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तुम राजा हो तो मैं महाराजा हूँ।

Sant Asaharamji Bapu

राजा तेजबहादुर की शोभायात्रा निकल रही थी, उस समय रास्ते पर एक संत बैठे हुए थे। उनका नाम धूलीशाह था। वे हमेशा भूल पर ही बैठे रहते। राजा की सवारी आ रही थी, इसलिए सिपाहियों ने जाकर कहाः

“महाराज ! उस किनारे हो जाइये। राजा की सवारी आ रही है।”

धूलीशाहजी बोलेः “राजा की सवारी आ रही है तो क्या बड़ी बात है ? उसको कहो कि सहजता से प्रणाम करके यहाँ से निकल जाये क्योंकि यहाँ महाराज विद्यमान हैं।”

सिपाहियों ने कहाः यदि राजा अकेले होते तो नमस्कार करके संकोच से निकल जाते, पर उनके हाथी, रथ, घोड़े आदि सब कैसे निकलें ? महाराज ! आप जरा किनारे हो जाइये।”

धूलीशाहजी बोलेः “यदि हाथी-घोड़े पर ही जाना हो तो दूसरा रास्ता पकड़ लो। उसे बता दो कि यदि तुम राजा हो तो मैं महाराजा हूँ। महाराजा यहाँ पर ही बैठेंगे। महाराजा की सवारी नहीं हट सकती।”

बात राजा तक पहुँची। राजा इतना आवेशी नहीं था। वह रथ से उतरकर आया और धूलीशाह की ओर निहारकर बोलाः

“महाराज ! आप राजा-महाराजा हो ?”

धूलीशाह जी बोलेः “हाँ, मैं महाराजा हूँ।”

राजाः “राजा के पास तो राज्य होता है, सिपाही होते हैं….खजाना होता है, नौकर होते हैं। राजा के पास अपनी पताका होती है, झंडा होती है। आपके पास क्या है ?”

धूलिशाहजी बोलेः “तेरा राज्य कोई छीन न ले इसलिये तू शत्रुओं से डरता है और तुझे सीमाओं की रक्षा करनी पड़ती है। मेरा तो कोई शत्रु ही नहीं है और मुझे सीमाओं की रक्षा की फिकर नहीं तो मैं सिपाही क्यों रखूँ ? तुझे तो नौकरों को वेतन भी देना पड़ता है, इसलिए धन भी चाहिए। मुझे तो कोई नौकरों को वेतन देना नहीं पड़ता इसलिए धन भी नहीं चाहिए। तेरे नौकर तो पैसे के लालच से तेरी सेवा करेंगे और अंदर से सोचेंगे कि कब राजा जाये। तेरा तो इस इलाके में ही आदर होगा, जबकि हम तो जहाँ जाएँगे वहाँ सब लोग मुफ्त में हमारी सेवा करेंगे। हमको नौकरों की जरूरत नहीं। हमको धन की भी जरूरत नहीं क्योंकि हमारा कोई खर्च नहीं है। हमें किसी से डर भी नहीं कि हम अंगरक्षक रखें। बात रही झोली, झंडा और पताका की, तो तेरी यह बाह्य पताका है, जबकि हमारी तो सोहं और शिवोहं की भीतर की पताका लहरा रही है। हम जहाँ भी नजर डालते हैं, वहाँ हमारा राज्य खड़ा हो जाता है। सीमाओं को सँभालने के लिए सिपाहियों की जरूरत नहीं पड़ती। तेरा राज्य तो जमीन पर कुछ दिन के लिए है, लेकिन

दास कबीर चढ्यो गढ़ ऊपर।

राज मिल्यो अविनाशी।।

यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

asaramji
यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

संसार की कोई भी चीज केवल देखने भर को तथा कहने भर को ही हमारी है, आखिर में तो छूट ही जायेगी। जब चीज छूट जाय तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उससे पहले ही उसकी असारता को समझकर उससे ममता हटा लें। जो छूटने वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें। व्यक्ति का ऐसा विवेक जग जाय तो बेड़ा पार हो जाय।

जिसके जीवन में विवेक नहीं है उसका जीवन नश्वर भोगों और ऐहिक आपाधापी में खत्म हो जाता है, बर्बाद हो जाता है। अंत में कुछ भी हाथ नहीं लगता तब वह पछताता है। मनुष्य को चाहिए कि अपनी विवेकदृष्टि सदा जागृत रखकर सफल जीवन जीने का यत्न करे। विवेकी मनुष्य किसी भी ऐहिक चीज-वस्तु या परिस्थिति में उलझेगा नहीं। धन हो, सत्ता हो, सामर्थ्य हो, मित्र-परिवार हो – सर्व प्रकार के ऐहिक सुख हों पर विवेकी उनसे चिपकेगा नहीं, उनका उपयोग करेगा। मूर्ख आदमी उनमें आसक्त हो जायेगा, ‘मोर-तोर’ की जेवरी (‘मेरे-तेरे की रस्सी) में बँध जायेगा फिर अंतकाल में पछतायेगा।

एक रात राजा भोज अपने सर्वाधिक आरामदायक एवं मणियों से जड़े बहुमूल्य पलंग पर विश्राम कर रहे थे। अपने जीवनकाल में किये सर्वोत्कृष्ट कार्यों एवं महान उपलब्धियों पर उन्हें बहुत अभिमान हो रहा था। मानवहित के लिए उन्होंने अनेक उपयोगी कार्य किये थे, विविध लोकोपयोगी योजनाओं को कार्यान्वित किया था और प्रजा भी उन्हें भूदेव अर्थात् धरती का देव मानती थी।

वे विद्वानों का बहुत आदर करते थे एवं उनके विचारों, विशेषतः उनकी काव्य-रचनाओं को सुनकर उन्हें खूब पुरस्कार देते थे। काव्य-प्रेम और मानवता की सेवा उनके चरित्र के गौरव में सदैव वृद्धि करते रहते थे।

उनका कवि-हृदय कल्पनालोक में हिलोरें ले रहा था। मन में भाव आया कि ‘मनुष्य जीवन लोकहित के लिए ही प्राप्त हुआ है और मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि अपनी प्रजा की भलाई में लगा रहता हूँ तथा मेरी प्रजा भी मेरे कार्यों से प्रसन्न है।”

संयोग से पलंग पर लेटे-लेटे काव्य की कुछ पंक्तियाँ भाव-जगत में खोये उन कवि के हृदय में गंगाजी की तरंगों की भाँति लहराने लगीं और वे भाव-विभोर होकर गुनगुनाने लगेः

चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः।

‘अहा ! मुझे चित्त को मयूर की भाँति नृत्य से लुभाने वाली सुंदर कमनीय युवतियों का अक्षय प्यार और स्वभावानुकूल स्नेही मित्र के संग का सुख मिला है, मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ !”

इस पंक्ति को दोहरा-दोहराकर वे आत्मगौरव का अनुभव कर रहे थे। इन्द्रियसुख पाकर मनुष्य को अभिमान हो जाता है। फिर वह अहं-तृप्ति में ही सुख का अनुभव करता है।

राजा भोज सोच रहे थे कि ‘किसी राजा को वह ऐश्वर्य नहीं मिला जो मुझे प्राप्त है। मेरे भाग्य में कितना अक्षय आनंद भरा हुआ है !’ और इसी मिथ्या अतिशयानंद से उनके मन में कविता की एक और पंक्ति लहराने लगी। वे बोल उठेः

सद् बान्धवाः प्रणतिमगर्भगिरश्च भृत्याः।

‘अपने निजी स्नेही बंधुओं का साहचर्य और अनुरागी सेवकों की अटूट सेवावृत्ति मुझे मिली है, वाह ! मेरा कितना अहोभाग्य है !’

वे उपरोक्त दोनों पंक्तियों का पुनः-पुनः गर्व से उच्चारण करते रहे और अधिकाधिक हर्ष-विभोर होते गये। कवि का हृदय कल्पनाओं का भंडार होता है और इसी कल्पना के संसार में उनका काव्य-निर्माण आगे बढ़ा।

कुछ देर और विचारमग्न हो वे तीसरी पंक्ति यों कहने लगेः

गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरंगाः।

”मेरे द्वार पर गर्व और शक्ति से सम्पन्न चंचल घोड़े हिनहिनाते हैं तथा बड़े-बड़े दाँतों वाले मदमत्त हाथी चिंघाड़ते हैं। अहो ! मैं सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न हूँ। मेरे ऊपर भगवान की असीम कृपा है। मुझे अपने अद्वितीय भाग्य पर गर्व है ! मैं कितना भाग्यशाली हूँ !”

फिर तीनों पंक्तियों को एक साथ जोड़कर वे बार-बार हर्षित मन से उच्च स्वर में गाने लगे। बहुत देर तक वे काव्य की चतुर्थ पंक्ति जोड़ने का प्रयत्न करते रहे पर सफल न हो पाये।

अहंकार का विकार मनुष्य की नैतिक शक्ति का क्षय कर देता है, उसे हिंसा और विनाश के पथ पर ले जाता है। उसके अंदर का स्वार्थ उसे प्रत्येक कार्य, बातचीत, आचार-व्यवहार से दूसरों पर अत्याचार करने के लिए उत्साहित करता है। वह काल्पनिक जगत में रहने लगता है।

राजा भोज मन ही मन अपने काव्य-जगत में विचरण कर रहे थे। अपने को हर प्रकार से धन्य समझ मिथ्या गर्व में चूर थे परंतु काव्य गी चौथी पंक्ति नहीं बन पा रही थी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।

उनके पलंग के नीचे छिपे एक निर्धन, संस्कृत के कवि उदभट्ट से और अधिक छिपा तथा चुप न रहा गया। लक्ष्मी जी सदा उनसे रुष्ट ही रहती थीं। वे राजा भोज से कुछ दान-दक्षिणा की याचना करने आये थे किंतु दण्ड के भय से पलंग के नीचे छिपकर ही रात काट रहे थे। वे भी संस्कृत के सिरमौर काव्यधर्मी थे। वे राजा के मिथ्या दर्प को सहन न कर सके और उन्होंने छिपे-छिपे नीचे से चौथी पंक्ति बोलीः

सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति।

‘हे राजन् ! यह ठीक है कि आपको अपने सत्कार्यों तथा पुण्यों से ये सब लौकिक सम्पदायें और सुख वैभव प्राप्त हो गये हैं। आज आपको सांसारिक आनंद-उपभोग के समस्त भौतिक साधन भी उपलब्ध हैं, किंतु जीवन के अंतिम समय में जब मृत्यु की छाया में मनुष्य के नेत्र बंद होने लगते हैं, तब उसके पास कुछ भी नहीं रहता।

हे उदार-शिरोमणि ! यह सांसारिक सुख-वैभव तो क्षणिक एवं अस्थिर है। इन सब सम्पदाओं में स्थायी रूप से आपके साथ रहने वाला कुछ भी नहीं है। सदा आपके साथ रहने वाला, शास्वत, अनादि अनंत तो आपका अपना आत्मा ही है और उसका ज्ञान ही सदा टिकने वाली सम्पदा है।

क्षमा करें राजन् ! आपको अहंकार के क्षुद्र काल्पनिक जगत से निकालकर ठोस वास्तविकता की ओर आपका ध्यान दिलाने के नैतिक कर्तव्य ने मुझे यह चौथी पंक्ति जोड़ने पर विवश कर दिया।”

विनीत भाव से यह कवि उदभट्ट बाहर निकलकर राजा के सामने खड़े हो गये। उनके शब्द राजा भोज के अंतर्मन में गहरे उतर गये। राजा मोह-निद्रा से जाग उठे। उनका विशुद्ध, निर्मल विवेक जागृत हुआ और वे नश्वर वैभव का क्षुद्र अहं त्यागकर शाश्वत पद की प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़े।

अविनाशी आतम अमर, जग तातें प्रतिकूल।

ऐसी ज्ञान विवेक है, सब साधन को मूल।।

आत्मा सत्, चित्त और आनन्दस्वरूप है तथा शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अमर, अपरिवर्तनशील है और शरीर मरणधर्मा, परिवर्तनशील है-ऐसा विवेक जिसका जग गया है वह परम विवेकी है।

‘श्रीरामचरितमानस’ में आता हैः

जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब विषय बिलास बिरागा।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए जब उसे सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाय। विवेक होने पर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) भगवान के चरणों में प्रेम होता है। मन, वचन और कर्म से भगवान के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है। (अयो.कां. 92.2-3)

 

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