहिए। समय और स्थान का नियम टूटने पर भी व्रत नहीं टूटना चाहिए। भगवान का भजन, नाम-जप दृढ़ता से करना चाहिए।

तमाम प्रकार की इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व हमारे चित्त की शक्तियों को बिखेर देते हैं लेकिन जिनके पापों का अन्त हो गया है ऐसे भक्त चित्त की तमाम शक्तियों को केन्द्रित करके भगवान के भजन में दृढ़तापूर्वक लग जाते हैं। दृढ़ता से भगवान का भजन करने वाले स्वयं ही भगवन्मय हो जाते हैं।

भजन में जब तक दृढ़ता नहीं आती तब तक भजन का रस आता और जब तक भजन का रस नहीं आता तब तक संसार के रस का आकर्षण भी नहीं जाता। यदि एक बार भी भगवद्-भजन का रस मिल जाये तो संसार के समस्त रस फीके हो जाते हैं।

धन-वैभव, साधन-संपदा अज्ञान से सुखद लगते हैं लेकिन उनमें द्वन्द्व रहते हैं। राग-द्वेष, इच्छा-वासना के पीछे जीव का जीवन समाप्त हो जाता है और द्वन्द्वों से मुक्त हुए बिना भगवान की दृढ़ भक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती।

निर्द्वन्द्व तो वही हो सकता है जिसने पुण्य कर्मों के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर दिया है। निर्द्वन्द्व तो वही हो सकता है जिसने श्रीकृष्ण के ज्ञान को, ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के ज्ञान को पचा लिया है।

किसी सच्चे सदगुरु का मार्गदर्शन मिल जाये और साधक दृढ़व्रती होकर उस मार्ग पर चल पड़े तो परमात्म-प्राप्ति का कार्य सरल बन जाता है।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

भगवान की विभूतियाँ

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भगवान की विभूतियाँ

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।

“हे अर्जुन ! जल में मैं रस हूँ। चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ। संपूर्ण वेदों में मैं प्रणव (ॐ) हूँ। आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ।

पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में मैं तेज हूँ। संपूर्ण भूतों में मैं जीवन हूँ अर्थात् जिससे वे जीते हैं वह तत्त्व मैं हूँ तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ।”

(गीताः 7.8,9)

जल में जो रस वह रस परमात्मा है। वैज्ञानिक दृष्टि से जल का विश्लेषण करोगे तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन – ये दो गैस मिलेगी। इन दो गैसों को मिलाने से रस उत्पन्न नहीं होता किन्तु विज्ञान बाहर की आँखों से देखना चाहता है और विज्ञान की आँख से जो दिखेगा वह दृश्य दिखेगा। दृश्य के भीतर जो अदृश्य रस है वह विज्ञान की आँख से नहीं दिखता। भीतर का रस तो वे ही देख पाते हैं जो भीतर में, गहराई में जाते हैं। जैसे, दो मित्र परस्पर मिले। एक का हाथ दूसरे के हाथ में आया…. बड़ा आनन्द आया… बड़ा रस मिला। अगर आप मित्र के हाथ को लेबोरेटरी में ले जाओ तो त्वचा, मांस, रक्त, अस्थि के सिवा उसमें कुछ नहीं मिलेगा। फिर भी जब मित्र का हाथ आपके हाथ में आया तो रस मिला। तो कहना पड़ेगा कि रस भीतर होता है, बाहर नहीं। जो वास्तविक में रस है वह इन्द्रियों का विषय नहीं है।

भौतिक विज्ञान तो इन्द्रियों को जैसा दिखता है वैसा निर्णय करता है और वेदान्त तथा योगदर्शन यानी आध्यात्मिक विज्ञान तो इन्द्रियाँ जिससे देखती हैं वह मन, मन को जो सत्ता देता है वह चित्त और चित्त को जो चेतना देता है उसके तरफ विचारता है। भगवान कहते हैं- जल में रस मैं हूँ तो जल में रस आया कहाँ से? कैसे आया? परमात्मा से ही आया। रस कब आता है?जब भीतर रस होता है तब। अगर किसी की जिह्वा में सूखा रोग हो गया हो तो उसे रसगुल्ला आदि किसी भी पदार्थ का रस नहीं आयेगा। जिह्वा को रस कब आता है? जब वह अपने रस से रसीली होती है और जिह्वा का वह रस आता है जल में छुपे हुए अत्यंत सूक्ष्म रस के प्रभाव के ही कारण। इसीलिए भगवान कहते हैं- “जल में रस मैं हूँ।”

प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’ ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है? आँखों से हमें प्रकाश दिखता है तो वास्तव में हम प्रकाश को नहीं देखते किन्तु प्रकाश जिन वस्तुओं पर पड़ता है उन वस्तुओं को देखते हैं। प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता है तो रूपान्तरित होता है और वह रूपान्तरण हमें दिखता है, वास्तविक प्रकाश नहीं दिखता। सूर्य और चन्द्र का जो वास्तविक प्रकाश है वही आपका-हमारा वास्तविक प्रकाश है और श्रीकृष्ण इसी प्रकाश की ओर संकेत करते हुए कह रहे हैं कि ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’

प्रणवः सर्ववेदषु। ‘सब वेदों में ॐकार मैं हूँ।’ वेद का कोई अंत नहीं है। वेद यानी ज्ञान। ज्ञान का कोई अन्त नहीं होता और जिसका अंत हो जाये वह ज्ञान नहीं होता। वेद की चार संहिताएँ हैं 1121 या 1127 उपनिषद हैं। इन सब उपनिषदों का सार कठवल्ली है और कठवल्ली आदि सबका सार बीज रूप में ‘ॐ’ है। ‘अ’कार + ‘उ’कार + ‘म’कार = ॐकार।

कोई भी व्यंजन ‘अ’कार के बिना नहीं बोला जा सकता। यह ‘अ’कार सृष्टि का स्थूल (विश्व), ‘उ’ कार तेजस और ‘म’ कार प्राज्ञ एवं ॐ की अर्धमात्रा ‘ँ’ है वह है चैतन्य सूर्य का द्योतक।

अभी तो रशिया के वैज्ञानिक चकित हो गये कि कोई भी आदमी भीतर कोई  शब्द सोचे और बाहर दूसरा शब्द बोले तो दोनों अलग-अलग उनके कम्पयूटर में आ जाते हैं लेकिन’ॐ’कार एक विलक्षण शब्द है। भीतर अगर ‘ॐ’ कार एवं बाहर दूसरा शब्द हो या बाहर ‘ॐ’ कार और भीतर दूसरा कोई शब्द हो फिर भी दोनों जगह ‘ॐ’कार ही आ जाता है। यह ‘ॐ’कार शब्द अन्य सब शब्दों से बिल्कुल अलग पड़ता है और ऋषियों ने इसकी आकृति भी बिल्कुल निराली बना दी है।

ऐसा कोई भी मन्त्र नहीं है जिसमें ॐ का उपयोग न किया गया हो। जिसमें ॐ का उपयोग नहीं है वह बीजमन्त्र से रहित होता है। यह ॐकार सबका बीज है, सबका मूल है। नवजात शिशु जब रोता है तब उसकी ‘ऊँवां…ऊँवां…’ आवाज में ॐकार की ध्वनि ही होती है। मरीज भी बिस्तर पर कराहता है उसकी ॐऽऽऽऽऽ…ॐऽऽऽऽ आवाज में ॐकार की ही ध्वनि होती है। इससे सिद्ध होता है कि आपका जो चैतन्य आत्मा है उसकी वास्तविक ध्वनि ॐ है।

विभिन्न पद्धतियों से ॐकार के द्वारा अपनी साधना को संपन्न किया जा सकता है। आज्ञाचक्र पर अथवा नाभि केन्द्र पर ॐ की आकृति का ध्यान करके अथवा हृदय में उसकी भावना करते हुए ध्यान करके हम अपनी सुषुप्त शक्तियों को विकसित कर सकते हैं।

वैखरी वाणी द्वारा ॐ का उच्चारण करते हुए मध्यमा में पहुँच जाओ। मध्यमा से पश्यन्ती में जाओ और पश्यन्ती से अगर परा वाणी में पहुँच जाओ तो अत्यंत सूक्ष्म अवस्था को परम मौन को उपलब्ध हो सकते हो। वह परम मौन की जो अवस्था है उस अवस्था को पाये हुए व्यक्ति के आगे इस लोक का तो क्या, त्रिलोकी का राज्य भी तुच्छ हो जाता है।

भगवान शंकर ने भैरव विज्ञान में कहा हैः

”हे उमा ! इस ॐ को जो जानता है वह मेरे को जान लेता है। इस ॐ को जो समझ लेता है वह मुझे समझ लेता है। इस ॐ को जो पा लेता है वह मुझे पा लेता है।”

भगवान श्री कृष्ण आगे कहते हैं शब्दः खे। अर्थात् आकाश में शब्द मैं हूँ।

शब्द में बड़ी शक्ति है। शब्द का नाश नहीं होता। मैंने यहाँ शब्द कहे और रेडियो स्टेशन के यंत्र हों तो मेरे द्वारा यहाँ कहे गये शब्द हजारों मील दूर तक सुनायी पड़ते हैं। इस प्रकार शब्दों का नाश नहीं हुआ। वाणी से निकले हुए शब्द नष्ट नहीं होते वरन् आकाश में गूँजते रहते हैं। इसीलिए भगवान कहते हैं- शब्दः खे। आकाश में जो शब्द है वह मैं हूँ।

पौरूषं नृषु। भगवान कहते हैं कि पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ। पुरुष कौन है? जो पुरुषार्थ करे वह पुरुष। पुरुषार्थ क्या है? पुरुषस्य अर्थः इति पुरुषार्थः। जो परब्रह्म परमात्मा पुरुष है उसको पाने के लिए जो प्रयत्न है उसको पुरुषार्थ बोलते हैं। भगवान कहते हैं कि ऐसा पुरुषार्थ करने वालों पुरुषों में पौरूष मैं हूँ।

पुरुष वह है जो पुरुषार्थ करके ‘है’ उसको ठीक से समझ ले। जो सदा मौजूद है और जिसको पाने के बाद कुछ पाना नहीं, जिसको जानने के बाद कुछ जानना नहीं, जिसमें स्थिर रहने के बाद बड़े भारी दुःख भी चलित न कर सके ऐसे तत्त्व को पाना पुरुषार्थ है।

लोग समझते हैं कि जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए धन पाना पुरुषार्थ है। जिसके पास बाह्य पढ़ाई-लिखाई नहीं उसके लिए पढ़ाई-लिखाई पुरुषार्थ है। जिसके पास यश नहीं उसके लिए यश पाना पुरुषार्थ है। इस प्रकार जो नहीं है उसको लाना, उसको पाना पुरुषार्थ मान लिया जाता है। जगत की जितनी भी चीजे हैं वे पहले नहीं थीं, बाद में नहीं रहेंगी और अभी भी नहीं के तरफ जा रही हैं। जो नहीं की तरफ जा रही हैं उन नश्वर वस्तुओं, नश्वर सत्ता, नश्वर पद को पाने का जो यत्न करता है उसको तो शास्त्रीय भाषा में अज्ञानी कहते हैं और जो शाश्वत तत्त्व को जानकर निहाल होने को तत्पर है उसको बोलते हैं पुरुष। भगवान कहते हैं कि ऐसे पुरुषों का पुरुष्त्व मैं हूँ।

इस प्रकार गीता के सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि जल में रस, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश, संपूर्ण वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द एवं पुरुषों में पुरुष्तव मैं हूँ।

नौवें श्लोक में भगवान आगे कहते हैं-

पुण्यो गंधः पृथिव्यां च। ‘पृथ्वी में पवित्र गंध मैं हूँ।’

पृथ्वी में पवित्र गंध भी वह चैतन्य सत्ता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान ने पवित्र गंध कहा है। सुगंध नहीं कहा क्योंकि सुगन्ध पवित्र गंध हो यह जरूरी नहीं। कई ऐसी सुगंधें हैं जो कामवासना को भड़काती हैं। पेरिस आदि में इस प्रकार की खोज करके इत्र (परफ्यूम्स) बनाये जाते हैं। जिनसे मनुष्य की काम वासना उद्दीप्त हो, मनुष्य संसार के कीचड़ में फँसे। इसीलिए श्रीकृष्ण ने सुगन्ध नहीं, वरन् ‘पवित्र गंध’ कहा है।

तेजश्चास्मि विभावसौ। ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’ तेज रूप तन्मात्रा से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है। अग्नि में से अगर तेज निकाल दिया जाये तो अग्नि बचे ही नहीं। यहाँ भगवान कहते हैं कि ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’

जीवनं सर्वभूतेष।

संपूर्ण भूतों में जीवन मैं हूँ। प्राणी में उसको जिलाने वाली जो जीवनी-शक्ति है वह अगर न रहे तो वह प्राणी फिर प्राणी नहीं रहेगा। फिर तो वह केवल शव रह जायेगा। अतः समस्त प्राणियों में अपनी चेतना का अस्त्तित्व बताते हुए भगवान कहते हैं कि संपूर्ण भूतों में मैं उनका जीवन हूँ।

अंत में भगवान कहते हैं- तपश्चास्मि तपस्विषु। तपस्वियों में मैं तप हूँ। सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करने को तप कहते हैं। किन्तु वास्तविक तप तो है परमात्म-प्राप्ति में। चाहे कितनी भी विघ्न-बाधाएँ आयें, उनकी परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य में डटे रहना।

यही तपस्वियों का तप है और इसी से वे तपस्वी कहलाते हैं। इसी तप के लिए भगवान संकेत करते हुए कहते हैं कि तपस्वियों का तप मैं हूँ।

इस प्रकार उपरोक्त दोनों ही श्लोकों में भगवान कहते हैं कि जल में रस, सूर्य-चन्द्र में प्रभा, वेदों में प्रणव, आकाश में शब्द, पुरुषों में पुरुषत्व, पृथ्वी में गंध, अग्नि में तेज, संपूर्ण भूतों में उनका जीवन तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ। भगवान ने जिज्ञासुओं के लिए अपनी सर्वव्यापकता का बोध कराया है ताकि जिज्ञासु जहाँ-जहाँ नजर जाये, वहाँ भगवान की सत्ता मानकर अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने में कामयाब हो सके, वास्तविक कृष्ण तत्त्व का ज्ञान पा सके।

 

सतत चिन्तन।

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सतत चिन्तन।


एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते…..।

‘आपकी निरन्तर उपासना करता है और अव्यक्त अक्षर की उपासना करता है इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है?’

महाभारत में एक कथा आती है। रूक्मिणी ने किसी पर्व पर उत्सव किया। उत्सव में परिवार के एवं अन्य स्नेही, सम्बन्धी, मित्रादि लोगों की उपस्थिति आवश्यक होती है। श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरा प्यारा दोस्त अर्जुन नहीं आया है तो उसे बुलाने गये। उसके कक्ष में गये तो अर्जुन सो रहा है। श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उसके पास गये। मित्रभाव है, विनोद से अठखेलियाँ करके जगाना चाहा। जब बिल्कुल नजदीक गये तो अर्जुन के हर श्वास के साथ ‘कृष्ण…. कृष्ण….कृष्ण’ की ध्वनि सुनाई देने लगी।

यह है सतत चिन्तन। हमारा चिन्तन मन से ही न हो। मन सो जाय तो हमारे प्राण वह कार्य शुरु कर दें। जैसे, जगत का व्यवहार तीव्रता से करते हैं तो स्वप्न में भी वह चालू हो जाता है, वैसे जाग्रत अवस्था में इष्ट का चिन्तन इतनी लगन से, इतनी गहरे भाव से हो कि निद्रा के समय भी अन्तर्मन से वह चिन्तन होता है रहे, प्राणों में उसकी धारा बहती रहे।

रूक्मिणी ने देखा कि भगवान अर्जुन को बुलाने गये हैं, अर्जुन तो नहीं आया, भगवान भी वापस नहीं आये। उत्सव में आये हुए नारदजी के भेजा उन्हें बुलाने के लिए। नारदजी ने जाकर देखा तो अर्जुन सोया हुआ है और भगवान उसके पास बैठकर ध्यान से कुछ सुन रहे हैं। नारदजी को देखकर श्रीकृष्ण ने इशारे से कहा कि आवाज किये बिना यह अजपाजाप की ध्वनि सुनो।

‘वाह ! क्या चिन्तन है। श्वास-श्वास में श्रीकृष्ण की ध्वनि…!’ नारदजी चकित रह गये।

‘इसका मन शरीर के साथ जुड़ा है। शरीर सो गया है और मन खो गया है लेकिन इसका चिन्तन नहीं खोया है। नींद में भी चिन्तन चालू है। अर्जुन मेरा प्यारा है।’ श्री कृष्ण बोले।

‘जो आपका प्यारा है वह सारे विश्व का प्यारा है। उसके श्वास में चलती ‘कृष्ण… कृष्ण’ की ध्वनि के साथ मैं वीणा से ताल देता हूँ।’ नारद धीरे-धीरे वीणा के तार को झंकृत करने लगे और मस्त होने लगे। वे भूल ही गये कि मैं इन दोनों को बुलाने आया हूँ।

जहाँ सुख मिलता है वहाँ राग और द्वेष शांत हो जाते हैं। सुख के अभाव में ही राग-द्वेष सिर उठाते हैं। जहाँ परम सुख के द्वार खुले, आपको भीतर से आनंद आने लगा तो आपको प्यारे से प्यारे व्यक्ति से मिलने जाना होगा तो आप सोचेंगे कि अभी वह नहीं आया होगा। किसी के साथ शत्रुता हो, उसको सबक सिखाने का कार्यक्रम बनाया हो और आ गये सत्संग में, भीतर का सुख मिलने लगा तो वह कार्यक्रम मोकूफ रह जायेगा। इसीलिए युद्ध में जाते समय साधू, ब्राह्मण, संत, महात्मा का दर्शन अपशकुन माना जाता है क्योंकि संत-महात्मा ब्रह्मचिन्तन में लीन रहते हैं, अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं तो उनके दर्शन से, उनके ‘वायब्रेशन’ (स्पंदन) से आपके अंदर का द्वेष ठण्डा हो जायेगा। द्वेष ठण्डा हो गया तो आप तीव्रता से लड़ोगे नहीं और हार जाओगे। इसीलिए कहा गया है कि युद्ध के समय दर्शन करने मत जाना।

अर्जुन नींद में भी अपने आन्तरिक चिन्तन में मस्त है और श्रीकृष्ण उस आन्तरिक चिन्तन के चिन्तन में मग्न हैं। दोनों की मस्ती देखकर नारद भी वीणा का ताल देते हुए मग्न हो रहे हैं।

इधर रूक्मिणी ने सत्यभामा को भेजा कि देखो तो सही, अर्जुन को बुलाने भगवान गये और उनको बुलाने नारदजी गये ! कोई वापस नहीं आये ! तलाश करो क्या कर रहे हैं?

सत्यभामा ने जाकर वह मधुर दृश्य देखा तो वह मधुर स्वर से गाने लग गई। उसको गाते देखकर श्रीकृष्ण मस्त होकर नाचने लगे।

यह है सततयुक्त व्यक्ति के स्पंदनों का प्रभाव। जो केवल प्राणों से सततयुक्त होता है उसका इतना प्रभाव है तो जो स्वरूप से सततयुक्त हो गया है उसका कितना प्रभाव हो सकता है?

 

चालू खट-खट में अपना काम बना लो।

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आप श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं तो कीजिये, अल्लाह का चिन्तन करते हैं तो कीजिए, झूलेलाल का चिन्तन करते हैं तो कीजिये और यदि सदगुरु प्राप्त हैं, बुद्धि विकसित है, श्रद्धा है, पुण्य है तो चिन्तन कीजिये किः “शिवोऽहम्…. सच्चिदान्दोऽहम्… आनन्दस्वरूपोऽहम्….वाह वाह ! मैं गुरु होकर उपदेश दे रहा हूँ… शिष्य होकर सुन रहा हूँ…. सब मेरे ही रूप हैं। मैं श्रीकृष्ण होकर आया था, बुद्ध होकर आया था, महावीर होकर आया था। अनेक शरीर आ जायँ और मर जायँ, मिट जायँ, फिर भी मेरा नाश नहीं होता। क्योंकि अनन्त शरीरों में मैं ही हूँ…..ॐ….ॐ….ॐ….. आपके लिये यह मार्ग उत्तम हो सकता है।

आपके चिन्तन का सातत्य कहाँ है यह बात महत्त्व की है। चालू व्यवहार में भी वह अनुसंधान बना रहे तो मंजिल जल्दी तय हो जाती है।

स्वामी रामतीर्थ एक घटना सुनाया करते थे। ब्रिटिश सरकार के जमाने की बात है। एक सरकारी अमलदार घोड़े पर कहीं जा रहा था। रास्ते में घोड़े को प्यास लगी तो पास में कुएँ पर जहाँ अरट चल रहा था वहाँ पानी पिलाने गया। अरट चलने से आने वाली खट…. खट…. खट… खट…. आवाज सुनकर घोड़ा बिदक गया।। उसने पानी नहीं पीया। वह भी साहब का घोड़ा था, अहंकारी का घोड़ा था

आदमी जितना अहंकारी होता है उतना भीतर से डरपोक होता है, जितना विषयी होता है उतना ज्यादा भयभीत होता है।

मेरे पास एक महिला आयी और बोलीः

बापू ! मेरे पास हीरे-जवाहरात के गहनों के सात सेट हैं। हररोज अलग-अलग सेट पहनती हैं। एक सेट करीब लाख-डेढ़ लाख का होता होगा। और तो सब कुछ है लेकिन जीवन में शांति नहीं है, हृदय में सुख-चैन नहीं है।

इतने में कुछ आवाज आयी तो वह चौकन्नी हो गई, डर गई। मैंने पूछाः बहन ! इतना डरती क्यों है?”

बाबाजी ! मैं क्या बताऊँ? मुझे बहुत डर लगता है। क्या कारण है, पता नहीं। छिपकली को देखकर भी मेरी धड़कन बढ़ जाती है।

मैंने कई बार निरीक्षण किया है कि व्यक्ति का जीवन जितना विलासी होता है, धन-वैभव-संपत्ति से आक्रान्त होता है उतना वह भीतर से खोखला होता है, भयभीत होता है।

उस अमलदार ने किसान को हुक्म कियाः इस खट-खट आवाज को बन्द कर। किसान ने अरट चलाना बन्द कर दिया। खट-खट तो बन्द हो गई लेकिन साथ में पानी भी आना बन्द हो गया। अमलदार चिढ़कर बोलाः मैंने अरट की खट-खट आवाज बन्द करने को कहा था, पानी बन्द करने को नहीं कहा था।

साहब मेरे ! गुस्ताखी माफ हो। पहले खट-खट होगी, बाद में पानी निकलेगा। यदि आपके घोड़े को प्यास लगी हो तो चालू खट-खट में ही उसे पुचकारकर पानी पिला दो। चालू खट-खट में ही अपना काम बना लो।

हाँ, आप भी चालू खट-खट में अपना काम बना लो। चाहे साकार में या निराकार में, जिसमें आपकी प्रीति हो उसमें मन लगा दो। इस मिथ्या जगत के आकर्षणों से बचकर संसारसागर से पार हो जाओ।

कृष्ण लीला – पूनम व्रतधारी विशेष – ब्रह्मचर्य

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काली माँ  की उपासना करनेवाले  बहादुर गदाधर  ठाकूर  ने पत्नी शारदा को फिर जीवन भर भोग्या नही माना… ( शारदा जी के पैरों में उन को माँ  के चरणों के दर्शन हुए थे इसलिए गदाधर ठाकुर अर्थात रामकृष्ण परमहंस..) ब्रम्हचर्य  व्रत पालते पालते कई ब्रम्हचारी फिसल जाते…लेकिन स्री  साथ में पत्नी रूप में आई और ब्रम्हचर्य   पालन जीवन भर किया…कैसी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था है!..की आप के भाव को बादलो…

विदेश में फ्राइड नाम के मनो वैज्ञानिक  के सिद्धांत  से गुमराह हो गये है लोग…पुत्री पिता की तरफ और पुत्र माता की तरफ काम विकार से आकर्षित होते है ऐसा उस का सिद्धांत  था…लेकिन ये फ्राइड के खुद के जीवन में हुआ होगा, ऐसा सब के जीवन में नही होता..ये उस ने अपने उग्रवादी वमन से जो लिखा है उस से सारा पाश्चात्य  जगत तबाह हो गया… ‘सम्भोग  से समाधि’ का भाषण करने वाला अपना भारत का विद्वान भी फ्राइड का मनोविज्ञान  पढ़ता था… 
भारतीय संस्कृति में ऐसा नही है…दुल्हन के वस्त्र  पहेन  के पुत्री जब ससुराल जाती है सजी धजी तब पिता के गले लगती है…क्या बेटी में पिता के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा उस समय?….अथवा पिता का पुत्री के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा पुत्री के प्रति?…..नही नही..ये तो मेरी लाडली पुत्री है..ये मेरे पिता है जिन्हों ने मुझे जनम दिया,पाल पोस  कर बड़ा किया,सुंदर संस्कार दिए…कितने कितने सुंदर भाव होते है पिता और पुत्री के एकदुसरे के प्रति.. ‘भावग्राही  जनार्दन!’ …आप जैसा भाव करते वो  जनार्दन हरि  आप को उसी में मदद करते है…भाव का महत्व है…
अभी भी आप आसपड़ोस को माईयों को विकारी नज़र से देखो तो आप को स्वपनदोष हो सकता है..
गदाधर ठाकुर अपनी विवाहिता विधिवत की पत्नी में  माँ का दृढ़ भाव किए तो जीवन भर ब्रम्हचर्य पालन में सफल हुए..कितनी उँचाई है!..आप के अंतरात्मा में कितना सामर्थ्य है!…कोई बात दृढ़ता  से ठान  लेते है तो मनोयोग से हो जाता है…
जो पूनम व्रत करते तो आपदाओं से और दुर्गति से उन की रक्षा होती है..ये तो आप ने बाद में सुना है…
श्रध्दा  पूर्वा सर्व धर्मा फल प्रदा: l
श्रध्दा सभी धर्मों के पूर्व में होती है और मनोरथों को पूर्ण करने वाली फल दायिनी  वो माता श्रध्दा है…वेदों में ‘श्रध्दा सूक्त’ है , उस की अपनी महिमा है….श्रध्दा से सब कुछ  आसान हो जाता है …
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