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अव्यक्त तत्व का अनुसंधान

 

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अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।

‘बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।”

(गीताः 7.24)

जो बुद्धिमान हैं, मेधावी हैं वे भगवान को साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्तरूप में मानते हैं। जो बुद्धिमान नहीं हैं वे भगवान को साकार रूप में मानते हैं और निराकार तत्त्व के तरफ उनकी गति नहीं होती। जो मूर्ख हैं, बुद्धु हैं वे न भगवान के साकार रूप को मानते हैं न निराकार रूप को मानते हैं, वरन् अपनी मति एवं कल्पना में जो बात आती है उसी को मानते हैं

चार प्रकार की कृपा होती हैः

ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा।

ईश्वरकृपाः ईश्वर में प्रीति हो जाये, ईश्वर के वचनों को समझने की रूचि हो जाये, ईश्वर की ओर हमारा चित्त झुक जाये, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा हो जाये यह ईश्वर की कृपा है।

शास्त्रकृपाः शास्त्र का तत्त्व समझ में आ जाये, शास्त्र का लक्ष्यार्थ समझ में आने लग जाये यह शास्त्रकृपा है।

गुरुकृपाः गुरु हमें अपना समझकर, शिष्य, साधक या भक्त समझकर अपने अनुभव को व्यक्त करने लग जायें यह गुरुकृपा है।

आत्मकृपाः हम उस आत्मा परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त हो जायें, अपने देह, मन, इन्द्रियों से परे, इन सबको सत्ता देने वाले उस अव्यक्त स्वरूप को पहचानने की क्षमता हममें आ जायें यह आत्मकृपा है।

आत्मज्ञान हो लेकिन ज्ञान होने का अभिमान न हो तो समझ लेना की आत्मकृपा है। अपने को ज्ञान हो जाये फिर दूसरे अज्ञानी, मूढ़ दिखें और अपने को श्रेष्ठ मानने का भाव आये तो यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम होता है क्योंकि ज्ञान से सर्वव्यापक वस्तु का बोध होता है। उसमें अपने को पृथक करके दूसरे को हीन देखने की दृष्टि रह ही नहीं सकती। फिर तो भावसहित सब अपना ही स्वरूप दिखता है।

गर्मी-सर्दी देह को लगती है, मान-अपमान, हर्ष-शोक मन में होता है तथा राग-द्वेष मति के धर्म होते हैं यह समझ में आ जाये तो मति के साथ, मन के साथ, इन्द्रियों के साथ हमारा जो तादात्म्य जुड़ा है वह तादात्म्य दूर हो जाता है। शरीर चाहे कितना भी सुडौल हो, मजबूत हो, मन चाहे कितना भी शुद्ध और पवित्र हो, बुद्धि एकाग्र हो लेकिन जब तक अपने स्वरूप को नहीं जाना तब तक न जाने कब शरीर धोखा दे दे? कब मन धोखा दे दे? कब बुद्धि धोखा दे दे? कोई पता नहीं। क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है और प्रकृति परिवर्तनशील है।

संसार की चीजें बदलती हैं। शरीर बदलता है। अन्तःकरण बदलता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जो कुछ देखने में आता है वह सब व्यक्त है। भूख-प्यास भी तो मन से देखने में आती है। सर्दी-गर्मी का पता त्वचा से चलता है किन्तु उसमें वृत्ति का संयोग होता है अतः वह भी तो व्यक्त ही है। इसीलिए भगवान कहते हैं किः ‘जो मूढ़ लोग हैं वे मेरे अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानते और मुझे जन्मने-मरने वाला मानते हैं। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्तिभाव को प्राप्त होते हैं।

….और मजे की बात है कि जो आदमी जहाँ है और जैसा है, वहीं से और वैसा ही वह दूसरे को देखता है।

बुद्धिहीन से तात्पर्य अँगूठाछाप से नहीं है वरन् जिसको पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, जिस तत्त्व को समझने के लिए बुद्धि मिली है उस तत्त्व में बुद्धि के न लगाकर हीन पदार्थों में उसे खर्च कर दिया, वह बुद्धिहीन है।

भगवान ने क्रियाशक्ति दी है तो क्रियाशक्ति से क्रिया को बढ़ाकर अपने को जंजाल में न डालें लेकिन क्रियाशक्ति को सत्कर्म में लगाकर अनंत जन्मों के कर्मों को काटने का प्रयत्न करें। जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है ऐसे ही कर्म से कर्म काटे जायें।

ईश्वर ने बुद्धिशक्ति दी है तो बुद्धि से हम जगत के पदार्थों के साथ बँधे नहीं लेकिन जहाँ से बुद्धि को सत्ता मिलती है उस अव्यक्त स्वरूप में बुद्धि को लगायें ताकि बुद्धि बुद्धि न बचे बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये।

बुद्धि को ऋतंभरा प्रज्ञा बनाने के दो तरीके हैं-

योगमार्ग और ज्ञानमार्ग।

योगमार्ग में धारणा-ध्यान करके, चित्त की वृत्ति का निरोध करके अपने स्वरूप का अनुसंधान किया जाये। बारंबार निरोधाकार वृत्ति बन जाये तो इससे भी बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा होने लगती है।

ज्ञानमार्ग के अनुसार दूसरा तरीका यह है कि बारंबार उस सच्चिदानंदघन, अज, अविनाशी, शुद्ध, बुद्ध, साक्षी, दृष्टा, असंग, निर्विकार, चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया जाये और जगत का व्यवहार करते हुए, बातचीत करते हुए फिर जगत का बाध कर दिया जाये…. यह ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ की प्रक्रिया है। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः ”कोई ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण बार-बार पढ़े और आत्मज्ञान न हो तो राम बादशाह सिर कटायेगा।”

‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में लीलावती, चुडाला, मंकी ऋषि आदि की कथाएँ आयेंगी और बाद में वशिष्ठ जी महाराज कहेंगे किः “हे रामजी ! वास्तव में बना कुछ नहीं।यह चित्त का फुरना मात्र है।” यही बात शंकराचार्य जी ने कही हैः

नास्ति अविद्या मनसोऽतिरक्ता

मनैवऽविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन्विलीने सकलं विलीनं

तस्मिन्जिगीर्णे सकलं जिगीर्णम्।।

यह अविद्या मन से अलग नहीं है। माया… माया…. माया… माया कोई लाल, पीली, हरी या सफेद साड़ी पहनी हुई महिला नहीं है। माया का मतलब हैः या मा सा माया। जो है नहीं फिर भी दिखे उसका नाम है माया। यह जो कुछ भी दिखता है वह नहीं है। जो नहीं है वह दिख रहा है और जो है वह दिखता नहीं है।

जो है वह दिखता क्यों नहीं? क्योंकि वह अव्यक्त है और हम लोग जीते हैं व्यक्त में। हम लोग व्यक्त होने वाले को मैं मानते हैं तो व्यक्त सच्चा लगता है लेकिन जिसके आधार पर है, उसका पता नहीं।

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नमस्कार की महिमा

 

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नमस्कार की महिमा

प्रतिदिन सुबह-शाम माता-पिता एवं गुरुजनों के चरणों में प्रणाम करना चाहिए। नमस्कार की बड़ी महिमा है।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य बर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोबलम्।।

जो प्रतिदिन बड़ों की सेवा करता है, उनके चरणों में प्रणाम करता है एवं उनकी सीख के अनुसार चलता है उसकी आयुष्य, विद्या, यश एवं बल चारों बढ़ते हैं।

मृकन्डु नामक ऋषि थे। उनके पुत्र थे मार्कण्डेय। वे बाल्यकाल से ही पिता के संस्कार-सिंचन के अनुसार माता-पिता, गुरूजनों एवं संत-महात्माओं को नमस्कार करते। एक बार कोई सिद्ध महात्मा उनके यहाँ आये। पिता ने बालक मार्कण्डेय से कहाः”बेटा ! महात्माजी को प्रणाम करो।”

बालक मार्कण्डेय ने झुककर चरणस्पर्श किया एवं सिद्धपुरुष की चरणरज को सादर मस्तक पर चढ़ाया। महात्मा उस बालक को एकटक देखते रहे मानो, उसके भावी जीवन पर दृष्टिपात कर रहे हों ! ऋषि ने पूछाः

“महाराज ! आप इस प्रकार एकटक क्या देख रहे हैं ?”

“बालक तो सुंदर है किंतु इसकी आयु अब बहुत ही कम शेष है।”

इतना कहकर उन सिद्धपुरुष ने पुनः विषादपूर्ण नेत्रों से बालक की तरफ निहारा।

ऋषि तो अपने लाडले पुत्र के विषय में यह दुःखद बात सुनकर हक्के-बक्के रह गये ! उन्होंने हाथ जोड़कर महात्मा से विनती कीः

“प्रभो ! इसका कोई उपाय ?”

“जो भी संत-महापुरुष आयें, ऋषि-मुनि आयें, उनके चरणों में इस बालक से प्रणाम करवाओ।” यह कहकर सिद्धपुरुष चल पड़े। मृकण्डु ऋषि ऐसा ही करवाने लगे। एक दिन सप्तऋषि पधारे। पिता ने बालक से प्रेम से कहाः “बेटा ! ऋषियों को नमस्कार करो।”

मार्कण्डेय ने खूब भावपूर्वक प्रणाम किया। सप्तऋषियों ने बालक के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दियाः “चिरंजीवी हो।”

पिता ने कहाः “महाराज ! इसकी आयु कम है एवं इसको आपके द्वारा चिरंजीवी होने का आशीर्वाद मिला है। प्रभो ! अब आपके आशीर्वाद के अनुकूल होने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?”

“अब ऐसा करो, इस बालक को भगवान शंकर की सेवा में, पूजा-आराधना-उपासना में लगा दो। सब ठीक होगा।”

मृकण्डु ऋषि ने बालक मार्कण्डेय को देवाधिदेव महादेव की उपासना-आराधना में प्रवृत्त कर दिया। निर्दोष बालक मार्कण्डेय शिवजी की सेवा-पूजा में मग्न हो गया। प्रातःकाल जल्दी उठकर, स्नानादि से पवित्र होकर वह भगवान शिव के लिंग को स्नान कराता, बिलिपत्र, फल-फूल, धूप-दीप, नैवेद्य आदि चढ़ाता, प्रार्थना कराता, आसन पर बैठकर हाथ में माला लेकर ॐ नमः शिवाय का जप करता, ध्यान करता, स्तुति-स्तोत्रों का गान करता। इस प्रकार समय बीत रहा था।

मृत्यु की घड़ियाँ निकट आ गयीं। काले विकराल भैंसे पर लाल-लाल वर्णवाले यमराज प्रगट हुए। उन्हें देखकर बालक डर गया। घबराकर भगवान शंकर के लिंग को आलिंगन करके कहने लगाः “हे भगवान ! ये यमराज आ गये। बचाओ…. बचाओ।”

भगवान शंकर हाथ में त्रिशूल लेकर प्रगट हो गये एवं यमराज से बोलेः

“इस बालक को कहाँ ले जाते हो ?”

यमराजः “महाराज ! इसकी आयुष्य पूरी हो गयी है। सृष्टि के क्रम के अनुसार मैं अपने कर्त्तव्य का पालन करने आया हूँ।”

“अरे यमराज ! देखो तो अपने बहीखाते में…. इसकी आयु कहाँ पूरी हुई है ?”

यमराज ने बहीखाता देखा तो बालक के खाते में लंबी आयु जमा देखी। सृष्टि का सहार करने वाले देवाधिदेव योगीश्वर पशुपतिनाथ जिसका रक्षण करें उसका कोई बाल तक बाँका कैसे कर सकता है ?

“चलो, भागो यहाँ से” रूद्र गरज उठे। यमराज ने विदा ली। मार्कण्डेय चिरंजीवी बन गये। किसके प्रभाव से ? नमस्कार के प्रभाव से। ऐसी महिमा है नमस्कार की !

नमस्कार से रामदास, कर्म सभी कट जाय।

जाय मिले परब्रह्म में, आवागमन मिटाय।।

प्रतिदिन सुबह माता-पिता एवं पूजनीय-आदरणीय गुरुजनों को नमस्कार करो, प्रणाम करो। उनके आशीर्वाद लो। बड़े भाई, बड़ी बहन को भी नमस्कार करो। घर में यदि बड़े लोग इस नियम को अपनायेंगे तो छोटे बालक स्वयं ही उसका अनुकरण करेंगे। परस्पर नमस्कार करने से कुटुम्ब में दिव्य भावनाएँ प्रबल होंगी तो लड़ाई-झगड़ों एवं कटुता के लिए अवकाश ही नहीं रहेगा। संयोगवशात् यदि कुछ खटपट होगी भी तो लंबी नहीं टिकेगी। परिवार का जीवन मधुर बन जायेगा। परमार्थ साधना सरल हो जायेगा।

हजारों जन्म मेंढक की योनि….

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हजारों जन्म मेंढक की योनि

स्वामी विवेकानन्द की तेजस्वी और अद्वितिय प्रतिभा के कारण कुछ लोग ईर्ष्या से जलने लगे। कुछ दुष्टों ने उनके कमरे में एक वेश्या को भेजा। श्री रामकृष्ण परमहंस को भी बदनाम करने के लिए ऐसा ही घृणित प्रयोग किया गया, किन्तु उन वेश्याओं ने तुरन्त ही बाहर निकल कर दुष्टों की बुरी तरह खबर ली और दोनों संत विकास के पथ पर आगे बढ़े। शिर्डीवाले साँईबाबा, जिन्हें आज भी लाखों लोग नवाजते हैं, उनके हयातिकाल में उन पर भी दुष्टों ने कम जुल्म न किये। उन्हें भी अनेकानेक षडयन्त्रों का शिकार बनाया गया लेकिन वे निर्दोष संत निश्चिंत ही रहे।

पैठण के एकनाथ जी महाराज पर भी दुनिया वालों ने बहुत आरोप-प्रत्यारोप गढ़े लेकिन उनकी विलक्षण मानसिकता को तनिक भी आघात न पहुँचा अपितु प्रभुभक्ति में मस्त रहने वाले इन संत ने हँसते-खेलते सब कुछ सह लिया। संत तुकाराम महाराज को तो बाल मुंडन करवाकर गधे पर उल्टा बिठाकर जूते और चप्पल का हार पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया, बेइज्जती की एवं न कहने योग्य कार्य किया। ऋषि दयानन्द के ओज-तेज को न सहने वालों ने बाईस बार उनको जहर देने का बीभत्स कृत्य किया और अन्ततः वे नराधम इस घोर पातक कर्म में सफल तो हुए लेकिन अपनी सातों पीढ़ियों को नरकगामी बनाने वाले हुए।

हरि गुरु निन्दक दादुर होई।

जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

ऐसे दुष्ट दुर्जनों को हजारों जन्म मेंढक की योनि में लेने पड़ते हैं। ऋषि दयानन्द का तो आज भी आदर के साथ स्मरण किया जाता है लेकिन संतजन के वे हत्यारे व पापी निन्दक किन-किन नरकों की पीड़ा सह रहे होंगे यह तो ईश्वर ही जाने।

कदाचित् इसीलिए विवेकानन्द ने कहा थाः “जो अंधकार से टकराता है वह खुद तो टकराता ही रहता है, अपने साथ वह दूसरों को भी अँधेरे कुएँ में ढकेलने का प्रयत्न करता है। उसमें जो जागता है वह बच जाता है, दूसरे सभी गड्डे में गिर पड़ते हैं।

 

संत आशारामजी बापू का समर्थन नरेन्द्र मोदी को ? जानिये सच !

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क्या पूज्य संत श्री आशारामजी का समर्थन श्री नरेन्द्र मोदी को है ? हमारे अनुसार शत प्रतिशत है !

यदि ऐसा न होता तो पूज्य श्री के आश्रम से प्रकाशित मासिक पत्रिका “c”  में मोदी जी के लिये क्या इतने सराहनीय शब्द होते ?

“ऋषि प्रसाद” में उनके माध्यम से भारत को विश्व गुरु के पद पर आसीन करने की भी बात की गयी है !

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