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हरि तुमसे दूर नहीं ….

 

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हरि तुमसे दूर नहीं ….

सौ छोटे-छोटे पातक एक महापातक बनता है। सौ छोटे-छोटे पुण्य एक महा पुण्य बनता है। जब पुण्य का सिलसिला चलता है तब जीव सुखी रहता है। इस समय पाप करता है तो भी उसको धन-संपत्ति, सुख सुविधाएँ मिलती रहती हैं क्योंकि अभी पुण्यकाल का प्रकरण चल रहा है। जब प्रारब्ध का पाप प्रकरण चलता है तब अच्छा काम करते हुए भी व्यक्ति के जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता।

ऐसे समय में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। अपना जप-तप-ध्यान-अनुष्ठान-आत्म-विचार प्रतिदिन चालू रखना चाहिए। कल्मष कटते जाएंगे, अन्तःकरण पावन होता जाएगा. महापातक दूर होते जाएँगे तब जप, ध्यान, कीर्तन आदि का पूरा लाभ दिखेगा। तुलसीदास जी कहते हैं-

तुलसी  जाके मुखनते धोखे निकसे राम।

ताके पग की पगतरी मोरे तन को चाम।।

धोखे से भी जिसके मुख से भगवान का नाम निकलता है वह आदमी भी आदर के योग्य है। जो प्रेम से भगवान का चिन्तन, ध्यान करता है, भगवतत्त्व का विचार करता है उसके आदर का तो कहना ही क्या ? उसके साधन-भजन को अगर सत्संग का संपुट मिल जाय तो वह जरूर हरिद्वार पहुँच सकता है। हरिद्वार यानी हरि का द्वार। वह गंगा किनारे वाला हरि द्वार नहीं, जहाँ से तुम चलते हो वहीं हरि का द्वार हो। संसार में घूम फिरकर जब ठीक से अपने आप में गोता लगाओगे, आत्म-स्वरूप में गति करोगे तब पता चलोगे कि हरिद्वार तुमसे दूर नहीं, हरि तुमसे दूर नहीं और तुम हरि से दूर नहीं।

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था।

आता न था नजर तो नजर का कसूर था।।

अज्ञान की नजर हटती है। ज्ञान की नजर निखरते निखरते जीव ब्रह्ममय  हो जाता है। जीवो ब्रह्मैव नापरः। यह अनुभव हो जाता है।

 

भगवान की विभूतियाँ

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भगवान की विभूतियाँ

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।

प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।।

“हे अर्जुन ! जल में मैं रस हूँ। चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं हूँ। संपूर्ण वेदों में मैं प्रणव (ॐ) हूँ। आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ।

पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में मैं तेज हूँ। संपूर्ण भूतों में मैं जीवन हूँ अर्थात् जिससे वे जीते हैं वह तत्त्व मैं हूँ तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ।”

(गीताः 7.8,9)

जल में जो रस वह रस परमात्मा है। वैज्ञानिक दृष्टि से जल का विश्लेषण करोगे तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन – ये दो गैस मिलेगी। इन दो गैसों को मिलाने से रस उत्पन्न नहीं होता किन्तु विज्ञान बाहर की आँखों से देखना चाहता है और विज्ञान की आँख से जो दिखेगा वह दृश्य दिखेगा। दृश्य के भीतर जो अदृश्य रस है वह विज्ञान की आँख से नहीं दिखता। भीतर का रस तो वे ही देख पाते हैं जो भीतर में, गहराई में जाते हैं। जैसे, दो मित्र परस्पर मिले। एक का हाथ दूसरे के हाथ में आया…. बड़ा आनन्द आया… बड़ा रस मिला। अगर आप मित्र के हाथ को लेबोरेटरी में ले जाओ तो त्वचा, मांस, रक्त, अस्थि के सिवा उसमें कुछ नहीं मिलेगा। फिर भी जब मित्र का हाथ आपके हाथ में आया तो रस मिला। तो कहना पड़ेगा कि रस भीतर होता है, बाहर नहीं। जो वास्तविक में रस है वह इन्द्रियों का विषय नहीं है।

भौतिक विज्ञान तो इन्द्रियों को जैसा दिखता है वैसा निर्णय करता है और वेदान्त तथा योगदर्शन यानी आध्यात्मिक विज्ञान तो इन्द्रियाँ जिससे देखती हैं वह मन, मन को जो सत्ता देता है वह चित्त और चित्त को जो चेतना देता है उसके तरफ विचारता है। भगवान कहते हैं- जल में रस मैं हूँ तो जल में रस आया कहाँ से? कैसे आया? परमात्मा से ही आया। रस कब आता है?जब भीतर रस होता है तब। अगर किसी की जिह्वा में सूखा रोग हो गया हो तो उसे रसगुल्ला आदि किसी भी पदार्थ का रस नहीं आयेगा। जिह्वा को रस कब आता है? जब वह अपने रस से रसीली होती है और जिह्वा का वह रस आता है जल में छुपे हुए अत्यंत सूक्ष्म रस के प्रभाव के ही कारण। इसीलिए भगवान कहते हैं- “जल में रस मैं हूँ।”

प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’ ऐसा कहने का तात्पर्य क्या है? आँखों से हमें प्रकाश दिखता है तो वास्तव में हम प्रकाश को नहीं देखते किन्तु प्रकाश जिन वस्तुओं पर पड़ता है उन वस्तुओं को देखते हैं। प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता है तो रूपान्तरित होता है और वह रूपान्तरण हमें दिखता है, वास्तविक प्रकाश नहीं दिखता। सूर्य और चन्द्र का जो वास्तविक प्रकाश है वही आपका-हमारा वास्तविक प्रकाश है और श्रीकृष्ण इसी प्रकाश की ओर संकेत करते हुए कह रहे हैं कि ‘सूर्य-चन्द्र में तेज मैं हूँ।’

प्रणवः सर्ववेदषु। ‘सब वेदों में ॐकार मैं हूँ।’ वेद का कोई अंत नहीं है। वेद यानी ज्ञान। ज्ञान का कोई अन्त नहीं होता और जिसका अंत हो जाये वह ज्ञान नहीं होता। वेद की चार संहिताएँ हैं 1121 या 1127 उपनिषद हैं। इन सब उपनिषदों का सार कठवल्ली है और कठवल्ली आदि सबका सार बीज रूप में ‘ॐ’ है। ‘अ’कार + ‘उ’कार + ‘म’कार = ॐकार।

कोई भी व्यंजन ‘अ’कार के बिना नहीं बोला जा सकता। यह ‘अ’कार सृष्टि का स्थूल (विश्व), ‘उ’ कार तेजस और ‘म’ कार प्राज्ञ एवं ॐ की अर्धमात्रा ‘ँ’ है वह है चैतन्य सूर्य का द्योतक।

अभी तो रशिया के वैज्ञानिक चकित हो गये कि कोई भी आदमी भीतर कोई  शब्द सोचे और बाहर दूसरा शब्द बोले तो दोनों अलग-अलग उनके कम्पयूटर में आ जाते हैं लेकिन’ॐ’कार एक विलक्षण शब्द है। भीतर अगर ‘ॐ’ कार एवं बाहर दूसरा शब्द हो या बाहर ‘ॐ’ कार और भीतर दूसरा कोई शब्द हो फिर भी दोनों जगह ‘ॐ’कार ही आ जाता है। यह ‘ॐ’कार शब्द अन्य सब शब्दों से बिल्कुल अलग पड़ता है और ऋषियों ने इसकी आकृति भी बिल्कुल निराली बना दी है।

ऐसा कोई भी मन्त्र नहीं है जिसमें ॐ का उपयोग न किया गया हो। जिसमें ॐ का उपयोग नहीं है वह बीजमन्त्र से रहित होता है। यह ॐकार सबका बीज है, सबका मूल है। नवजात शिशु जब रोता है तब उसकी ‘ऊँवां…ऊँवां…’ आवाज में ॐकार की ध्वनि ही होती है। मरीज भी बिस्तर पर कराहता है उसकी ॐऽऽऽऽऽ…ॐऽऽऽऽ आवाज में ॐकार की ही ध्वनि होती है। इससे सिद्ध होता है कि आपका जो चैतन्य आत्मा है उसकी वास्तविक ध्वनि ॐ है।

विभिन्न पद्धतियों से ॐकार के द्वारा अपनी साधना को संपन्न किया जा सकता है। आज्ञाचक्र पर अथवा नाभि केन्द्र पर ॐ की आकृति का ध्यान करके अथवा हृदय में उसकी भावना करते हुए ध्यान करके हम अपनी सुषुप्त शक्तियों को विकसित कर सकते हैं।

वैखरी वाणी द्वारा ॐ का उच्चारण करते हुए मध्यमा में पहुँच जाओ। मध्यमा से पश्यन्ती में जाओ और पश्यन्ती से अगर परा वाणी में पहुँच जाओ तो अत्यंत सूक्ष्म अवस्था को परम मौन को उपलब्ध हो सकते हो। वह परम मौन की जो अवस्था है उस अवस्था को पाये हुए व्यक्ति के आगे इस लोक का तो क्या, त्रिलोकी का राज्य भी तुच्छ हो जाता है।

भगवान शंकर ने भैरव विज्ञान में कहा हैः

”हे उमा ! इस ॐ को जो जानता है वह मेरे को जान लेता है। इस ॐ को जो समझ लेता है वह मुझे समझ लेता है। इस ॐ को जो पा लेता है वह मुझे पा लेता है।”

भगवान श्री कृष्ण आगे कहते हैं शब्दः खे। अर्थात् आकाश में शब्द मैं हूँ।

शब्द में बड़ी शक्ति है। शब्द का नाश नहीं होता। मैंने यहाँ शब्द कहे और रेडियो स्टेशन के यंत्र हों तो मेरे द्वारा यहाँ कहे गये शब्द हजारों मील दूर तक सुनायी पड़ते हैं। इस प्रकार शब्दों का नाश नहीं हुआ। वाणी से निकले हुए शब्द नष्ट नहीं होते वरन् आकाश में गूँजते रहते हैं। इसीलिए भगवान कहते हैं- शब्दः खे। आकाश में जो शब्द है वह मैं हूँ।

पौरूषं नृषु। भगवान कहते हैं कि पुरुषों में पुरुषत्व मैं हूँ। पुरुष कौन है? जो पुरुषार्थ करे वह पुरुष। पुरुषार्थ क्या है? पुरुषस्य अर्थः इति पुरुषार्थः। जो परब्रह्म परमात्मा पुरुष है उसको पाने के लिए जो प्रयत्न है उसको पुरुषार्थ बोलते हैं। भगवान कहते हैं कि ऐसा पुरुषार्थ करने वालों पुरुषों में पौरूष मैं हूँ।

पुरुष वह है जो पुरुषार्थ करके ‘है’ उसको ठीक से समझ ले। जो सदा मौजूद है और जिसको पाने के बाद कुछ पाना नहीं, जिसको जानने के बाद कुछ जानना नहीं, जिसमें स्थिर रहने के बाद बड़े भारी दुःख भी चलित न कर सके ऐसे तत्त्व को पाना पुरुषार्थ है।

लोग समझते हैं कि जिसके पास धन नहीं है, उसके लिए धन पाना पुरुषार्थ है। जिसके पास बाह्य पढ़ाई-लिखाई नहीं उसके लिए पढ़ाई-लिखाई पुरुषार्थ है। जिसके पास यश नहीं उसके लिए यश पाना पुरुषार्थ है। इस प्रकार जो नहीं है उसको लाना, उसको पाना पुरुषार्थ मान लिया जाता है। जगत की जितनी भी चीजे हैं वे पहले नहीं थीं, बाद में नहीं रहेंगी और अभी भी नहीं के तरफ जा रही हैं। जो नहीं की तरफ जा रही हैं उन नश्वर वस्तुओं, नश्वर सत्ता, नश्वर पद को पाने का जो यत्न करता है उसको तो शास्त्रीय भाषा में अज्ञानी कहते हैं और जो शाश्वत तत्त्व को जानकर निहाल होने को तत्पर है उसको बोलते हैं पुरुष। भगवान कहते हैं कि ऐसे पुरुषों का पुरुष्त्व मैं हूँ।

इस प्रकार गीता के सातवें अध्याय के आठवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि जल में रस, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश, संपूर्ण वेदों में ॐकार, आकाश में शब्द एवं पुरुषों में पुरुष्तव मैं हूँ।

नौवें श्लोक में भगवान आगे कहते हैं-

पुण्यो गंधः पृथिव्यां च। ‘पृथ्वी में पवित्र गंध मैं हूँ।’

पृथ्वी में पवित्र गंध भी वह चैतन्य सत्ता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान ने पवित्र गंध कहा है। सुगंध नहीं कहा क्योंकि सुगन्ध पवित्र गंध हो यह जरूरी नहीं। कई ऐसी सुगंधें हैं जो कामवासना को भड़काती हैं। पेरिस आदि में इस प्रकार की खोज करके इत्र (परफ्यूम्स) बनाये जाते हैं। जिनसे मनुष्य की काम वासना उद्दीप्त हो, मनुष्य संसार के कीचड़ में फँसे। इसीलिए श्रीकृष्ण ने सुगन्ध नहीं, वरन् ‘पवित्र गंध’ कहा है।

तेजश्चास्मि विभावसौ। ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’ तेज रूप तन्मात्रा से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है। अग्नि में से अगर तेज निकाल दिया जाये तो अग्नि बचे ही नहीं। यहाँ भगवान कहते हैं कि ‘अग्नि में तेज मैं हूँ।’

जीवनं सर्वभूतेष।

संपूर्ण भूतों में जीवन मैं हूँ। प्राणी में उसको जिलाने वाली जो जीवनी-शक्ति है वह अगर न रहे तो वह प्राणी फिर प्राणी नहीं रहेगा। फिर तो वह केवल शव रह जायेगा। अतः समस्त प्राणियों में अपनी चेतना का अस्त्तित्व बताते हुए भगवान कहते हैं कि संपूर्ण भूतों में मैं उनका जीवन हूँ।

अंत में भगवान कहते हैं- तपश्चास्मि तपस्विषु। तपस्वियों में मैं तप हूँ। सुख-दुःख, शीत-उष्ण, मान-अपमान आदि द्वन्द्वों को सहन करने को तप कहते हैं। किन्तु वास्तविक तप तो है परमात्म-प्राप्ति में। चाहे कितनी भी विघ्न-बाधाएँ आयें, उनकी परवाह न करते हुए अपने लक्ष्य में डटे रहना।

यही तपस्वियों का तप है और इसी से वे तपस्वी कहलाते हैं। इसी तप के लिए भगवान संकेत करते हुए कहते हैं कि तपस्वियों का तप मैं हूँ।

इस प्रकार उपरोक्त दोनों ही श्लोकों में भगवान कहते हैं कि जल में रस, सूर्य-चन्द्र में प्रभा, वेदों में प्रणव, आकाश में शब्द, पुरुषों में पुरुषत्व, पृथ्वी में गंध, अग्नि में तेज, संपूर्ण भूतों में उनका जीवन तथा तपस्वियों में तप मैं हूँ। भगवान ने जिज्ञासुओं के लिए अपनी सर्वव्यापकता का बोध कराया है ताकि जिज्ञासु जहाँ-जहाँ नजर जाये, वहाँ भगवान की सत्ता मानकर अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने में कामयाब हो सके, वास्तविक कृष्ण तत्त्व का ज्ञान पा सके।

 

हजारों जन्म मेंढक की योनि….

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हजारों जन्म मेंढक की योनि

स्वामी विवेकानन्द की तेजस्वी और अद्वितिय प्रतिभा के कारण कुछ लोग ईर्ष्या से जलने लगे। कुछ दुष्टों ने उनके कमरे में एक वेश्या को भेजा। श्री रामकृष्ण परमहंस को भी बदनाम करने के लिए ऐसा ही घृणित प्रयोग किया गया, किन्तु उन वेश्याओं ने तुरन्त ही बाहर निकल कर दुष्टों की बुरी तरह खबर ली और दोनों संत विकास के पथ पर आगे बढ़े। शिर्डीवाले साँईबाबा, जिन्हें आज भी लाखों लोग नवाजते हैं, उनके हयातिकाल में उन पर भी दुष्टों ने कम जुल्म न किये। उन्हें भी अनेकानेक षडयन्त्रों का शिकार बनाया गया लेकिन वे निर्दोष संत निश्चिंत ही रहे।

पैठण के एकनाथ जी महाराज पर भी दुनिया वालों ने बहुत आरोप-प्रत्यारोप गढ़े लेकिन उनकी विलक्षण मानसिकता को तनिक भी आघात न पहुँचा अपितु प्रभुभक्ति में मस्त रहने वाले इन संत ने हँसते-खेलते सब कुछ सह लिया। संत तुकाराम महाराज को तो बाल मुंडन करवाकर गधे पर उल्टा बिठाकर जूते और चप्पल का हार पहनाकर पूरे गाँव में घुमाया, बेइज्जती की एवं न कहने योग्य कार्य किया। ऋषि दयानन्द के ओज-तेज को न सहने वालों ने बाईस बार उनको जहर देने का बीभत्स कृत्य किया और अन्ततः वे नराधम इस घोर पातक कर्म में सफल तो हुए लेकिन अपनी सातों पीढ़ियों को नरकगामी बनाने वाले हुए।

हरि गुरु निन्दक दादुर होई।

जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

ऐसे दुष्ट दुर्जनों को हजारों जन्म मेंढक की योनि में लेने पड़ते हैं। ऋषि दयानन्द का तो आज भी आदर के साथ स्मरण किया जाता है लेकिन संतजन के वे हत्यारे व पापी निन्दक किन-किन नरकों की पीड़ा सह रहे होंगे यह तो ईश्वर ही जाने।

कदाचित् इसीलिए विवेकानन्द ने कहा थाः “जो अंधकार से टकराता है वह खुद तो टकराता ही रहता है, अपने साथ वह दूसरों को भी अँधेरे कुएँ में ढकेलने का प्रयत्न करता है। उसमें जो जागता है वह बच जाता है, दूसरे सभी गड्डे में गिर पड़ते हैं।

 

सतत चिन्तन।

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सतत चिन्तन।


एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते…..।

‘आपकी निरन्तर उपासना करता है और अव्यक्त अक्षर की उपासना करता है इन दोनों में उत्तम योगवेत्ता कौन है?’

महाभारत में एक कथा आती है। रूक्मिणी ने किसी पर्व पर उत्सव किया। उत्सव में परिवार के एवं अन्य स्नेही, सम्बन्धी, मित्रादि लोगों की उपस्थिति आवश्यक होती है। श्रीकृष्ण ने देखा कि मेरा प्यारा दोस्त अर्जुन नहीं आया है तो उसे बुलाने गये। उसके कक्ष में गये तो अर्जुन सो रहा है। श्रीकृष्ण धीरे-धीरे उसके पास गये। मित्रभाव है, विनोद से अठखेलियाँ करके जगाना चाहा। जब बिल्कुल नजदीक गये तो अर्जुन के हर श्वास के साथ ‘कृष्ण…. कृष्ण….कृष्ण’ की ध्वनि सुनाई देने लगी।

यह है सतत चिन्तन। हमारा चिन्तन मन से ही न हो। मन सो जाय तो हमारे प्राण वह कार्य शुरु कर दें। जैसे, जगत का व्यवहार तीव्रता से करते हैं तो स्वप्न में भी वह चालू हो जाता है, वैसे जाग्रत अवस्था में इष्ट का चिन्तन इतनी लगन से, इतनी गहरे भाव से हो कि निद्रा के समय भी अन्तर्मन से वह चिन्तन होता है रहे, प्राणों में उसकी धारा बहती रहे।

रूक्मिणी ने देखा कि भगवान अर्जुन को बुलाने गये हैं, अर्जुन तो नहीं आया, भगवान भी वापस नहीं आये। उत्सव में आये हुए नारदजी के भेजा उन्हें बुलाने के लिए। नारदजी ने जाकर देखा तो अर्जुन सोया हुआ है और भगवान उसके पास बैठकर ध्यान से कुछ सुन रहे हैं। नारदजी को देखकर श्रीकृष्ण ने इशारे से कहा कि आवाज किये बिना यह अजपाजाप की ध्वनि सुनो।

‘वाह ! क्या चिन्तन है। श्वास-श्वास में श्रीकृष्ण की ध्वनि…!’ नारदजी चकित रह गये।

‘इसका मन शरीर के साथ जुड़ा है। शरीर सो गया है और मन खो गया है लेकिन इसका चिन्तन नहीं खोया है। नींद में भी चिन्तन चालू है। अर्जुन मेरा प्यारा है।’ श्री कृष्ण बोले।

‘जो आपका प्यारा है वह सारे विश्व का प्यारा है। उसके श्वास में चलती ‘कृष्ण… कृष्ण’ की ध्वनि के साथ मैं वीणा से ताल देता हूँ।’ नारद धीरे-धीरे वीणा के तार को झंकृत करने लगे और मस्त होने लगे। वे भूल ही गये कि मैं इन दोनों को बुलाने आया हूँ।

जहाँ सुख मिलता है वहाँ राग और द्वेष शांत हो जाते हैं। सुख के अभाव में ही राग-द्वेष सिर उठाते हैं। जहाँ परम सुख के द्वार खुले, आपको भीतर से आनंद आने लगा तो आपको प्यारे से प्यारे व्यक्ति से मिलने जाना होगा तो आप सोचेंगे कि अभी वह नहीं आया होगा। किसी के साथ शत्रुता हो, उसको सबक सिखाने का कार्यक्रम बनाया हो और आ गये सत्संग में, भीतर का सुख मिलने लगा तो वह कार्यक्रम मोकूफ रह जायेगा। इसीलिए युद्ध में जाते समय साधू, ब्राह्मण, संत, महात्मा का दर्शन अपशकुन माना जाता है क्योंकि संत-महात्मा ब्रह्मचिन्तन में लीन रहते हैं, अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं तो उनके दर्शन से, उनके ‘वायब्रेशन’ (स्पंदन) से आपके अंदर का द्वेष ठण्डा हो जायेगा। द्वेष ठण्डा हो गया तो आप तीव्रता से लड़ोगे नहीं और हार जाओगे। इसीलिए कहा गया है कि युद्ध के समय दर्शन करने मत जाना।

अर्जुन नींद में भी अपने आन्तरिक चिन्तन में मस्त है और श्रीकृष्ण उस आन्तरिक चिन्तन के चिन्तन में मग्न हैं। दोनों की मस्ती देखकर नारद भी वीणा का ताल देते हुए मग्न हो रहे हैं।

इधर रूक्मिणी ने सत्यभामा को भेजा कि देखो तो सही, अर्जुन को बुलाने भगवान गये और उनको बुलाने नारदजी गये ! कोई वापस नहीं आये ! तलाश करो क्या कर रहे हैं?

सत्यभामा ने जाकर वह मधुर दृश्य देखा तो वह मधुर स्वर से गाने लग गई। उसको गाते देखकर श्रीकृष्ण मस्त होकर नाचने लगे।

यह है सततयुक्त व्यक्ति के स्पंदनों का प्रभाव। जो केवल प्राणों से सततयुक्त होता है उसका इतना प्रभाव है तो जो स्वरूप से सततयुक्त हो गया है उसका कितना प्रभाव हो सकता है?

 

माया के दो आवरण

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माया के दो आवरण

 

तुम्हारे ‘स्व’ पर, आत्मा पर माया के दो आवरण हैं। माया की यह शक्ति है। जैसे विद्युत के तार में विद्युत दिखती नहीं लेकिन बल्बों के द्वारा, पंखों के द्वारा विद्युत की उपस्थिति का पता चलता है। ऐसे ही माया कोई आकृति धारण करके नहीं बैठी है लेकिन माया का विस्तार यह जगत दिख रहा है उससे माया के अस्तित्व का पता चलता है।

आपका ‘स्व’ इतना स्वतन्त्र है और शरीर ‘पर’ है। बेवकूफी से क्या हो गया है कि ‘स्व’ का पता नहीं और ‘पर’ को ‘स्व’ मान लिया….. शरीर को ‘मैं’ मान लिया।

व्यवहार में कहते हैं, ‘मेरा हाथ….’ तो तुम हाथ नहीं हो, हाथ से अलग हो। ‘मेरा पैर….’ तो तुम पैर नहीं हो, पैर से अलग हो। ‘मेरा पेट…’ तो तुम पेट नहीं हो, पेट से अलग हो। ‘मेरा शरीर….’ तो तुम शरीर नहीं हो, शरीर से अलग हो। ‘मेरा मन…..’ तो तुम मन नहीं हो, मन से अलग हो। ‘मेरी बुद्धि….’ तो तुम बुद्धि नहीं हो, बुद्धि से अलग हो।

इस माया की दो शक्तियाँ हैः आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति। आवरण बुद्धि पर पड़ता है और विक्षेप मन पर पड़ता है। सत्कार्य करके, जप तप करके, निष्काम कर्म करके विक्षेप हटाया जाता है। विचार करके आवरण हटाया जाता है।

पचास वर्ष तपस्या की, एकान्त का सेवन किया, मौन रहे, समाधि की, बहुत प्रसन्न रहे, सुखी रहे लेकिन भीड़ भड़ाके में आते ही गड़बड़ होगी। भीड़ में वाहवाही होगी तो मजा आयेगा लेकिन लोग तुम्हारे विचार के विरोधी होंगे तो तुम्हारा विक्षेप बढ़ जाएगा। क्योंकि अभी बुद्धि पर से आवरण गया नहीं। अगर आवरण चला गया तो तुम्हें शूली पर भी चढ़ा दिया जाय, कंकड़-पत्थर मारे जाएँ, अपमान किया जाय फिर भी आत्मनिष्ठ के कारण तुम दुःखी जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर दुःख का प्रभाव नहीं पड़ेगा, अपमान में तुम अपमानित जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर अपमान का प्रभाव नहीं पड़ेगा। मृत्यु के समय लोगों को तुम्हारी मृत्यु होती हुई दिखेगी परन्तु तुम पर मृत्यु का प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम खाते-पीते, आते-जाते, लेते-देते हुए दिखोगे फिर भी तुम इन सबसे परे होगे। तुम आत्म-स्वरूप से कितने स्वतंन्त्र हो !

वासना से परतन्त्रता का जन्म होता है और आत्म विचार से स्वतन्त्रता का।

To Hell Do They Go

-Param Pujya Sri Lilashahji Maharaj

 

leelashah ji

Be humane. Learn to cultivate humanistic qualities. One who is humane listens to the good of all and does good to all. 
Sant Meera has said:
Those who defame us, to Hell do they go.
To Hell they go, cleansing our sins
The man not knowing himself, gets engaged in knowing others: “This is like that…he is like that…” Knowing oneself means knowing the Atman. One who knows the Atman is rare.
Every body says, “I am right.” You would ask: “Swamiji! Is this (knowing oneself) so important?” Yes, sure! One, who has not known his own Self, how can he know others? He isa mere animal.Having obtained the human form, if you have not awakened your real nature, not kindled the Light of Knowledge in your heart, not known your real Self, then what have you achieved by coming into this world? The real good of man lies in knowing his true Self.By indulging in calumny, hatred, deceit and trickery you are harming yourself and the society. And God knows how many wombs you will enter to reap the fruits of calumny and deceit.
It is said:One, who has no deceit in the mind, who is sincere and honest, such a saintly soul can transcend the ocean of samsara, so says the poet Narayana.Calumny and praise bind the jiva. Therefore, living in the company of the God-loving saints and listening to their satsang, know thyself. This will relieve you from the miseries of birth and death forever
Rishi Prasad ,194,February 2009

ज्ञानवान का आत्मपद

some hindu sants throughout agesज्ञानवान आत्मपद को पाकर आनंदित होता है और वह आनंद कभी दूर नहीं होता,

क्योंकि उसको उस आनंद के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण के समान लगती हैं।

हे रामजी ! ऐसे पुरुषों का आचार तथा जिन स्थानों में वे रहते हैं, वह भी सुनो।

कई तो एकांत में जा बैठते हैं,

कई शुभ स्थानों में रहते हैं,

कई गृहस्थी में ही रहते हैं,

कई अवधूत होकर सबको दुर्वचन कहते हैं,

कई तपस्या करते हैं,

कई परम ध्यान लगाकर बैठते हैं,

कई नंगे फिरते हैं,

कई बैठे राज्य करते हैं

कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं,

कई परम मौन धारे हैं,

कई पहाड़ कीकन्दराओं में जा बैठते हैं,

कई ब्राह्मण हैं,

कई संन्यासी हैं,

कई अज्ञानी की नाईं विचरते हैं

कई आकाश में उड़ते हैं

और तो क्या कहे ज्ञानी के बारे में उनकी लीला तो वे ही जाने |

 

कृष्ण लीला – पूनम व्रतधारी विशेष – ब्रह्मचर्य

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काली माँ  की उपासना करनेवाले  बहादुर गदाधर  ठाकूर  ने पत्नी शारदा को फिर जीवन भर भोग्या नही माना… ( शारदा जी के पैरों में उन को माँ  के चरणों के दर्शन हुए थे इसलिए गदाधर ठाकुर अर्थात रामकृष्ण परमहंस..) ब्रम्हचर्य  व्रत पालते पालते कई ब्रम्हचारी फिसल जाते…लेकिन स्री  साथ में पत्नी रूप में आई और ब्रम्हचर्य   पालन जीवन भर किया…कैसी भारतीय संस्कृति की व्यवस्था है!..की आप के भाव को बादलो…

विदेश में फ्राइड नाम के मनो वैज्ञानिक  के सिद्धांत  से गुमराह हो गये है लोग…पुत्री पिता की तरफ और पुत्र माता की तरफ काम विकार से आकर्षित होते है ऐसा उस का सिद्धांत  था…लेकिन ये फ्राइड के खुद के जीवन में हुआ होगा, ऐसा सब के जीवन में नही होता..ये उस ने अपने उग्रवादी वमन से जो लिखा है उस से सारा पाश्चात्य  जगत तबाह हो गया… ‘सम्भोग  से समाधि’ का भाषण करने वाला अपना भारत का विद्वान भी फ्राइड का मनोविज्ञान  पढ़ता था… 
भारतीय संस्कृति में ऐसा नही है…दुल्हन के वस्त्र  पहेन  के पुत्री जब ससुराल जाती है सजी धजी तब पिता के गले लगती है…क्या बेटी में पिता के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा उस समय?….अथवा पिता का पुत्री के प्रति विकारी आकर्षण रहेगा पुत्री के प्रति?…..नही नही..ये तो मेरी लाडली पुत्री है..ये मेरे पिता है जिन्हों ने मुझे जनम दिया,पाल पोस  कर बड़ा किया,सुंदर संस्कार दिए…कितने कितने सुंदर भाव होते है पिता और पुत्री के एकदुसरे के प्रति.. ‘भावग्राही  जनार्दन!’ …आप जैसा भाव करते वो  जनार्दन हरि  आप को उसी में मदद करते है…भाव का महत्व है…
अभी भी आप आसपड़ोस को माईयों को विकारी नज़र से देखो तो आप को स्वपनदोष हो सकता है..
गदाधर ठाकुर अपनी विवाहिता विधिवत की पत्नी में  माँ का दृढ़ भाव किए तो जीवन भर ब्रम्हचर्य पालन में सफल हुए..कितनी उँचाई है!..आप के अंतरात्मा में कितना सामर्थ्य है!…कोई बात दृढ़ता  से ठान  लेते है तो मनोयोग से हो जाता है…
जो पूनम व्रत करते तो आपदाओं से और दुर्गति से उन की रक्षा होती है..ये तो आप ने बाद में सुना है…
श्रध्दा  पूर्वा सर्व धर्मा फल प्रदा: l
श्रध्दा सभी धर्मों के पूर्व में होती है और मनोरथों को पूर्ण करने वाली फल दायिनी  वो माता श्रध्दा है…वेदों में ‘श्रध्दा सूक्त’ है , उस की अपनी महिमा है….श्रध्दा से सब कुछ  आसान हो जाता है …

Revolutionary movement never done before ! Join It !!!

andhkar me bapu ne  prakash punj dikhalaya hai

sat sat kare pranam inhe hame satya ka path padhaya hai

hindu muslim sikh ishai ek dhage se jod diye

jago re jogo sara vishwa jagana hai ghar ghar jake ye subh sankalp jagana hai

santo ne jo rah dikhayi usi pe chalte jana hai

hari om hari om

Real miracle Sage in India

asharam bapu meditatingIt is usual for Sant Asharam ji Bapu to tell us and also write in lot of spiritual books published from the Ashram that a real spiritual aspirant ought not to hanker (hunger) for super natural powers or Siddhis, because when aspirant starts desiring them, then further spiritual progress stops. Bapuji has seen some examples in which people who were getting good progress were caught by the temptation to obtain these supernatural powers and from then they had a serious back fall. Nobody can argument the perfection of Bapuji’s judgment in this stuff. But a hesitation comes to us from time to time. Many are the letters we got at the Ashram from aspirants from different places mentioning lot of miracles performed by Bapuji. It can’t be that all who write such letters are uttering falsehoods or are under any hallucination. It is likely that there is a little percentage of self-deceiving peoples. But judging from the nature of the events reported to have happened reported with multiple details and thorough care in the narrations.

We have to come to the conclusion that Bapuji is exercising Siddhis or supernatural powers. If so, will he have a fall down? We can safely assert that he never fall down—because Bapuji has mounted above the states of falling and rising. Since he has reached at that stage in which he can recognize himself with the Supreme one —call it Atman or Satchidananda or Isvara or God itself this stage is called Atma Sakshatkar, as you like—where is the question of falling and rising? When the ego is refuted, how there can be any type of risk of falling or etc. ?

miracle sant helicopter siddhi asaramOne thinig is for certain. The real Siddha is the Atma Saakshatkaari who does not have desire or care about Siddhis, but who manifests Siddhis for the reasons of unselfish and as a communion result with the Lord or the Brahman, is the totally different person from the little man who has psychic powers to do points which are extraordinary or who have control on souls. The power over (good or bad)spirits is totally different from spiritual powers. And no real Siddha Sage like Bapuji goes about calling himself parading his powers or Bhagavan. It doesn’t mean that Siddha doesn’t know about howhedo miracles but they are not miracles to him—These are just ordinary things for him because he stays in the spiritual area beyond the reach of the common man mind.

Read about Bapuji’s brush with death in a Helicopter accident.

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