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एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य

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एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य

तपः सु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः।

एकाग्र मन में अदभुत सामर्थ्य होता है। मन अगर चंचल है विक्षिप्त है तो मनुष्य को दुःखों की गर्त में खींच ले जाता है। चंचल मन में आने वाले विचारों के मुताबिक, इच्छाओं के मुताबिक आदमी सब कार्य करता जाय बिना सोचे-समझे, बिना विवेक किये, तो मन पदार्थों की गुलामी में आदमी को दीन-हीन बना देता है।

चंचल मन कमजोर होता है। कमजोर मन अधिक सुरक्षाएँ ढूँढता है। मन जितना कमजोर, सुरक्षा की आवश्यकता उतनी ज्यादा। अपने को बुद्धिमान् मानने वाले बड़े-बड़े लोग मन की चंचलता में आकर कमजोर हो जाते हैं। अपने सुख की सुरक्षा के लिए पूरी अक्ल-होशियारी भौतिक चीजों को इकट्ठी करने में लगा देते हैं। फिर उन चीजों को, धन-सम्पत्ति को अधिक सुरक्षित करने के लिए देश छोड़कर विदेश में ले जाते हैं। वे जब पकड़े जाते हैं तो अति दीनता को प्राप्त होते हैं अथवा तो मृत्यु के समय वही संपत्ति की चिन्ता उनको प्रेत बनाकर भटकाती है।

मन भौतिक चीजों का आश्रय जितना अधिक लेता है उतना भीतर से खोखला हो जाता है। मन भीतर से जितना खोखला होता है उतनी अधिक सुरक्षा चाहता है। जितनी अधिक सुरक्षा चाहता है उतना अधिक झपेटा जाता है। यह सनातन सत्य है।

माउन्ट आबू में हम नलगुफा में रहते थे। उसके पीछे पाण्डव गुफा है। वहाँ के एक पुराने साधू ने मुझे बताया कि झरने के पास रात्रि को शेर आता है। अभी कुछ दिन पहले आया था और एक बन्दर को पकड़कर खा गया।

शेर ने बन्दर को कैसे पकड़ा? बन्दर तो वृक्ष की ऊँची डालियों पर होते हैं। शेर वहाँ पहुँच नहीं सकता। वह बन्दर को कैसे पकड़ता है?

शेर पहले आकर जोर से दहाड़ता है। यह सुनकर बन्दर घबड़ा जाते हैं। उनकी टट्टी-पेशाब छूट जाती है। शेर जब दूसरी बार दहाड़ता है तो बन्दर के लिए पेड़ पर इधर-उधर भाग-दौड़ करते हैं, चिल्लाते हैं, हताश हो जाते हैं, बुद्धि व दृष्टि ठीक से काम नहीं देती। भय के मारे सन्तुलन खो बैठते हैं और वृक्ष से गिर पड़ते हैं, शेर के शिकार बन जाते हैं।

जंगल में दूसरे प्राणी भी छिपकर बैठे होते हैं। शेर की दहाड़ सुनकर जब वे सुरक्षा के लिए भाग-दौड़ करते हैं, कोई दूसरा स्थान खोजने के लिए बाहर निकल कर भागते हैं तो शेर की झपट में आ जाते हैं। बिल्ली भी रात्रि को डरावनी आवाज करती है तो चूहे डर के मारे भाग-दौड़ करते हैं और झपेटे जाते हैं।

मन पदार्थों के साथ, प्रतिष्ठा के साथ, देहाभिमान के साथ जुड़ जाता है तो भीतर से खोखला हो जाता है। खोखला मन बाह्य साधनों में सुरक्षा खोजता है। फलतः व्यक्ति मनोबल खो बैठता है। मन एकाग्र होता है तो वह भीतर से अपने को बलवान महसूस करता है एकाग्रता के तप के आगे बाहर का धन, बाहर की सत्ता, बाहर की सुरक्षा कोई मूल्य नहीं रखती।

एकाग्र मन स्वयं प्रसन्न रहता है, बुद्धि का विकास होता है, जीवन भीतर से परितृप्त और जीने योग्य होता है। व्यक्ति का मन जितना एकाग्र होता है, समाज पर उसकी वाणी का, उसके हाव भाव का, उसके क्रिया-कलापों का उतना ही गहरा प्रभाव पड़ता है। उसका जीवन चमक उठता है।

एकाग्रतारूपी खजाना प्राप्त करने के कई तरीके हैं। उन सबमें त्राटक भी एक तरीका है। त्राटक के कुछ प्रयोग यहाँ जानेंगे। आप हिमालय में जाकर साधना नहीं कर सकते, आश्रम में सदा रहकर भी आप अभ्यास नहीं कर सकते लेकिन ये प्रयोग अपने घर में ही करके लाभ उठा सकते हैं।

अपने ध्यान-भजन-साधना के कमरे में ॐ अथवा स्वस्तिक का एक चित्र बना लो। भूमि पर बिछे हुए आसन पर आप बैठें तो वह चित्र आपकी आँखों के ठीक सामने रहे इस प्रकार तीन-चार फीट दूर रख दो। चित्र आँखों के ठीक सामने हो, न ऊँचा हो न नीचा हो।

त्राटक का अभ्यास करने के लिए हररोज एक निश्चित समय पर एक ही जगह बैठने से अधिक लाभ होगा। चित्र के सामने आसन पर स्वस्थ होकर सीधे बैठ जाओ। आँखें खुली रखकर उस चित्र को अपलक नेत्रों से देखते रहो। दृष्टि को एक ही बिन्दु पर एकाग्र कर दो। आँखों की पलकें गिरें नहीं। दृष्टि एकटक रहे, शरीर अडोल रहे।

प्रारम्भ में जरा कठिन लगेगा। थकान लगेगी, उबान आयेगी, आँखों की पलकें गिरने लगेंगी फिर भी दृढ़ होकर अभ्यास जारी रखो। जब तक आँखों से पानी न टपके तब तक उस चित्र को एकटक निहारते रहो… निहारते रहो… पाँच मिनट… सात मिनट… दस मिनट…. पंद्रह मिनट… अभ्यास बढ़ाते जाओ। जितना आगे बढ़ोगे उतना अधिक लाभ होगा। इस प्रयोग में कोई खतरा नहीं, कोई हानि नहीं।

अपने कमरे में घी का दीया जला दो। मोमबत्ती भी चल सकती है। यदि घी का दीया हो तो अच्छा है। उसको थोड़ी दूर रखकर उसकी लौ को एकटक, अपलक नेत्रों से देखते रहो। शरीर सीधा व अडोल रहे। आँखों की पलकें न गिरें। आँखों से पानी टपके तब तक देखते रहो…. निहारते रहो। आपके मन की एकाग्रता बढ़ती जायेगी।

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रक्षक भी भक्षक बन सकता है।

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रक्षक भी भक्षक बन सकता है।

भगत जगत को ठगत है जगत को ठगत न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।

सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों का खजाना क्यों लूटें ? नहीं…। नहीं….। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।

एकनाथ जी कहते हैं- “भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।”

“नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?”

कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।

उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।

एकनाथ जी ने कहाः “देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?”

“नहीं महाराज ! “गोदावरी माता की जय….’ करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय…. बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।”

चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः “अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?…. और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !

साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।”

कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।

जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं।

 

हरि तुमसे दूर नहीं ….

 

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हरि तुमसे दूर नहीं ….

सौ छोटे-छोटे पातक एक महापातक बनता है। सौ छोटे-छोटे पुण्य एक महा पुण्य बनता है। जब पुण्य का सिलसिला चलता है तब जीव सुखी रहता है। इस समय पाप करता है तो भी उसको धन-संपत्ति, सुख सुविधाएँ मिलती रहती हैं क्योंकि अभी पुण्यकाल का प्रकरण चल रहा है। जब प्रारब्ध का पाप प्रकरण चलता है तब अच्छा काम करते हुए भी व्यक्ति के जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता।

ऐसे समय में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। अपना जप-तप-ध्यान-अनुष्ठान-आत्म-विचार प्रतिदिन चालू रखना चाहिए। कल्मष कटते जाएंगे, अन्तःकरण पावन होता जाएगा. महापातक दूर होते जाएँगे तब जप, ध्यान, कीर्तन आदि का पूरा लाभ दिखेगा। तुलसीदास जी कहते हैं-

तुलसी  जाके मुखनते धोखे निकसे राम।

ताके पग की पगतरी मोरे तन को चाम।।

धोखे से भी जिसके मुख से भगवान का नाम निकलता है वह आदमी भी आदर के योग्य है। जो प्रेम से भगवान का चिन्तन, ध्यान करता है, भगवतत्त्व का विचार करता है उसके आदर का तो कहना ही क्या ? उसके साधन-भजन को अगर सत्संग का संपुट मिल जाय तो वह जरूर हरिद्वार पहुँच सकता है। हरिद्वार यानी हरि का द्वार। वह गंगा किनारे वाला हरि द्वार नहीं, जहाँ से तुम चलते हो वहीं हरि का द्वार हो। संसार में घूम फिरकर जब ठीक से अपने आप में गोता लगाओगे, आत्म-स्वरूप में गति करोगे तब पता चलोगे कि हरिद्वार तुमसे दूर नहीं, हरि तुमसे दूर नहीं और तुम हरि से दूर नहीं।

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था।

आता न था नजर तो नजर का कसूर था।।

अज्ञान की नजर हटती है। ज्ञान की नजर निखरते निखरते जीव ब्रह्ममय  हो जाता है। जीवो ब्रह्मैव नापरः। यह अनुभव हो जाता है।

 

आध्यात्मिक धन की भिक्षा

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आध्यात्मिक धन की भिक्षा

रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान गये हुए थे। दस दिन तक हररोज शाम को 6 से 7 बजे तक उनकी गीताँजली पर प्रवचनों का कार्यक्रम था। लोग आकर बैठते थे। उनमें एक बूढ़ा भी आता था। वह बड़े प्यार से, अहोभाव से गुलाब की माला महर्षि के गले में पहनाता था। प्रतिदिन सभा के लोग आये उससे पहले आता था और कथा पूरी हो जाये, टैगोर खड़े हो जायें बाद में उठता था – ऐसा शील, शिष्टाचार उसके जीवन में था। जैसे एक निपुण जिज्ञासु अपने गुरुदेव के प्रति निहारे ऐसे वह टैगोर की तरफ निहार कर एक-एक शब्द आत्मसात करता था। साधारण कपड़ों में वह बूढ़ा टैगोर के वचनों से बड़ा लाभान्वित हो रहा था। सभा के लोगों को ख्याल भी नहीं आता था कि कौन कितना खजाना लिये जा रहा है।

एक घण्टे के बाद रवीन्द्रनाथ जब कथा पूरी करते तो सब लोग धन्यवाद देने के लिए, कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए नजदीक आकर उनके पैर छूते।

जो लोग फैशनेबल होकर कथा के चार शब्द सुनकर रवाना हो जाते हैं उनको पता ही नहीं कि वे अपने जीवन का कितना अनादर करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि ऋषि के चरणों में रहकर सेवा सुश्रुषा की है। श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ मुनि के चरणों में इस आत्मविद्या के लिए अपने बहुमूल्य समय और बहुमूल्य पदार्थों को न्योछावर कर दिया।

टैगोर के चरणों में वह बूढ़ा प्रतिदिन नमस्कार करता। कथा की पूर्णाहुति हुई तो लोगों ने मंच पर सुवर्ण मुद्राएँ, येन (वहाँ के रूपये), फूल, फल आदि के ढेर कर दिए। वह बूढ़ा भी आया और बोलाः

“मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कल आप मेरे घर पधारने की कृपा करें।”

बूढ़े के विनय-संपन्न आचरण से महर्षि प्रसन्न थे। उन्होंने भावपूर्ण निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। बूढ़े ने कहाः “आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है इसलिए मैं बहुत आभारी हूँ। खूब प्रसन्न हूँ…।” आँखों में हर्ष के आँसू छलकाते हुए वह विदा हुआ।

महर्षि ने अपने रहस्यमंत्री से कहाः “देखना ! वह बूढ़ा बड़ा भावनाशील है। मेरे प्रति उसकी गहरी श्रद्धा है। हमारे स्वागत की तैयारी में वह कहीं ज्यादा खर्च न कर बैठे। बाद में आर्थिक बोझा उसको कष्ट देगा। दो सौ येन उसके बच्चों को दे देना। कल चार बजे हम उसके घर चलेंगे।”

दूसरे दिन पौने चार बजे उस बूढ़े ने रोल्स रोयस गाड़ी लाकर खड़ी कर दी। गुलाब के फूलों से सजी हुई भव्य गाड़ी देखकर रवीन्द्रनाथ ने सोचा किः “किराये पर गाड़ी लाया होगा। कितना खर्च किया होगा !”

महर्षि गाड़ी में बैठे। रोल्स रोयस गाड़ी उठी। बिना आवाज के झूमती आगे बढ़ी। एक ऊँची पहाड़ी पर विशाल महल के गेट पर पहुँची। चपरासी ने सलाम मारते हुए गेट खोला। गाड़ी भीतर प्रविष्ट हुई। महल में से कई भद्र पुरुष, महिलाएँ, लड़के, लड़कियाँ आकर टैगोर का अभिवादन करने लगे। वे उन्हें भीतर ले गये। सोने की कुर्सी पर रेशमी वस्त्र बिछा हुआ था वहाँ बिठाया। सोने-चाँदी की दो सौ प्लेटों में भिन्न-भिन्न प्रकार के मेवे-मिठाई परोसे गये। परिवार के लोगों ने आदर से उनका पूजन किया और चरणों में बैठे।

रवीन्द्रनाथ चकित हो गये। बूढ़े से बोलेः “आखिर तुम मुझे कहाँ ले आये? अपने घर ले चलो न? इन महलों से मुझे क्या लेना देना?”

सादे कपड़ों वाले उस बूढ़े ने कहाः “महाराज ! यह मकान मेरा है। हम जो रोल्स रोयस गाड़ी में आये वह भी मेरी है और ऐसी दूसरी पाँच गाड़ियाँ हैं। ऐसी सोने की दो कुर्सियाँ भी हैं। ये लोग जो आपको प्रणाम कर रहे हैं वे मेरे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र हैं। यह मेरे बेटों की माँ है। ये चार उसकी बहुएँ है। स्वामी जी मेरी दो मिलें हैं।”

“ओहो ! तो तुम इतने धनाढय हो फिर भी ऐसे सादे, गरीबों के जैसे कपड़ों में वहाँ आकर बैठते थे !”

“महाराज ! मैं समझता हूँ कि यह बाहर का सिंगार और बाहर का धन कोई वास्तविक धन नहीं है। जिस धन से आत्मधन न मिले उस धन का गर्व करना बेवकूफी है। वह धन कब चला जाये कोई पता नहीं। परलोक में इसका कोई उपयोग नहीं इसलिए इस धन का गर्व करके कथा में आकर बैठना कितनी नासमझी है? और इस धन को सँभालते-सँभालते जो सँभालने योग्य है उसको न सँभालना कितनी नादानी है?

महाराज ! ज्ञान के धन के आगे, भक्ति के धन के आगे यह मेरा धन क्या मूल्य रखता है? यह तो मुझसे मजदूरी करवाता है, लेकिन जब से आपके चरणों में बैठा हूँ और आपने जो आत्मधन दिया है वह धन तो मुझे सँभालता है। बाह्य धन मुझसे अपने को सँभलवाता है। सच्चा धन तो आत्मधन है जो मेरा रक्षण करता है। मैं सचमुच कृतज्ञ हूँ सदा के लिए आपका खूब आभारी रहूँगा। जीवनभर बाह्य धन को कमाने और सँभालने में मैंने अपने को नोंच डाला फिर भी जो सुख व शान्ति नहीं मिली वह आपके एक-एक घण्टे से मुझे मिलती गई। बाहर के वस्त्रालंकार को तुच्छ समझे और सादे कपड़े पहनकर, फ

टे चीथड़े पहनकर, कंगाल की भाँति आपके द्वारा पर भिखारी होकर बैठा और आध्यात्मिक धन की भिक्षा मैंने पाई है। हे दाता ! मैं धन्य हूँ।”

रवीन्द्रनाथ टैगोर का चित्त प्रसन्न हो गया।

जहाँ ज्ञान का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है। जहाँ ब्रह्मविद्या का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है, लक्ष्मी सुखदायी बनती है और स्थिर रहती है।

महर्षि बोलेः “सेठ ! बाह्य धन में ममता नहीं और भीतरी धन का आदर है इसलिए तुम वास्तव में सेठ हो। मैं भी आज धन्य हुआ। तुम्हारे जैसे भक्त के घर आकर मुझे महसूस हुआ कि मेरा कथा-प्रवचन करना सार्थक हुआ।

कई जगह जाते हैं तो लोग माँगते हैं। ‘यह खपे…. वह खपे….’ करके अपने को भी खपा देते हैं और हमारा समय भी खपा देते हैं। लेकिन तुम बुद्धिमान हो। नश्वर धन की माँग नहीं फिर भी दाता तुम्हें नश्वर धन दिये जा रहा है और शाश्वत धन की तुम्हारी प्यास भी बुझाने के लिए मुझे यहाँ भेज दिया होगा।”

धन वैभव होते हुए भी उसमें आस्था या आसक्ति न करे लेकिन जिससे सारा ब्रह्माण्ड और विश्व है उस विश्वेश्वर के वचन सुनकर, संत-महात्मा के चरणों में बैठकर, अपने अहं को गलाकर आत्मा के अनुभव में अपना जीवन धन्य कर ले, वही सच्चा धनवान है।

हे मानव ! तुझमें अपूर्व शक्ति, सौन्दर्य, प्रेम, आनन्द, साहस छुपा है। घृणा, उद्वेग, ईर्ष्या, द्वेष और तुच्छ वासनाओं से तेरी महत्ता का ह्रास होता जा रहा है। सावधान हो भैया ! कमर कस। अपनी संकीर्णता और अहंकार को मिटाता जा। अपने दैवी स्वभाव, शक्ति, उल्लास, आनन्द, प्रेम और चित्त के प्रसाद को पाता जा।

यह पक्की गाँठ बाँध लो कि जो कुछ हो रहा है, चाहे अभी तुम्हारी समझ में न आवे और बुद्धि स्वीकार न करे तो भी परमात्मा का वह मंगलमय विधान है। वह तुम्हारे मंगल के लिए ही सब करता है। परम मंगल करने वाले परमात्मा को बार-बार धन्यवाद देते जाओ…. प्यार करते जाओ… और अपनी जीवन-नैया जीवनदाता की ओर बढ़ाते जाओ।

ऐसा कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति नहीं  जो तुम्हारी आत्मशक्ति के अनुसार बदलने में राजी न हो। परंतु अपने भीतर का यह आत्मबल, यह संकल्पबल विकसित करने की युक्ति किसी सच्चे महापुरुष से सीखने को मिल जाये और उसका विधिवत् अनुष्ठान करे तो, नर अपने नारायण स्वभाव में इसी जन्म में जाग सकता है।

 

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