Blog Archives

जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

 

asaramji
जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

जिनकी दृष्टि मात्र से जीव आनन्द को प्राप्त होता है, जिसकी महिमा गाते शास्त्र थकते नहीं, युद्ध के मैदान में न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण जिस ज्ञान की श्रेष्ठता व पवित्रता बताते हैं उस ज्ञान को प्राप्त किये हुए आत्मवेत्ता जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन करने की कई दिनों की इच्छा पूर्ण हुई। सुना था कि ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष श्री रमण महर्षि के सान्निध्य में बैठने मात्र से हृदय शान्ति व आनन्द का अनुभव करता है। आज वह सुअवसर प्राप्त हो गया।

भक्त-मण्डल महर्षि को प्रणाम करके बैठा। किसी ने श्रीकृष्ण की आराधना की थी तो किसी ने अम्बाजी की, किसी ने रामजी को रिझाने के प्रयास किये थे तो किसी ने सूर्यनारायण को अर्घ्य दिये थे किसी ने व्रत किये थे तो किसी ने फलाहार से वर्ष बिताए थे। किसी ने दो देव बदले थे तो किसी ने तीन, चार या पाँच देव बदले थे।

जब तक ज्ञानवान, आत्मारामी, प्रबुद्ध महापुरुष के चरणों में जाकर साधना का मार्ग सुनिश्चित नहीं होता तब तक मनमानी साधना जमती नहीं। हृदय की गहराई में आशंका बनी रहती है कि साधना पूर्ण होगी कि नहीं, फलदायी बनेगी कि नहीं। गहराई में यह संदेह विद्यमान हो तो ऊपर-ऊपर से कितने ही व्रत नियम करो, कितनी ही साधना करो, शरीर को कष्ट दो लेकिन पूर्णरूपेण लाभ नहीं होता। अचेतन मन में सन्देह बना ही रहता है। यही हम लोगों के लिए बड़े में बड़ा विघ्न है।

योगवाशिष्ठ महारामायण में आया है कि शमवान पुरुष के सर्व सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, उसके चित्त में शोक के प्रसंग में शोक नहीं होता, हर्ष के प्रसंग में हर्ष नहीं होता, भय के प्रसंग में भयभीत दिखता हुआ भी भयभीत नहीं होता, रूदन के प्रसंग में रोता हुआ दिखता है फिर भी नहीं रोता है, सुख के प्रसंग में सुखी दिखता है फिर भी सुखी नहीं होता।

जो सुखी होता है वह दुःखी भी होता है। जितना अधिक सुखी होता है उतना अधिक दुःख के आघात सहता है। मान के दो शब्दों से जितना अधिक खुश होता है उतना अधिक अपमान के प्रसंग में व्यग्र होता है। धन की प्राप्ति से जितना अधिक हर्ष होता है, धन चले जाने से उतना अधिक शोक होता है। चित्त जितना तुच्छ, हल्का और अज्ञान से आक्रान्त होता है उतना ही छोटी-छोटी बातों से क्षोभित होता है। चित्त जब बाधित हो जाता है तब क्षोभित होता हुआ दिखे उसको क्षोभ स्पर्श नहीं कर सकता। अष्टावक्र मुनि ने राजा जनक को कहाः

धीरो न द्वेष्टि ससारं आत्मानं न दिदृक्षति।

हर्षाभर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति।।

“हर्ष और द्वेष से रहित ज्ञानी संसार के प्रति न द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है। वह न मरा हुआ है और न जीता है।”

(अष्टावक्र गीताः 83)

जो धीर पुरुष हैं, शम को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने जीवन के परम लक्ष्य को सिद्ध कर लिया, परमात्म-दर्शन कर लिया, ब्रह्मा-विष्णु-महेश समन्वित विश्व के तमाम देवों की मुलाकात कर ली, जो अपने स्वरूप में परिनिष्ठित हो गये वे ही कृतकृत्य हैं। शास्त्रों में उन्हीं को धीर कहा है।

जो क्षुधा-तृषा, सर्दी-गर्मी सहन करते हैं उनमें तो धैर्य तो है लेकिन वे तपस्वी हैं। वे व्यावहारिक धैर्यवान हैं। शास्त्र किनको धैर्यवान कहते हैं? अष्टावक्र मुनि कहते हैं- धीरो न द्वेष्टि संसारम्…. संसार की किसी भी परिस्थिति में उद्विग्न नहीं होता, उसे द्वेष नहीं होता। आत्मानं न दिदृक्षति। आत्मा-परमात्मा का दर्शन करने की, उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। संसार की प्राप्ति तो नहीं चाहता, इतना ही नहीं प्रभु को प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रही। क्योंकि अपना आत्मा ही प्रभु के रूप में प्रत्यक्ष हो गया है। फिर प्राप्त करना कहाँ बाकी रहा? जैसे, मेरे को आसारामजी महाराज के दर्शन करने की इच्छा नहीं। अगर मैं इच्छा करूँ तो मेरी इच्छा फलेगी क्या? मैं जानता हूँ कि आसारामजी महाराज कौन हैं।

जिसने अपने-आत्मस्वरूप को जान लिया, परमात्म-स्वरूप को जान लिया उसको परमात्म-प्राप्ति की इच्छा नहीं रहती।

आध्यात्मिक धन की भिक्षा

asaramji
आध्यात्मिक धन की भिक्षा

रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान गये हुए थे। दस दिन तक हररोज शाम को 6 से 7 बजे तक उनकी गीताँजली पर प्रवचनों का कार्यक्रम था। लोग आकर बैठते थे। उनमें एक बूढ़ा भी आता था। वह बड़े प्यार से, अहोभाव से गुलाब की माला महर्षि के गले में पहनाता था। प्रतिदिन सभा के लोग आये उससे पहले आता था और कथा पूरी हो जाये, टैगोर खड़े हो जायें बाद में उठता था – ऐसा शील, शिष्टाचार उसके जीवन में था। जैसे एक निपुण जिज्ञासु अपने गुरुदेव के प्रति निहारे ऐसे वह टैगोर की तरफ निहार कर एक-एक शब्द आत्मसात करता था। साधारण कपड़ों में वह बूढ़ा टैगोर के वचनों से बड़ा लाभान्वित हो रहा था। सभा के लोगों को ख्याल भी नहीं आता था कि कौन कितना खजाना लिये जा रहा है।

एक घण्टे के बाद रवीन्द्रनाथ जब कथा पूरी करते तो सब लोग धन्यवाद देने के लिए, कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए नजदीक आकर उनके पैर छूते।

जो लोग फैशनेबल होकर कथा के चार शब्द सुनकर रवाना हो जाते हैं उनको पता ही नहीं कि वे अपने जीवन का कितना अनादर करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि ऋषि के चरणों में रहकर सेवा सुश्रुषा की है। श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ मुनि के चरणों में इस आत्मविद्या के लिए अपने बहुमूल्य समय और बहुमूल्य पदार्थों को न्योछावर कर दिया।

टैगोर के चरणों में वह बूढ़ा प्रतिदिन नमस्कार करता। कथा की पूर्णाहुति हुई तो लोगों ने मंच पर सुवर्ण मुद्राएँ, येन (वहाँ के रूपये), फूल, फल आदि के ढेर कर दिए। वह बूढ़ा भी आया और बोलाः

“मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कल आप मेरे घर पधारने की कृपा करें।”

बूढ़े के विनय-संपन्न आचरण से महर्षि प्रसन्न थे। उन्होंने भावपूर्ण निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। बूढ़े ने कहाः “आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है इसलिए मैं बहुत आभारी हूँ। खूब प्रसन्न हूँ…।” आँखों में हर्ष के आँसू छलकाते हुए वह विदा हुआ।

महर्षि ने अपने रहस्यमंत्री से कहाः “देखना ! वह बूढ़ा बड़ा भावनाशील है। मेरे प्रति उसकी गहरी श्रद्धा है। हमारे स्वागत की तैयारी में वह कहीं ज्यादा खर्च न कर बैठे। बाद में आर्थिक बोझा उसको कष्ट देगा। दो सौ येन उसके बच्चों को दे देना। कल चार बजे हम उसके घर चलेंगे।”

दूसरे दिन पौने चार बजे उस बूढ़े ने रोल्स रोयस गाड़ी लाकर खड़ी कर दी। गुलाब के फूलों से सजी हुई भव्य गाड़ी देखकर रवीन्द्रनाथ ने सोचा किः “किराये पर गाड़ी लाया होगा। कितना खर्च किया होगा !”

महर्षि गाड़ी में बैठे। रोल्स रोयस गाड़ी उठी। बिना आवाज के झूमती आगे बढ़ी। एक ऊँची पहाड़ी पर विशाल महल के गेट पर पहुँची। चपरासी ने सलाम मारते हुए गेट खोला। गाड़ी भीतर प्रविष्ट हुई। महल में से कई भद्र पुरुष, महिलाएँ, लड़के, लड़कियाँ आकर टैगोर का अभिवादन करने लगे। वे उन्हें भीतर ले गये। सोने की कुर्सी पर रेशमी वस्त्र बिछा हुआ था वहाँ बिठाया। सोने-चाँदी की दो सौ प्लेटों में भिन्न-भिन्न प्रकार के मेवे-मिठाई परोसे गये। परिवार के लोगों ने आदर से उनका पूजन किया और चरणों में बैठे।

रवीन्द्रनाथ चकित हो गये। बूढ़े से बोलेः “आखिर तुम मुझे कहाँ ले आये? अपने घर ले चलो न? इन महलों से मुझे क्या लेना देना?”

सादे कपड़ों वाले उस बूढ़े ने कहाः “महाराज ! यह मकान मेरा है। हम जो रोल्स रोयस गाड़ी में आये वह भी मेरी है और ऐसी दूसरी पाँच गाड़ियाँ हैं। ऐसी सोने की दो कुर्सियाँ भी हैं। ये लोग जो आपको प्रणाम कर रहे हैं वे मेरे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र हैं। यह मेरे बेटों की माँ है। ये चार उसकी बहुएँ है। स्वामी जी मेरी दो मिलें हैं।”

“ओहो ! तो तुम इतने धनाढय हो फिर भी ऐसे सादे, गरीबों के जैसे कपड़ों में वहाँ आकर बैठते थे !”

“महाराज ! मैं समझता हूँ कि यह बाहर का सिंगार और बाहर का धन कोई वास्तविक धन नहीं है। जिस धन से आत्मधन न मिले उस धन का गर्व करना बेवकूफी है। वह धन कब चला जाये कोई पता नहीं। परलोक में इसका कोई उपयोग नहीं इसलिए इस धन का गर्व करके कथा में आकर बैठना कितनी नासमझी है? और इस धन को सँभालते-सँभालते जो सँभालने योग्य है उसको न सँभालना कितनी नादानी है?

महाराज ! ज्ञान के धन के आगे, भक्ति के धन के आगे यह मेरा धन क्या मूल्य रखता है? यह तो मुझसे मजदूरी करवाता है, लेकिन जब से आपके चरणों में बैठा हूँ और आपने जो आत्मधन दिया है वह धन तो मुझे सँभालता है। बाह्य धन मुझसे अपने को सँभलवाता है। सच्चा धन तो आत्मधन है जो मेरा रक्षण करता है। मैं सचमुच कृतज्ञ हूँ सदा के लिए आपका खूब आभारी रहूँगा। जीवनभर बाह्य धन को कमाने और सँभालने में मैंने अपने को नोंच डाला फिर भी जो सुख व शान्ति नहीं मिली वह आपके एक-एक घण्टे से मुझे मिलती गई। बाहर के वस्त्रालंकार को तुच्छ समझे और सादे कपड़े पहनकर, फ

टे चीथड़े पहनकर, कंगाल की भाँति आपके द्वारा पर भिखारी होकर बैठा और आध्यात्मिक धन की भिक्षा मैंने पाई है। हे दाता ! मैं धन्य हूँ।”

रवीन्द्रनाथ टैगोर का चित्त प्रसन्न हो गया।

जहाँ ज्ञान का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है। जहाँ ब्रह्मविद्या का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है, लक्ष्मी सुखदायी बनती है और स्थिर रहती है।

महर्षि बोलेः “सेठ ! बाह्य धन में ममता नहीं और भीतरी धन का आदर है इसलिए तुम वास्तव में सेठ हो। मैं भी आज धन्य हुआ। तुम्हारे जैसे भक्त के घर आकर मुझे महसूस हुआ कि मेरा कथा-प्रवचन करना सार्थक हुआ।

कई जगह जाते हैं तो लोग माँगते हैं। ‘यह खपे…. वह खपे….’ करके अपने को भी खपा देते हैं और हमारा समय भी खपा देते हैं। लेकिन तुम बुद्धिमान हो। नश्वर धन की माँग नहीं फिर भी दाता तुम्हें नश्वर धन दिये जा रहा है और शाश्वत धन की तुम्हारी प्यास भी बुझाने के लिए मुझे यहाँ भेज दिया होगा।”

धन वैभव होते हुए भी उसमें आस्था या आसक्ति न करे लेकिन जिससे सारा ब्रह्माण्ड और विश्व है उस विश्वेश्वर के वचन सुनकर, संत-महात्मा के चरणों में बैठकर, अपने अहं को गलाकर आत्मा के अनुभव में अपना जीवन धन्य कर ले, वही सच्चा धनवान है।

हे मानव ! तुझमें अपूर्व शक्ति, सौन्दर्य, प्रेम, आनन्द, साहस छुपा है। घृणा, उद्वेग, ईर्ष्या, द्वेष और तुच्छ वासनाओं से तेरी महत्ता का ह्रास होता जा रहा है। सावधान हो भैया ! कमर कस। अपनी संकीर्णता और अहंकार को मिटाता जा। अपने दैवी स्वभाव, शक्ति, उल्लास, आनन्द, प्रेम और चित्त के प्रसाद को पाता जा।

यह पक्की गाँठ बाँध लो कि जो कुछ हो रहा है, चाहे अभी तुम्हारी समझ में न आवे और बुद्धि स्वीकार न करे तो भी परमात्मा का वह मंगलमय विधान है। वह तुम्हारे मंगल के लिए ही सब करता है। परम मंगल करने वाले परमात्मा को बार-बार धन्यवाद देते जाओ…. प्यार करते जाओ… और अपनी जीवन-नैया जीवनदाता की ओर बढ़ाते जाओ।

ऐसा कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति नहीं  जो तुम्हारी आत्मशक्ति के अनुसार बदलने में राजी न हो। परंतु अपने भीतर का यह आत्मबल, यह संकल्पबल विकसित करने की युक्ति किसी सच्चे महापुरुष से सीखने को मिल जाये और उसका विधिवत् अनुष्ठान करे तो, नर अपने नारायण स्वभाव में इसी जन्म में जाग सकता है।

 

%d bloggers like this: