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यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

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यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है।

संसार की कोई भी चीज केवल देखने भर को तथा कहने भर को ही हमारी है, आखिर में तो छूट ही जायेगी। जब चीज छूट जाय तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उससे पहले ही उसकी असारता को समझकर उससे ममता हटा लें। जो छूटने वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें। व्यक्ति का ऐसा विवेक जग जाय तो बेड़ा पार हो जाय।

जिसके जीवन में विवेक नहीं है उसका जीवन नश्वर भोगों और ऐहिक आपाधापी में खत्म हो जाता है, बर्बाद हो जाता है। अंत में कुछ भी हाथ नहीं लगता तब वह पछताता है। मनुष्य को चाहिए कि अपनी विवेकदृष्टि सदा जागृत रखकर सफल जीवन जीने का यत्न करे। विवेकी मनुष्य किसी भी ऐहिक चीज-वस्तु या परिस्थिति में उलझेगा नहीं। धन हो, सत्ता हो, सामर्थ्य हो, मित्र-परिवार हो – सर्व प्रकार के ऐहिक सुख हों पर विवेकी उनसे चिपकेगा नहीं, उनका उपयोग करेगा। मूर्ख आदमी उनमें आसक्त हो जायेगा, ‘मोर-तोर’ की जेवरी (‘मेरे-तेरे की रस्सी) में बँध जायेगा फिर अंतकाल में पछतायेगा।

एक रात राजा भोज अपने सर्वाधिक आरामदायक एवं मणियों से जड़े बहुमूल्य पलंग पर विश्राम कर रहे थे। अपने जीवनकाल में किये सर्वोत्कृष्ट कार्यों एवं महान उपलब्धियों पर उन्हें बहुत अभिमान हो रहा था। मानवहित के लिए उन्होंने अनेक उपयोगी कार्य किये थे, विविध लोकोपयोगी योजनाओं को कार्यान्वित किया था और प्रजा भी उन्हें भूदेव अर्थात् धरती का देव मानती थी।

वे विद्वानों का बहुत आदर करते थे एवं उनके विचारों, विशेषतः उनकी काव्य-रचनाओं को सुनकर उन्हें खूब पुरस्कार देते थे। काव्य-प्रेम और मानवता की सेवा उनके चरित्र के गौरव में सदैव वृद्धि करते रहते थे।

उनका कवि-हृदय कल्पनालोक में हिलोरें ले रहा था। मन में भाव आया कि ‘मनुष्य जीवन लोकहित के लिए ही प्राप्त हुआ है और मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि अपनी प्रजा की भलाई में लगा रहता हूँ तथा मेरी प्रजा भी मेरे कार्यों से प्रसन्न है।”

संयोग से पलंग पर लेटे-लेटे काव्य की कुछ पंक्तियाँ भाव-जगत में खोये उन कवि के हृदय में गंगाजी की तरंगों की भाँति लहराने लगीं और वे भाव-विभोर होकर गुनगुनाने लगेः

चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः।

‘अहा ! मुझे चित्त को मयूर की भाँति नृत्य से लुभाने वाली सुंदर कमनीय युवतियों का अक्षय प्यार और स्वभावानुकूल स्नेही मित्र के संग का सुख मिला है, मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ !”

इस पंक्ति को दोहरा-दोहराकर वे आत्मगौरव का अनुभव कर रहे थे। इन्द्रियसुख पाकर मनुष्य को अभिमान हो जाता है। फिर वह अहं-तृप्ति में ही सुख का अनुभव करता है।

राजा भोज सोच रहे थे कि ‘किसी राजा को वह ऐश्वर्य नहीं मिला जो मुझे प्राप्त है। मेरे भाग्य में कितना अक्षय आनंद भरा हुआ है !’ और इसी मिथ्या अतिशयानंद से उनके मन में कविता की एक और पंक्ति लहराने लगी। वे बोल उठेः

सद् बान्धवाः प्रणतिमगर्भगिरश्च भृत्याः।

‘अपने निजी स्नेही बंधुओं का साहचर्य और अनुरागी सेवकों की अटूट सेवावृत्ति मुझे मिली है, वाह ! मेरा कितना अहोभाग्य है !’

वे उपरोक्त दोनों पंक्तियों का पुनः-पुनः गर्व से उच्चारण करते रहे और अधिकाधिक हर्ष-विभोर होते गये। कवि का हृदय कल्पनाओं का भंडार होता है और इसी कल्पना के संसार में उनका काव्य-निर्माण आगे बढ़ा।

कुछ देर और विचारमग्न हो वे तीसरी पंक्ति यों कहने लगेः

गर्जन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरंगाः।

”मेरे द्वार पर गर्व और शक्ति से सम्पन्न चंचल घोड़े हिनहिनाते हैं तथा बड़े-बड़े दाँतों वाले मदमत्त हाथी चिंघाड़ते हैं। अहो ! मैं सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न हूँ। मेरे ऊपर भगवान की असीम कृपा है। मुझे अपने अद्वितीय भाग्य पर गर्व है ! मैं कितना भाग्यशाली हूँ !”

फिर तीनों पंक्तियों को एक साथ जोड़कर वे बार-बार हर्षित मन से उच्च स्वर में गाने लगे। बहुत देर तक वे काव्य की चतुर्थ पंक्ति जोड़ने का प्रयत्न करते रहे पर सफल न हो पाये।

अहंकार का विकार मनुष्य की नैतिक शक्ति का क्षय कर देता है, उसे हिंसा और विनाश के पथ पर ले जाता है। उसके अंदर का स्वार्थ उसे प्रत्येक कार्य, बातचीत, आचार-व्यवहार से दूसरों पर अत्याचार करने के लिए उत्साहित करता है। वह काल्पनिक जगत में रहने लगता है।

राजा भोज मन ही मन अपने काव्य-जगत में विचरण कर रहे थे। अपने को हर प्रकार से धन्य समझ मिथ्या गर्व में चूर थे परंतु काव्य गी चौथी पंक्ति नहीं बन पा रही थी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।

उनके पलंग के नीचे छिपे एक निर्धन, संस्कृत के कवि उदभट्ट से और अधिक छिपा तथा चुप न रहा गया। लक्ष्मी जी सदा उनसे रुष्ट ही रहती थीं। वे राजा भोज से कुछ दान-दक्षिणा की याचना करने आये थे किंतु दण्ड के भय से पलंग के नीचे छिपकर ही रात काट रहे थे। वे भी संस्कृत के सिरमौर काव्यधर्मी थे। वे राजा के मिथ्या दर्प को सहन न कर सके और उन्होंने छिपे-छिपे नीचे से चौथी पंक्ति बोलीः

सम्मीलने नयनयोर्नहि किंचिदस्ति।

‘हे राजन् ! यह ठीक है कि आपको अपने सत्कार्यों तथा पुण्यों से ये सब लौकिक सम्पदायें और सुख वैभव प्राप्त हो गये हैं। आज आपको सांसारिक आनंद-उपभोग के समस्त भौतिक साधन भी उपलब्ध हैं, किंतु जीवन के अंतिम समय में जब मृत्यु की छाया में मनुष्य के नेत्र बंद होने लगते हैं, तब उसके पास कुछ भी नहीं रहता।

हे उदार-शिरोमणि ! यह सांसारिक सुख-वैभव तो क्षणिक एवं अस्थिर है। इन सब सम्पदाओं में स्थायी रूप से आपके साथ रहने वाला कुछ भी नहीं है। सदा आपके साथ रहने वाला, शास्वत, अनादि अनंत तो आपका अपना आत्मा ही है और उसका ज्ञान ही सदा टिकने वाली सम्पदा है।

क्षमा करें राजन् ! आपको अहंकार के क्षुद्र काल्पनिक जगत से निकालकर ठोस वास्तविकता की ओर आपका ध्यान दिलाने के नैतिक कर्तव्य ने मुझे यह चौथी पंक्ति जोड़ने पर विवश कर दिया।”

विनीत भाव से यह कवि उदभट्ट बाहर निकलकर राजा के सामने खड़े हो गये। उनके शब्द राजा भोज के अंतर्मन में गहरे उतर गये। राजा मोह-निद्रा से जाग उठे। उनका विशुद्ध, निर्मल विवेक जागृत हुआ और वे नश्वर वैभव का क्षुद्र अहं त्यागकर शाश्वत पद की प्राप्ति के मार्ग पर चल पड़े।

अविनाशी आतम अमर, जग तातें प्रतिकूल।

ऐसी ज्ञान विवेक है, सब साधन को मूल।।

आत्मा सत्, चित्त और आनन्दस्वरूप है तथा शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अमर, अपरिवर्तनशील है और शरीर मरणधर्मा, परिवर्तनशील है-ऐसा विवेक जिसका जग गया है वह परम विवेकी है।

‘श्रीरामचरितमानस’ में आता हैः

जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब विषय बिलास बिरागा।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

जगत में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिए जब उसे सम्पूर्ण भोग-विलासों से वैराग्य हो जाय। विवेक होने पर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, तब (अज्ञान का नाश होने पर) भगवान के चरणों में प्रेम होता है। मन, वचन और कर्म से भगवान के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ (पुरुषार्थ) है। (अयो.कां. 92.2-3)

 

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संस्कृत : समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी

क्या आप जानते हैं ?

समस्त मानवों के आचार – विचार और उच्चारों की जननी – संस्कृत ……….

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विविध भाषाओँ की स्त्रोत “संस्कृत” भाषा के संबंध में प्रचलित सभी धारणाएं भ्रमपूर्ण हैं |

वर्तमान में पाश्चात्य सिद्धांतों को अधिक मान्यता प्राप्त है, क्योंकि “जिसकी लाठी उसकी भैंस ” | पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति के अन्धानुकर्ता यह समझ बैठे हैं कि “ग्रीक”,“लैटिन”,“संस्कृत तीनों किसी न किसी प्राचीन भाषा की संतान हैं | हमारी ज्येष्ठ भाषा “संस्कृत“का तो वे नाम भी ढंग से नहीं जानते, अतः अपनी काल्पनिक “जननी भाषा” को”इंडो – यूरोपियन” ऐसा ऊटपटांग नाम देकर काम चला लेते हैं | वास्तव में समस्त भाषओं की जननी संस्कृत ही है |

दूसरा भ्रम उन्हें “संस्कृत” नाम के निर्माण से हुआ है | पाश्चात्य लोग कहते हैं कि “संस्कृत-यानी अच्छी गढ़ी हुई भाषा” | ऐसा वो इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका मानना है कि “संस्कृत” किसी अन्य भाषा से बनी भाषा है , ठीक उसी प्रकर जैसे निराकार पत्थर से मूर्ति बनती है | लेकिन वास्तव में “संस्कृत” शब्द का अर्थ है कि जो भाषा, ईश्वर द्वारा निर्मित होने के कारण अच्छी बनी हुई है | अतः संस्कृत किसी अन्य कच्ची या अधपकी भाषा से बनी है यह बिल्कुल बेबुनियाद व आधारहीन तर्क हैं |

The Science of Sanskrit Language Explained by Rajiv Dixit

पाश्चात्य विचारधारा के अनुसार प्राचीनकाल का मानव वानर था जो कि बर्बर प्रकृति था | तो सोच का विषय है कि ऐसी अवस्था का मानव भला संस्कृत जैसी भाषा कैसे बना पाता ? सच तो यह है कि संस्कृत के टूट- फूट जाने से ही अन्य प्रादेशिक भाषाएँ बनी हैं न कि प्राकृति भाषाओं से संस्कृत बनी है |

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“प्राकृति” शब्द की रचना ‘प्र’ व ‘आकृति’ की संधि से हुयी है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि “प्राकृति” वे भाषाएँ हैं जिन्हें किसी अन्य मूल भाषा से आकार प्राप्त हुआ है | संस्कृत भाषा के टूट जाने पर उसका व्याकरण भी टुकड़ों – टुकड़ों में अन्य भाषाओँ में बंट गया | अतः पाणिनि का ही व्याकरण अन्य सभी भाषाओँ पर लागू हुआ है | संस्कृत जैसी आप्राकृतिक भाषा मानव बना ही नहीं पाता | मानव का हाथ लगते ही वस्तुएं दूषित हो जातीं हैं | इसका उदाहरण है – आजकल कारखानों में जो भी खाद्यसामग्री अथवा दवाइयां बनतीं हैं, वे एकदम :”शुद्ध” हैं, यह जताने के लिए उन पर लिखा होता है “Untouched by any Human hand” अर्थात् किसी भी व्यक्ति के हाथ स्पर्श बिना बनी वस्तु’ |

 

रॉयल एशियाटिक सोसायटी, लंदन में पढ़े गये, एक वक्तृत्व में कहा गया है कि “बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जिस भारत के ऊपर कई क्रुद्ध आक्रामकों का आक्रमण होता रहा जिनके पद चिन्ह उस भूमि पर पाए जाते हैं, उसी भारत में समय और शासन बदलते रहने पर भी एक भाषा ऐसी टिकी हुई है कि उसके विभिन्न पहलुओं और वैभवता की कोई सीमा नहीं; जो “ग्रीक”, “लैटिन” जैसी मान्यता प्राप्त यूरोपीय भाषायों की जननी है तथा जो “ग्रीक” से भी लचीली और “रोमन” भाषा से भी सशक्त है | यह वह भाषा है जिसके दर्शनशास्त्र की तुलना में पायथागोरस के कथन “कल जन्मे हुए शिशु” जैसे बालिश लगते हैं; जिसकी वैचारिक उड़ान के आगे प्लेटो की ऊँची से ऊँची कल्पनाएँ निष्प्रभावित और समान्य सी लगती हैं; जिसके काव्यों में व्यक्त प्रतिभा अकल्पित – सी है और जिसके शास्त्रीय ग्रन्थ तो इतने प्राचीन हैं कि उनका कोई अनुमान ही नहीं लगा पाया और शायद आगे लगा भी नहीं सकता | संस्कृत का सारा साहित्य इतना विपुल और विशाल है कि उसका तो जितना वर्णन किया जाये, उतना कम ही पड़ेगा | उसके सहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान है | उसकी पौराणिक कथाओं की तो सीमा ही नहीं है | उसके दर्शनशास्त्र में हर प्रकार की समस्या या पहेली का विचार किया गया है तथा वैदिक समाज के प्रत्येक वर्ण और वर्ग के लिए उसके धर्मशास्त्र के नियम बने हुए हैं |”

 

Panini’s Sanskrit Grammar in Computational Linguistics goes uncredited? – Rajiv Malhotra

“Indian Antiquities” नाम का सात खंडों का ग्रन्थ, जिसके सम्पादक थॉमस मॉरिस हैं, सन् 1792 से 1800 तक प्रकाशित हुआ | उसके चौथे खंड के पृष्ठ 415 पर उल्लेख है कि – “Hollhead का सुझाव है कि संस्कृत भाषा ही पृथ्वी की मूल भाषा है |”

देश – विदेश के अन्य विद्वान् भी यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो वे भी इस निष्कर्ष पर पहुचेगें कि संस्कृत ही विश्व – भर के मानवों कों देवों ने भेंट स्वरूप दी है | वह भाषा किसी मानव द्वारा बनाई नहीं गई , बल्कि अन्य भाषाएँ का उद्गम “संस्कृत” से हुआ है |

हमारे देश के प्रशासन को भी इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए तथा भारत के युवाओं को भी अपने देश की प्राचीन भाषा और संस्कृति की अस्मिता और पहचान कायम रखने के लिए कदम बढ़ाना होगा; अन्यथा हम अपनी वैदिक भाषा मात्र किताबों में बंद किसी प्रदर्शनी में ही देख पायेगें |

read at ; http://nextfuture.aurosociety.org/sanskrit

 

Myths about Sanskrit

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