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सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष….

asaramji
सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष….

भगत जगत को ठगत है जगत को ठगत न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।

सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों का खजाना क्यों लूटें ? नहीं…। नहीं….। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।

एकनाथ जी कहते हैं- “भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।”

“नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?”

कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।

उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।

एकनाथ जी ने कहाः “देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?”

“नहीं महाराज ! “गोदावरी माता की जय….’ करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय…. बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।”

चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः “अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?…. और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !

साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।”

कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।

जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं।

अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः।

अब शब्द आता है गतव्यथः। व्यथा से रहित।

एक सेठ के चार बेटे थे। तीन तो सुबह जल्दी उठ जाते थे, चौथा आलसी-प्रमादी था। सूर्योदय होने के बाद देरी से उठता था। सेठ व्यथित हो जाते थे। आप बेटे को जल्दी उठाओ, नहीं उठे तो अपने हृदय को व्यथित मत करो। ‘बेटा नहीं मानता… बेटी नहीं मानती…. बहू नहीं मानती…. यह नहीं होता…. वह नहीं होता…।’ ऐसा करके छोटी-छोटी बातों में आप अपने हृदय को व्यथित कर देते हैं, व्यग्र कर देते हैं, शोकाकुल कर देते। व्यथित होना यह दक्षता से गिरना है। हृदय को व्यथित करने से अपनी ही शक्ति क्षीण होने लगती है। आप संतानों को अनुशासन में चलाओ। इसमें शास्त्र संमत है किन्तु आप व्यथित होकर अपने बच्चों, नौकरों को सुधारने लगोगे तो वे सुधरेंगे नहीं, बगावत नहीं करेंगे।

बाबाजी सेठजी के साथ कार में जा रहे थे। ड्राईवर ने एकदम से मोड़ ले लिया। सेठ जी ने उसे डाँटाः

“बदतमीज ! यह क्या कर रहा है ? अभी गाड़ी को ठोकर लग जाती ! हार्न बजाना चाहिए था !… ” इत्यादि। आग-बबूला होकर सेठ जी बरस पड़े।

बाबाजी ने धीरे से कहाः “सेठजी ! यह क्या कर रहे हो ?”

“मैं इस कम्बख्त को सुधार रहा हूँ।”

“आप अपना दिल बिगाड़कर उसे सुधार रहे हो तो वह कैसे सुधरेगा ?”

आप अपना दिल मत बिगाड़ो। अपने को व्यथित करके किसी को सुधारेगा तो वह नहीं सुधरेगा।

पहले अपना दिल पावन कर लो, प्यार से भर लो, कल्याण से भर लो। दिल को व्यथा में मत भरो। प्यार से लोगों को सुधरने का मौका दो और परिणाम रूप फल की आशा मत करो। फिर देखो, ईश्वर क्या नहीं करवाता।

 

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कृष्ण लीला – पूनम व्रतधारी विशेष – ब्रह्मचर्य

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काली माँ  की उपासना करनेवाले  बहादुर गदाधर  ठाकूर  ने पत्नी शारदा को फिर जीवन भर भोग्या नही माना… ( शारदा जी के पैरों में उन को माँ  के चरणों के दर्शन हुए थे इसलिए गदाधर ठाकुर अर्थात रामकृष्ण परमहंस..) ब्रम्हचर्य  व्रत पालते पालते कई ब्रम्हचारी फिसल जाते…लेकिन स्री  साथ में पत्नी रूप में आई और ब्रम्हचर्य   पालन जीवन भर किया…कैसी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था है!..की आप के भाव को बादलो…

विदेश में फ्राइड नाम के मनो वैज्ञानिक  के सिद्धांत  से गुमराह हो गये है लोग…पुत्री पिता की तरफ और पुत्र माता की तरफ काम विकार से आकर्षित होते है ऐसा उस का सिद्धांत  था…लेकिन ये फ्राइड के खुद के जीवन में हुआ होगा, ऐसा सब के जीवन में नही होता..ये उस ने अपने उग्रवादी वमन से जो लिखा है उस से सारा पाश्चात्य  जगत तबाह हो गया… ‘सम्भोग  से समाधि’ का भाषण करने वाला अपना भारत का विद्वान भी फ्राइड का मनोविज्ञान  पढ़ता था… 
भारतीय संस्कृति में ऐसा नही है…दुल्हन के वस्त्र  पहेन  के पुत्री जब ससुराल जाती है सजी धजी तब पिता के गले लगती है…क्या बेटी में पिता के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा उस समय?….अथवा पिता का पुत्री के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा पुत्री के प्रति?…..नही नही..ये तो मेरी लाडली पुत्री है..ये मेरे पिता है जिन्हों ने मुझे जनम दिया,पाल पोस  कर बड़ा किया,सुंदर संस्कार दिए…कितने कितने सुंदर भाव होते है पिता और पुत्री के एकदुसरे के प्रति.. ‘भावग्राही  जनार्दन!’ …आप जैसा भाव करते वो  जनार्दन हरि  आप को उसी में मदद करते है…भाव का महत्व है…
अभी भी आप आसपड़ोस को माईयों को विकारी नज़र से देखो तो आप को स्वपनदोष हो सकता है..
गदाधर ठाकुर अपनी विवाहिता विधिवत की पत्नी में  माँ का दृढ़ भाव किए तो जीवन भर ब्रम्हचर्य पालन में सफल हुए..कितनी उँचाई है!..आप के अंतरात्मा में कितना सामर्थ्य है!…कोई बात दृढ़ता  से ठान  लेते है तो मनोयोग से हो जाता है…
जो पूनम व्रत करते तो आपदाओं से और दुर्गति से उन की रक्षा होती है..ये तो आप ने बाद में सुना है…
श्रध्दा  पूर्वा सर्व धर्मा फल प्रदा: l
श्रध्दा सभी धर्मों के पूर्व में होती है और मनोरथों को पूर्ण करने वाली फल दायिनी  वो माता श्रध्दा है…वेदों में ‘श्रध्दा सूक्त’ है , उस की अपनी महिमा है….श्रध्दा से सब कुछ  आसान हो जाता है …

Julm Sahena Dugna Paap – Sant Asharamji Bapu

Julm Sahena Dugna Paap - Sant Asharamji Bapu

मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent’s Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent's Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

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मातृ-पितृ पूजन दिवस (Parent’s Worship Day) 14th February [NEW SHORT FILM]

#ParentsWorshipDayOn14Feb मात-पिता की सेवा, ईश्वर की सेवा !

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Coming Soon New DVD Maa Baap Ko Mat Bhulna…

Coming Soon New DVD Maa Baap Ko Mat Bhulna...

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Mpp Booklet 2014 Title ok_2

Coming Soon Mpp Prospectus

Bapu Ji Aapke Bina Ji Nahi Sakte……….

Bapu ji tere bina ji nahi sakte……….

Bapu Ji Aapke Bina Ji Nahi Sakte……….

जाग मुसाफिर जाग – परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

जाग मुसाफिर  जाग - परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

जाग मुसाफिर जाग – परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू

#KnowTheTruth आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस- { Book 2014 }

#KnowTheTruth आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस

क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे गलत राह पर ना चले ?
क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे समाज मे आपका नाम बदनाम ना करें ?
क्या आप चाहेंगे आपके बच्चे होनहार हो॓, तो फिर….

आओ मनाये 14 फ़रवरी को मातृ-पितृ पूजन दिवस

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Mpp 2014 E-book-012

Mahabharat ke karan 15 Jan 2014 Sant Sammelan In Jodhpur

Mahabharat ke karan 15 Jan 2014 Sant Sammelan In Jodhpur

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