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यज्ञार्थ कर्म

 

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यज्ञार्थ कर्म

मानव तन पाकर विषय भोगना उचित नहीं है। विषय भोग भोगना है तो पशुयोनि में खूब मजे से भोगा जा सकता है। पशुओं को कोई बाधा नहीं। हम असंयमी बनकर अपना जीवन व्यतीत कर दें तो हम पशुता की ओर गये। अतः जीवन-सरिता को संयम के दो किनारों के बीच में बहाते हुए यज्ञार्थ कर्म करने चाहिए। भोजन करें तो भी यज्ञार्थ, पानी पियें तो भी यज्ञार्थ। हमारे पेट में जठराग्नि यानि भगवान अग्निदेव विराजमान हैं उनको आहुति देना है।

‘मैं खा रहा हूँ… मजा ले रहा हूँ…’

नहीं….। मैं वैश्वानर को भोजन करा रहा हूँ। अपने बच्चे को भोजन कराते समय बच्चे में स्थित आदि नारायण को भोजन कराने की भावना करो। इससे भोजन कराना भी यज्ञ हो जाएगा।

बंगाल में एक स्त्री की शादी होते ही उसी वर्ष में उसका पति मर गया। एकाएक पति की मृत्यु होने से वह विधवा महिला विह्वल हो गई, बावरी सी बन गई। किसी सज्जन व्यक्ति ने सोचा कि पति की याद में कहीं पागल न हो जाय यह लड़की ! उसके घरवालों को समझाया कि, ‘फलानी जगह पर संत-महात्मा रहते हैं उनके पास ले जाओ इस बच्ची को। उनके दर्शन कराओ, सत्संग में बैठाओ, सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

वह विधवा युवती, सोलह वर्ष की बच्ची संत-दर्शन को गई। पति के वियोग में विह्वल। सौभाग्य-चिह्न बिन्दी विहीन ललाट, चूड़ियाँ विहीन हाथ, तन पर विधवा के धवल वस्त्र। आँखों में आँसू बहाती संत श्री के चरणों में पहुँची। बाबाजी ने आत्मिक प्यार भरे स्वर में पूछाः

“बेटा ! कैसे आयी ?”

वह रो पड़ी। सिसकते हुए बोलीः “दुनिया में मेरा कोई नहीं….. मैं क्या करूँ ?”

बाबाजी ने कहाः “अरे बेटी ! तू आज जितना झूठ बोल रही है उतना कभी नहीं बोली। तुझे इतना पता नहीं कि संत महात्मा के आगे कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए ?”

वह युवती चौंक उठी एकदम। बाबाजी को यकीन दिलाते हुए कहने लगीः “बाबाजी ! मैं सच बोलती हूँ। इस दुनिया में मेरा कोई नहीं। मेरी बुढ़िया माँ थी उसने कन्यादान कर दिया और कुछ महीनों में वह प्रभु धाम में चली गई। फिर उसका जमाई भी चल बसा। मैं अकेली रह गई। मेरा कोई न रहा।”

“तू झूठ बोल रही है। तेरा कोई नहीं ? अरे ! तेरे हृदय में परमात्मा बैठा है वह तेरा है। हृदय की धड़कनें चला रहा है, तेरे तन में रक्त बहा रहा है, श्वास चला रहा है, आँखों को देखने की शक्ति दे रहा है, कानों को सुनने की शक्ति दे रहा है वह सर्वान्तर्यामी परमात्मा तेरा है, तेरे साथ है, तेरे भीतर है और तू बोलती है मेरा कोई नहीं ? पगली ! वह तेरे और सबके हृदय में बैठा हुआ सृष्टिकर्त्ता कभी मरता नहीं। शरीर मरता है तब भी सूक्ष्म शरीर में अन्तर्यामी रहता है, प्रेरणा देता है, आगे की यात्रा करवाता है। सूक्ष्म शरीर भी विलीन हो जाता है तब वह सर्वव्यापक ब्रह्म हो जाता है, विश्व चैतन्य हो जाता है।

ऐसे परब्रह्म परमात्मा जैसे सबके हैं वैसे तेरे भी हैं। जिसका कोई नहीं होता उसके तो वे पूरे के पूरे हैं। ….और तू रोती है। धैर्य रख बेटी ! करूणामूर्ति महात्मा ने बच्ची को आश्वासन दिया।

लौकिक दृष्टि से कोई अनाथ सोचे कि दुनियाँ में मेरा कोई नहीं है, केवल परमात्मा ही मेरा है, तो उसकी सारी की सारी वृत्तियाँ एक ही जगह पर लग जाती हैं, केन्द्रित हो जाती हैं। उसका मन परमात्मा में लगने लगता है।

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भगवान के अवतार

 

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भगवान के अवतार

जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।

ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।

भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।

अवतार का अर्थ क्या है ?

अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा…. और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।

शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।

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