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निजस्वरूप का बोध

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निजस्वरूप का बोध

तरंगे सागर में लीन होने लगती है तो वे अपना तरंगपना छोड़कर जलरूप हो जाती है। हमारी तमाम वृत्तियों का मूल उदगम्-स्थान…. अधिष्ठान परमात्मा है। हम यह शरीरधारी हैं…. हमारा यह नाम है…. हमारी वह जाति है….. हमारे ये सगे-सम्बन्धी हैं…. हम इस जगत में रहते हैं…. ये तमाम प्रपंच हमारी वृत्तियों के खेल हैं। हमारी वृत्ति अपने मूल उदगम्-स्थान आनन्दस्वरूप परमात्मा में डूब गई, लीन हो गई तो न यह शरीर है न उसका कोई नाम है, न उसकी कोई जाति है, न उसके कोई सगे सम्बन्धी हैं और न कोई जगत ही है। केवल आनंदस्वरूप परमात्मा ही परमात्मा है। वह परमात्मा मैं हूँ। एक बार यह सत्य आत्मसात हो  गया, भली प्रकार निजस्वरूप का बोध हो गया, फिर चाहे करोड़ों-करोड़ों वृत्तियाँ उठती रहें, करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड बनते रहें….. बिगड़ते रहें फिर भी उस बुद्ध पुरुष को कोई हानि नहीं।

सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

रामकृष्ण परमहंस को तो कई शिष्य मानते थे लेकिन शिष्यों की जितनी योग्यता थी उसके अनुसार उनको लाभ मिला। लाभ तो सबको अवश्य मिलता है। बरसात कैसे होती है हम सब जानते हैं। सूरज की तपन से सागर का पानी वाष्पीभूत होता है। पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है, बादल बनते हैं, ठण्डे होकर बरसात के रूप में बरसते हैं।

सागर का पानी अगर स्वाति नक्षत्र में बरसात बनकर गिरता है और इसकी एक बूँद सीप के मुँह में पड़ जाती है तो सागर के गर्भ में जाकर समय पाकर वह बूँद मोती बन जाती है। है तो सागर का पानी। लेकिन बादल के जरिये जब बरसता है तो मोती में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि पात्र सीप मिल गई और स्वाति नक्षत्र का संयोग मिल गया।

ऐसे ही अमर स्वाति नक्षत्र रूपी सदगुरु हों और सीप रूपी सत् शिष्य हो तो यहीं संसार रूपी सागर की बातें लेकर संसार के गर्भ में ही शिष्य के हृदय में परमात्मा रूपी मोती पका सकते हैं वे महापुरुष।

है तो सागर का पानी। बादल बनकर बरसता है तो कहीं गंगा बनता है कहीं यमुना, कहीं नर्मदा बनता है कहीं गोदावरी, कहीं और कोई नदी कहीं नाला, कहीं सरोवर कहीं बाँध। वही पानी सागर में बरसता है तो खारा बन जाता है और स्वाति नक्षत्र में सीप के मुँह में पड़ता है तो मोती बन जाता है।

किसी सत्संग समारोह की पूर्णाहुति करते समय एक राजनेता ने घोषणा कीः “सब धर्मों का ज्ञान देनेवाले, दिव्य भक्ति, योग, ज्ञान से परिपूर्ण गुरु महाराज पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज का प्रवचन सुनकर हम लोग पवित्र हुए। लेकिन इस आयोजन को तो मैं सफल तब मानूँगा कि जब सब लोग पू. बापू की बातों पर अमल करें…….।”

मैंने देखा कि यह गड़बड़ कर दी। सब लोग अमल नहीं करेंगे तो क्या आयोजन व्यर्थ हो गया ? मैंने उनको रोककर कहाः

“सत्संग तो बरसात है। बरसात का जल सीप के मुँह में गिरे तब भी सफल है और किसी पहाड़ी पर गिरे तब भी सफल है। बरसात कभी व्यर्थ नहीं जाती। और जगह तो ठीक लेकिन डामर की सड़क पर जहाँ कोई खेती वेती नहीं होती वहाँ बरसात पड़ती है तो गोबर और डीजल के दाग तो धुलते ही हैं। ऐसे ही कठोर हृदय पर भी सत्संग की बरसात पड़े तो पाप के दाग धुलते हैं।”

सत्संग का आयोजन तो सफल होगा। लोग अमल करें तो मोती पकायें। अमल नहीं भी करें तो दिल रूपी सड़क तो साफ हो ही गई भैया ! आयोजन सफल ही है।

जरूरी नहीं कि सब के सब लोग अमल करके भगवान का साक्षात्कार कर लें। भगवान का साक्षात्कार कर लें तो बेड़ा पार है और नहीं भी करें, केवल सुनते हैं तो भी हृदय कोमल बनता है। अहंकार रूपी डीजल के दाग धुलते हैं, मोह रूपी गोबर धुलता है। दिल अगर कठोर भी होता है तो उसमें कुछ न कुछ तो फर्क पड़ जाता है। कुछ न कुछ तो स्वच्छ हो ही जाता है।

सत्संग रूपी अमृत कठोर दिल रूपी सड़क पर गिरता है तो भी काम करता है और खेड़ी हुई ऊर्वरा भूमि की तरह भक्ति भाव के संस्कारों से युक्त हृदय पर सत्संग-अमृत की वृष्टि होती है तो भगवद भक्ति के फल उगते हैं। अगर ज्ञान के संस्कारवाले दिल पर सत्संग की बरसात होती है तो वहाँ ज्ञान रूपी फल लगते हैं। योगाभ्यासी के हृदय में योगसिद्धि रूप फल लगते हैं। सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं-

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध।।

चालू खट-खट में अपना काम बना लो।

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आप श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं तो कीजिये, अल्लाह का चिन्तन करते हैं तो कीजिए, झूलेलाल का चिन्तन करते हैं तो कीजिये और यदि सदगुरु प्राप्त हैं, बुद्धि विकसित है, श्रद्धा है, पुण्य है तो चिन्तन कीजिये किः “शिवोऽहम्…. सच्चिदान्दोऽहम्… आनन्दस्वरूपोऽहम्….वाह वाह ! मैं गुरु होकर उपदेश दे रहा हूँ… शिष्य होकर सुन रहा हूँ…. सब मेरे ही रूप हैं। मैं श्रीकृष्ण होकर आया था, बुद्ध होकर आया था, महावीर होकर आया था। अनेक शरीर आ जायँ और मर जायँ, मिट जायँ, फिर भी मेरा नाश नहीं होता। क्योंकि अनन्त शरीरों में मैं ही हूँ…..ॐ….ॐ….ॐ….. आपके लिये यह मार्ग उत्तम हो सकता है।

आपके चिन्तन का सातत्य कहाँ है यह बात महत्त्व की है। चालू व्यवहार में भी वह अनुसंधान बना रहे तो मंजिल जल्दी तय हो जाती है।

स्वामी रामतीर्थ एक घटना सुनाया करते थे। ब्रिटिश सरकार के जमाने की बात है। एक सरकारी अमलदार घोड़े पर कहीं जा रहा था। रास्ते में घोड़े को प्यास लगी तो पास में कुएँ पर जहाँ अरट चल रहा था वहाँ पानी पिलाने गया। अरट चलने से आने वाली खट…. खट…. खट… खट…. आवाज सुनकर घोड़ा बिदक गया।। उसने पानी नहीं पीया। वह भी साहब का घोड़ा था, अहंकारी का घोड़ा था

आदमी जितना अहंकारी होता है उतना भीतर से डरपोक होता है, जितना विषयी होता है उतना ज्यादा भयभीत होता है।

मेरे पास एक महिला आयी और बोलीः

बापू ! मेरे पास हीरे-जवाहरात के गहनों के सात सेट हैं। हररोज अलग-अलग सेट पहनती हैं। एक सेट करीब लाख-डेढ़ लाख का होता होगा। और तो सब कुछ है लेकिन जीवन में शांति नहीं है, हृदय में सुख-चैन नहीं है।

इतने में कुछ आवाज आयी तो वह चौकन्नी हो गई, डर गई। मैंने पूछाः बहन ! इतना डरती क्यों है?”

बाबाजी ! मैं क्या बताऊँ? मुझे बहुत डर लगता है। क्या कारण है, पता नहीं। छिपकली को देखकर भी मेरी धड़कन बढ़ जाती है।

मैंने कई बार निरीक्षण किया है कि व्यक्ति का जीवन जितना विलासी होता है, धन-वैभव-संपत्ति से आक्रान्त होता है उतना वह भीतर से खोखला होता है, भयभीत होता है।

उस अमलदार ने किसान को हुक्म कियाः इस खट-खट आवाज को बन्द कर। किसान ने अरट चलाना बन्द कर दिया। खट-खट तो बन्द हो गई लेकिन साथ में पानी भी आना बन्द हो गया। अमलदार चिढ़कर बोलाः मैंने अरट की खट-खट आवाज बन्द करने को कहा था, पानी बन्द करने को नहीं कहा था।

साहब मेरे ! गुस्ताखी माफ हो। पहले खट-खट होगी, बाद में पानी निकलेगा। यदि आपके घोड़े को प्यास लगी हो तो चालू खट-खट में ही उसे पुचकारकर पानी पिला दो। चालू खट-खट में ही अपना काम बना लो।

हाँ, आप भी चालू खट-खट में अपना काम बना लो। चाहे साकार में या निराकार में, जिसमें आपकी प्रीति हो उसमें मन लगा दो। इस मिथ्या जगत के आकर्षणों से बचकर संसारसागर से पार हो जाओ।

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