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भगवान की विभूतियाँ

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भगवान की विभूतियाँ

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।

“हे अर्जुन ! जल में मैं रस हूँ। चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ। संपूर्ण वेदों में मैं प्रणव (ॐ) हूँ। आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ।

पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में मैं तेज हूँ। संपूर्ण भूतों में मैं जीवन हूँ अर्थात् जिससे वे जीते हैं वह तत्त्व मैं हूँ तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ।”

(गीताः 7.8,9)

जल में जो रस वह रस परमात्मा है। वैज्ञानिक दृष्टि से जल का विश्लेषण करोगे तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन – ये दो गैस मिलेगी। इन दो गैसों को मिलाने से रस उत्पन्न नहीं होता किन्तु विज्ञान बाहर की आँखों से देखना चाहता है और विज्ञान की आँख से जो दिखेगा वह दृश्य दिखेगा। दृश्य के भीतर जो अदृश्य रस है वह विज्ञान की आँख से नहीं दिखता। भीतर का रस तो वे ही देख पाते हैं जो भीतर में, गहराई में जाते हैं। जैसे, दो मित्र परस्पर मिले। एक का हाथ दूसरे के हाथ में आया…. बड़ा आनन्द आया… बड़ा रस मिला। अगर आप मित्र के हाथ को लेबोरेटरी में ले जाओ तो त्वचा, मांस, रक्त, अस्थि के सिवा उसमें कुछ नहीं मिलेगा। फिर भी जब मित्र का हाथ आपके हाथ में आया तो रस मिला। तो कहना पड़ेगा कि रस भीतर होता है, बाहर नहीं। जो वास्तविक में रस है वह इन्द्रियों का विषय नहीं है।

भौतिक विज्ञान तो इन्द्रियों को जैसा दिखता है वैसा निर्णय करता है और वेदान्त तथा योगदर्शन यानी आध्यात्मिक विज्ञान तो इन्द्रियाँ जिससे देखती हैं वह मन, मन को जो सत्ता देता है वह चित्त और चित्त को जो चेतना देता है उसके तरफ विचारता है। भगवान कहते हैं- जल में रस मैं हूँ तो जल में रस आया कहाँ से? कैसे आया? परमात्मा से ही आया। रस कब आता है?जब भीतर रस होता है तब। अगर किसी की जिह्वा में सूखा रोग हो गया हो तो उसे रसगुल्ला आदि किसी भी पदार्थ का रस नहीं आयेगा। जिह्वा को रस कब आता है? जब वह अपने रस से रसीली होती है और जिह्वा का वह रस आता है जल में छुपे हुए अत्यंत सूक्ष्म रस के प्रभाव के ही कारण। इसीलिए भगवान कहते हैं- “जल में रस मैं हूँ।”

प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’ ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है? आँखों से हमें प्रकाश दिखता है तो वास्तव में हम प्रकाश को नहीं देखते किन्तु प्रकाश जिन वस्तुओं पर पड़ता है उन वस्तुओं को देखते हैं। प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता है तो रूपान्तरित होता है और वह रूपान्तरण हमें दिखता है, वास्तविक प्रकाश नहीं दिखता। सूर्य और चन्द्र का जो वास्तविक प्रकाश है वही आपका-हमारा वास्तविक प्रकाश है और श्रीकृष्ण इसी प्रकाश की ओर संकेत करते हुए कह रहे हैं कि ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’

प्रणवः सर्ववेदषु। ‘सब वेदों में ॐकार मैं हूँ।’ वेद का कोई अंत नहीं है। वेद यानी ज्ञान। ज्ञान का कोई अन्त नहीं होता और जिसका अंत हो जाये वह ज्ञान नहीं होता। वेद की चार संहिताएँ हैं 1121 या 1127 उपनिषद हैं। इन सब उपनिषदों का सार कठवल्ली है और कठवल्ली आदि सबका सार बीज रूप में ‘ॐ’ है। ‘अ’कार + ‘उ’कार + ‘म’कार = ॐकार।

कोई भी व्यंजन ‘अ’कार के बिना नहीं बोला जा सकता। यह ‘अ’कार सृष्टि का स्थूल (विश्व), ‘उ’ कार तेजस और ‘म’ कार प्राज्ञ एवं ॐ की अर्धमात्रा ‘ँ’ है वह है चैतन्य सूर्य का द्योतक।

अभी तो रशिया के वैज्ञानिक चकित हो गये कि कोई भी आदमी भीतर कोई  शब्द सोचे और बाहर दूसरा शब्द बोले तो दोनों अलग-अलग उनके कम्पयूटर में आ जाते हैं लेकिन’ॐ’कार एक विलक्षण शब्द है। भीतर अगर ‘ॐ’ कार एवं बाहर दूसरा शब्द हो या बाहर ‘ॐ’ कार और भीतर दूसरा कोई शब्द हो फिर भी दोनों जगह ‘ॐ’कार ही आ जाता है। यह ‘ॐ’कार शब्द अन्य सब शब्दों से बिल्कुल अलग पड़ता है और ऋषियों ने इसकी आकृति भी बिल्कुल निराली बना दी है।

ऐसा कोई भी मन्त्र नहीं है जिसमें ॐ का उपयोग न किया गया हो। जिसमें ॐ का उपयोग नहीं है वह बीजमन्त्र से रहित होता है। यह ॐकार सबका बीज है, सबका मूल है। नवजात शिशु जब रोता है तब उसकी ‘ऊँवां…ऊँवां…’ आवाज में ॐकार की ध्वनि ही होती है। मरीज भी बिस्तर पर कराहता है उसकी ॐऽऽऽऽऽ…ॐऽऽऽऽ आवाज में ॐकार की ही ध्वनि होती है। इससे सिद्ध होता है कि आपका जो चैतन्य आत्मा है उसकी वास्तविक ध्वनि ॐ है।

विभिन्न पद्धतियों से ॐकार के द्वारा अपनी साधना को संपन्न किया जा सकता है। आज्ञाचक्र पर अथवा नाभि केन्द्र पर ॐ की आकृति का ध्यान करके अथवा हृदय में उसकी भावना करते हुए ध्यान करके हम अपनी सुषुप्त शक्तियों को विकसित कर सकते हैं।

वैखरी वाणी द्वारा ॐ का उच्चारण करते हुए मध्यमा में पहुँच जाओ। मध्यमा से पश्यन्ती में जाओ और पश्यन्ती से अगर परा वाणी में पहुँच जाओ तो अत्यंत सूक्ष्म अवस्था को परम मौन को उपलब्ध हो सकते हो। वह परम मौन की जो अवस्था है उस अवस्था को पाये हुए व्यक्ति के आगे इस लोक का तो क्या, त्रिलोकी का राज्य भी तुच्छ हो जाता है।

भगवान शंकर ने भैरव विज्ञान में कहा हैः

”हे उमा ! इस ॐ को जो जानता है वह मेरे को जान लेता है। इस ॐ को जो समझ लेता है वह मुझे समझ लेता है। इस ॐ को जो पा लेता है वह मुझे पा लेता है।”

भगवान श्री कृष्ण आगे कहते हैं शब्दः खे। अर्थात् आकाश में शब्द मैं हूँ।

शब्द में बड़ी शक्ति है। शब्द का नाश नहीं होता। मैंने यहाँ शब्द कहे और रेडियो स्टेशन के यंत्र हों तो मेरे द्वारा यहाँ कहे गये शब्द हजारों मील दूर तक सुनायी पड़ते हैं। इस प्रकार शब्दों का नाश नहीं हुआ। वाणी से निकले हुए शब्द नष्ट नहीं होते वरन् आकाश में गूँजते रहते हैं। इसीलिए भगवान कहते हैं- शब्दः खे। आकाश में जो शब्द है वह मैं हूँ।

पौरूषं नृषु। भगवान कहते हैं कि पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ। पुरुष कौन है? जो पुरुषार्थ करे वह पुरुष। पुरुषार्थ क्या है? पुरुषस्य अर्थः इति पुरुषार्थः। जो परब्रह्म परमात्मा पुरुष है उसको पाने के लिए जो प्रयत्न है उसको पुरुषार्थ बोलते हैं। भगवान कहते हैं कि ऐसा पुरुषार्थ करने वालों पुरुषों में पौरूष मैं हूँ।

पुरुष वह है जो पुरुषार्थ करके ‘है’ उसको ठीक से समझ ले। जो सदा मौजूद है और जिसको पाने के बाद कुछ पाना नहीं, जिसको जानने के बाद कुछ जानना नहीं, जिसमें स्थिर रहने के बाद बड़े भारी दुःख भी चलित न कर सके ऐसे तत्त्व को पाना पुरुषार्थ है।

लोग समझते हैं कि जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए धन पाना पुरुषार्थ है। जिसके पास बाह्य पढ़ाई-लिखाई नहीं उसके लिए पढ़ाई-लिखाई पुरुषार्थ है। जिसके पास यश नहीं उसके लिए यश पाना पुरुषार्थ है। इस प्रकार जो नहीं है उसको लाना, उसको पाना पुरुषार्थ मान लिया जाता है। जगत की जितनी भी चीजे हैं वे पहले नहीं थीं, बाद में नहीं रहेंगी और अभी भी नहीं के तरफ जा रही हैं। जो नहीं की तरफ जा रही हैं उन नश्वर वस्तुओं, नश्वर सत्ता, नश्वर पद को पाने का जो यत्न करता है उसको तो शास्त्रीय भाषा में अज्ञानी कहते हैं और जो शाश्वत तत्त्व को जानकर निहाल होने को तत्पर है उसको बोलते हैं पुरुष। भगवान कहते हैं कि ऐसे पुरुषों का पुरुष्त्व मैं हूँ।

इस प्रकार गीता के सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि जल में रस, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश, संपूर्ण वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द एवं पुरुषों में पुरुष्तव मैं हूँ।

नौवें श्लोक में भगवान आगे कहते हैं-

पुण्यो गंधः पृथिव्यां च। ‘पृथ्वी में पवित्र गंध मैं हूँ।’

पृथ्वी में पवित्र गंध भी वह चैतन्य सत्ता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान ने पवित्र गंध कहा है। सुगंध नहीं कहा क्योंकि सुगन्ध पवित्र गंध हो यह जरूरी नहीं। कई ऐसी सुगंधें हैं जो कामवासना को भड़काती हैं। पेरिस आदि में इस प्रकार की खोज करके इत्र (परफ्यूम्स) बनाये जाते हैं। जिनसे मनुष्य की काम वासना उद्दीप्त हो, मनुष्य संसार के कीचड़ में फँसे। इसीलिए श्रीकृष्ण ने सुगन्ध नहीं, वरन् ‘पवित्र गंध’ कहा है।

तेजश्चास्मि विभावसौ। ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’ तेज रूप तन्मात्रा से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है। अग्नि में से अगर तेज निकाल दिया जाये तो अग्नि बचे ही नहीं। यहाँ भगवान कहते हैं कि ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’

जीवनं सर्वभूतेष।

संपूर्ण भूतों में जीवन मैं हूँ। प्राणी में उसको जिलाने वाली जो जीवनी-शक्ति है वह अगर न रहे तो वह प्राणी फिर प्राणी नहीं रहेगा। फिर तो वह केवल शव रह जायेगा। अतः समस्त प्राणियों में अपनी चेतना का अस्त्तित्व बताते हुए भगवान कहते हैं कि संपूर्ण भूतों में मैं उनका जीवन हूँ।

अंत में भगवान कहते हैं- तपश्चास्मि तपस्विषु। तपस्वियों में मैं तप हूँ। सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करने को तप कहते हैं। किन्तु वास्तविक तप तो है परमात्म-प्राप्ति में। चाहे कितनी भी विघ्न-बाधाएँ आयें, उनकी परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य में डटे रहना।

यही तपस्वियों का तप है और इसी से वे तपस्वी कहलाते हैं। इसी तप के लिए भगवान संकेत करते हुए कहते हैं कि तपस्वियों का तप मैं हूँ।

इस प्रकार उपरोक्त दोनों ही श्लोकों में भगवान कहते हैं कि जल में रस, सूर्य-चन्द्र में प्रभा, वेदों में प्रणव, आकाश में शब्द, पुरुषों में पुरुषत्व, पृथ्वी में गंध, अग्नि में तेज, संपूर्ण भूतों में उनका जीवन तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ। भगवान ने जिज्ञासुओं के लिए अपनी सर्वव्यापकता का बोध कराया है ताकि जिज्ञासु जहाँ-जहाँ नजर जाये, वहाँ भगवान की सत्ता मानकर अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने में कामयाब हो सके, वास्तविक कृष्ण तत्त्व का ज्ञान पा सके।

 

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चालू खट-खट में अपना काम बना लो।

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आप श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं तो कीजिये, अल्लाह का चिन्तन करते हैं तो कीजिए, झूलेलाल का चिन्तन करते हैं तो कीजिये और यदि सदगुरु प्राप्त हैं, बुद्धि विकसित है, श्रद्धा है, पुण्य है तो चिन्तन कीजिये किः “शिवोऽहम्…. सच्चिदान्दोऽहम्… आनन्दस्वरूपोऽहम्….वाह वाह ! मैं गुरु होकर उपदेश दे रहा हूँ… शिष्य होकर सुन रहा हूँ…. सब मेरे ही रूप हैं। मैं श्रीकृष्ण होकर आया था, बुद्ध होकर आया था, महावीर होकर आया था। अनेक शरीर आ जायँ और मर जायँ, मिट जायँ, फिर भी मेरा नाश नहीं होता। क्योंकि अनन्त शरीरों में मैं ही हूँ…..ॐ….ॐ….ॐ….. आपके लिये यह मार्ग उत्तम हो सकता है।

आपके चिन्तन का सातत्य कहाँ है यह बात महत्त्व की है। चालू व्यवहार में भी वह अनुसंधान बना रहे तो मंजिल जल्दी तय हो जाती है।

स्वामी रामतीर्थ एक घटना सुनाया करते थे। ब्रिटिश सरकार के जमाने की बात है। एक सरकारी अमलदार घोड़े पर कहीं जा रहा था। रास्ते में घोड़े को प्यास लगी तो पास में कुएँ पर जहाँ अरट चल रहा था वहाँ पानी पिलाने गया। अरट चलने से आने वाली खट…. खट…. खट… खट…. आवाज सुनकर घोड़ा बिदक गया।। उसने पानी नहीं पीया। वह भी साहब का घोड़ा था, अहंकारी का घोड़ा था

आदमी जितना अहंकारी होता है उतना भीतर से डरपोक होता है, जितना विषयी होता है उतना ज्यादा भयभीत होता है।

मेरे पास एक महिला आयी और बोलीः

बापू ! मेरे पास हीरे-जवाहरात के गहनों के सात सेट हैं। हररोज अलग-अलग सेट पहनती हैं। एक सेट करीब लाख-डेढ़ लाख का होता होगा। और तो सब कुछ है लेकिन जीवन में शांति नहीं है, हृदय में सुख-चैन नहीं है।

इतने में कुछ आवाज आयी तो वह चौकन्नी हो गई, डर गई। मैंने पूछाः बहन ! इतना डरती क्यों है?”

बाबाजी ! मैं क्या बताऊँ? मुझे बहुत डर लगता है। क्या कारण है, पता नहीं। छिपकली को देखकर भी मेरी धड़कन बढ़ जाती है।

मैंने कई बार निरीक्षण किया है कि व्यक्ति का जीवन जितना विलासी होता है, धन-वैभव-संपत्ति से आक्रान्त होता है उतना वह भीतर से खोखला होता है, भयभीत होता है।

उस अमलदार ने किसान को हुक्म कियाः इस खट-खट आवाज को बन्द कर। किसान ने अरट चलाना बन्द कर दिया। खट-खट तो बन्द हो गई लेकिन साथ में पानी भी आना बन्द हो गया। अमलदार चिढ़कर बोलाः मैंने अरट की खट-खट आवाज बन्द करने को कहा था, पानी बन्द करने को नहीं कहा था।

साहब मेरे ! गुस्ताखी माफ हो। पहले खट-खट होगी, बाद में पानी निकलेगा। यदि आपके घोड़े को प्यास लगी हो तो चालू खट-खट में ही उसे पुचकारकर पानी पिला दो। चालू खट-खट में ही अपना काम बना लो।

हाँ, आप भी चालू खट-खट में अपना काम बना लो। चाहे साकार में या निराकार में, जिसमें आपकी प्रीति हो उसमें मन लगा दो। इस मिथ्या जगत के आकर्षणों से बचकर संसारसागर से पार हो जाओ।

गुरूभक्तियोग की महत्ता – ब्रह्मलीन स्वामी शिवानन्दजी

जिस प्रकार शीघ्र ईश्वरदर्शन के लिए कलियुग-साधना के रूप में कीर्तन-साधना है उसी प्रकार इस संशय, नास्तिकता, अभिमान और अहंकार के युग में योग की एक नई पद्धति यहाँ प्रस्तुत है-.गुरूभक्तियोग। यह योग अदभुत है। इसकी शक्ति असीम है। इसका प्रभाव अमोघ है। इसकी महत्ता अवर्णनीय है। इस युग के लिए उपयोगी इस विशेष योग-पद्धति के द्वारा आप इस हाड़-चाम के पार्थिव देह में रहते हुए ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी जीवन में आप उन्हें अपने साथ विचरण करते हुए निहार सकते हैं। . . . . .

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Antahkaran ke 3 dosh kya aur kaise door karen

 

अंतःकरण के तीन दोष कैसे दूर करें ?

परम पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की अमृतवाणी

सत्संग के मुख्य अंश :

* अन्तःकरण के तीन दोषों को वेदांत की भाषा में मल बोलते है |

* मल माना आगे पीछे का सोचे बिना मज़ा करो ,गन्दगी है |

* मल को दूर करने केलिए धर्म ,कर्म,नियम | वासना को नियंत्रित करने के लिए धर्म है |

* मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान का महत्त्व है |

* ध्यान से योग्यता बढ़ती है लेकिन जीव भाव बना रहता है |

* मल को मिटाने के लिए शुद्ध कर्म,चंचलता को मिटाने के लिए ध्यान-एकाग्रता लेकिन अज्ञान को मिटाने के लिए आत्मज्ञान की जरुरत पड़ती है |

There are 3 faults of ANTAHKARAN (inner instrument) . They are called MAL (Bad) in language of Vedanta.
Mal means whatever comes in mind,  eats, drink and have fun.Do not think about past and results. Have fun in present. Like a moth which gets burned in the flame just for pleasure this is Senselessness, is mal.
It is foolishness. The Mal means fault in understanding. That is called mal. DHARAMKARAMNIYAM (Religion – Act – regulation) is to remove mal. DHARAM (religion) is to control desires.
And to concentrate mind and to get  (spiritual) powers DHYAN (MEDITATION) is very important.
But DHYAN (meditation) increases abilities, gets strength, personality remains, JEEV BHAV (body gesture) exists.
If personality remains than he/she will use power of DHYAN for enjoyment,will use it to praise of himself/ herself and will use it up. Again consciousness is required and pure deeda to remove mal,
DHYAN (Meditation) and concentration to remove fickleness, but self-consciousness to remove ignorance.
My Guruji used to say –
Dirt in the house will be removed only by sweeping, but the holes of house can be removed only by filling with cement-concrete.
Darkness won’t removed by cow-dung or cement or sweeping.
That darkness can be removed only by lighting. Utterly certain true thing

कृष्ण लीला – पूनम व्रतधारी विशेष – ब्रह्मचर्य

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काली माँ  की उपासना करनेवाले  बहादुर गदाधर  ठाकूर  ने पत्नी शारदा को फिर जीवन भर भोग्या नही माना… ( शारदा जी के पैरों में उन को माँ  के चरणों के दर्शन हुए थे इसलिए गदाधर ठाकुर अर्थात रामकृष्ण परमहंस..) ब्रम्हचर्य  व्रत पालते पालते कई ब्रम्हचारी फिसल जाते…लेकिन स्री  साथ में पत्नी रूप में आई और ब्रम्हचर्य   पालन जीवन भर किया…कैसी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था है!..की आप के भाव को बादलो…

विदेश में फ्राइड नाम के मनो वैज्ञानिक  के सिद्धांत  से गुमराह हो गये है लोग…पुत्री पिता की तरफ और पुत्र माता की तरफ काम विकार से आकर्षित होते है ऐसा उस का सिद्धांत  था…लेकिन ये फ्राइड के खुद के जीवन में हुआ होगा, ऐसा सब के जीवन में नही होता..ये उस ने अपने उग्रवादी वमन से जो लिखा है उस से सारा पाश्चात्य  जगत तबाह हो गया… ‘सम्भोग  से समाधि’ का भाषण करने वाला अपना भारत का विद्वान भी फ्राइड का मनोविज्ञान  पढ़ता था… 
भारतीय संस्कृति में ऐसा नही है…दुल्हन के वस्त्र  पहेन  के पुत्री जब ससुराल जाती है सजी धजी तब पिता के गले लगती है…क्या बेटी में पिता के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा उस समय?….अथवा पिता का पुत्री के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा पुत्री के प्रति?…..नही नही..ये तो मेरी लाडली पुत्री है..ये मेरे पिता है जिन्हों ने मुझे जनम दिया,पाल पोस  कर बड़ा किया,सुंदर संस्कार दिए…कितने कितने सुंदर भाव होते है पिता और पुत्री के एकदुसरे के प्रति.. ‘भावग्राही  जनार्दन!’ …आप जैसा भाव करते वो  जनार्दन हरि  आप को उसी में मदद करते है…भाव का महत्व है…
अभी भी आप आसपड़ोस को माईयों को विकारी नज़र से देखो तो आप को स्वपनदोष हो सकता है..
गदाधर ठाकुर अपनी विवाहिता विधिवत की पत्नी में  माँ का दृढ़ भाव किए तो जीवन भर ब्रम्हचर्य पालन में सफल हुए..कितनी उँचाई है!..आप के अंतरात्मा में कितना सामर्थ्य है!…कोई बात दृढ़ता  से ठान  लेते है तो मनोयोग से हो जाता है…
जो पूनम व्रत करते तो आपदाओं से और दुर्गति से उन की रक्षा होती है..ये तो आप ने बाद में सुना है…
श्रध्दा  पूर्वा सर्व धर्मा फल प्रदा: l
श्रध्दा सभी धर्मों के पूर्व में होती है और मनोरथों को पूर्ण करने वाली फल दायिनी  वो माता श्रध्दा है…वेदों में ‘श्रध्दा सूक्त’ है , उस की अपनी महिमा है….श्रध्दा से सब कुछ  आसान हो जाता है …

Revolutionary movement never done before ! Join It !!!

andhkar me bapu ne  prakash punj dikhalaya hai

sat sat kare pranam inhe hame satya ka path padhaya hai

hindu muslim sikh ishai ek dhage se jod diye

jago re jogo sara vishwa jagana hai ghar ghar jake ye subh sankalp jagana hai

santo ne jo rah dikhayi usi pe chalte jana hai

hari om hari om

Julm Sahena Dugna Paap – Sant Asharamji Bapu

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मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent’s Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

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#ParentsWorshipDayOn14Feb मात-पिता की सेवा, ईश्वर की सेवा !

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Coming Soon New DVD Maa Baap Ko Mat Bhulna…

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