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सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष….

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सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष….

भगत जगत को ठगत है जगत को ठगत न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।

सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों का खजाना क्यों लूटें ? नहीं…। नहीं….। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।

एकनाथ जी कहते हैं- “भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।”

“नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?”

कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।

उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।

एकनाथ जी ने कहाः “देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?”

“नहीं महाराज ! “गोदावरी माता की जय….’ करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय…. बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।”

चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः “अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?…. और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !

साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।”

कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।

जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं।

अनपेक्षः शुचिर्दक्षः उदासीनो गतव्यथः।

अब शब्द आता है गतव्यथः। व्यथा से रहित।

एक सेठ के चार बेटे थे। तीन तो सुबह जल्दी उठ जाते थे, चौथा आलसी-प्रमादी था। सूर्योदय होने के बाद देरी से उठता था। सेठ व्यथित हो जाते थे। आप बेटे को जल्दी उठाओ, नहीं उठे तो अपने हृदय को व्यथित मत करो। ‘बेटा नहीं मानता… बेटी नहीं मानती…. बहू नहीं मानती…. यह नहीं होता…. वह नहीं होता…।’ ऐसा करके छोटी-छोटी बातों में आप अपने हृदय को व्यथित कर देते हैं, व्यग्र कर देते हैं, शोकाकुल कर देते। व्यथित होना यह दक्षता से गिरना है। हृदय को व्यथित करने से अपनी ही शक्ति क्षीण होने लगती है। आप संतानों को अनुशासन में चलाओ। इसमें शास्त्र संमत है किन्तु आप व्यथित होकर अपने बच्चों, नौकरों को सुधारने लगोगे तो वे सुधरेंगे नहीं, बगावत नहीं करेंगे।

बाबाजी सेठजी के साथ कार में जा रहे थे। ड्राईवर ने एकदम से मोड़ ले लिया। सेठ जी ने उसे डाँटाः

“बदतमीज ! यह क्या कर रहा है ? अभी गाड़ी को ठोकर लग जाती ! हार्न बजाना चाहिए था !… ” इत्यादि। आग-बबूला होकर सेठ जी बरस पड़े।

बाबाजी ने धीरे से कहाः “सेठजी ! यह क्या कर रहे हो ?”

“मैं इस कम्बख्त को सुधार रहा हूँ।”

“आप अपना दिल बिगाड़कर उसे सुधार रहे हो तो वह कैसे सुधरेगा ?”

आप अपना दिल मत बिगाड़ो। अपने को व्यथित करके किसी को सुधारेगा तो वह नहीं सुधरेगा।

पहले अपना दिल पावन कर लो, प्यार से भर लो, कल्याण से भर लो। दिल को व्यथा में मत भरो। प्यार से लोगों को सुधरने का मौका दो और परिणाम रूप फल की आशा मत करो। फिर देखो, ईश्वर क्या नहीं करवाता।

 

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जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

 

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जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन

जिनकी दृष्टि मात्र से जीव आनन्द को प्राप्त होता है, जिसकी महिमा गाते शास्त्र थकते नहीं, युद्ध के मैदान में न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण जिस ज्ञान की श्रेष्ठता व पवित्रता बताते हैं उस ज्ञान को प्राप्त किये हुए आत्मवेत्ता जीवन्मुक्त महापुरुष के दर्शन करने की कई दिनों की इच्छा पूर्ण हुई। सुना था कि ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष श्री रमण महर्षि के सान्निध्य में बैठने मात्र से हृदय शान्ति व आनन्द का अनुभव करता है। आज वह सुअवसर प्राप्त हो गया।

भक्त-मण्डल महर्षि को प्रणाम करके बैठा। किसी ने श्रीकृष्ण की आराधना की थी तो किसी ने अम्बाजी की, किसी ने रामजी को रिझाने के प्रयास किये थे तो किसी ने सूर्यनारायण को अर्घ्य दिये थे किसी ने व्रत किये थे तो किसी ने फलाहार से वर्ष बिताए थे। किसी ने दो देव बदले थे तो किसी ने तीन, चार या पाँच देव बदले थे।

जब तक ज्ञानवान, आत्मारामी, प्रबुद्ध महापुरुष के चरणों में जाकर साधना का मार्ग सुनिश्चित नहीं होता तब तक मनमानी साधना जमती नहीं। हृदय की गहराई में आशंका बनी रहती है कि साधना पूर्ण होगी कि नहीं, फलदायी बनेगी कि नहीं। गहराई में यह संदेह विद्यमान हो तो ऊपर-ऊपर से कितने ही व्रत नियम करो, कितनी ही साधना करो, शरीर को कष्ट दो लेकिन पूर्णरूपेण लाभ नहीं होता। अचेतन मन में सन्देह बना ही रहता है। यही हम लोगों के लिए बड़े में बड़ा विघ्न है।

योगवाशिष्ठ महारामायण में आया है कि शमवान पुरुष के सर्व सन्देह निवृत्त हो जाते हैं, उसके चित्त में शोक के प्रसंग में शोक नहीं होता, हर्ष के प्रसंग में हर्ष नहीं होता, भय के प्रसंग में भयभीत दिखता हुआ भी भयभीत नहीं होता, रूदन के प्रसंग में रोता हुआ दिखता है फिर भी नहीं रोता है, सुख के प्रसंग में सुखी दिखता है फिर भी सुखी नहीं होता।

जो सुखी होता है वह दुःखी भी होता है। जितना अधिक सुखी होता है उतना अधिक दुःख के आघात सहता है। मान के दो शब्दों से जितना अधिक खुश होता है उतना अधिक अपमान के प्रसंग में व्यग्र होता है। धन की प्राप्ति से जितना अधिक हर्ष होता है, धन चले जाने से उतना अधिक शोक होता है। चित्त जितना तुच्छ, हल्का और अज्ञान से आक्रान्त होता है उतना ही छोटी-छोटी बातों से क्षोभित होता है। चित्त जब बाधित हो जाता है तब क्षोभित होता हुआ दिखे उसको क्षोभ स्पर्श नहीं कर सकता। अष्टावक्र मुनि ने राजा जनक को कहाः

धीरो न द्वेष्टि ससारं आत्मानं न दिदृक्षति।

हर्षाभर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति।।

“हर्ष और द्वेष से रहित ज्ञानी संसार के प्रति न द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है। वह न मरा हुआ है और न जीता है।”

(अष्टावक्र गीताः 83)

जो धीर पुरुष हैं, शम को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने जीवन के परम लक्ष्य को सिद्ध कर लिया, परमात्म-दर्शन कर लिया, ब्रह्मा-विष्णु-महेश समन्वित विश्व के तमाम देवों की मुलाकात कर ली, जो अपने स्वरूप में परिनिष्ठित हो गये वे ही कृतकृत्य हैं। शास्त्रों में उन्हीं को धीर कहा है।

जो क्षुधा-तृषा, सर्दी-गर्मी सहन करते हैं उनमें तो धैर्य तो है लेकिन वे तपस्वी हैं। वे व्यावहारिक धैर्यवान हैं। शास्त्र किनको धैर्यवान कहते हैं? अष्टावक्र मुनि कहते हैं- धीरो न द्वेष्टि संसारम्…. संसार की किसी भी परिस्थिति में उद्विग्न नहीं होता, उसे द्वेष नहीं होता। आत्मानं न दिदृक्षति। आत्मा-परमात्मा का दर्शन करने की, उसे प्राप्त करने की इच्छा नहीं है। संसार की प्राप्ति तो नहीं चाहता, इतना ही नहीं प्रभु को प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं रही। क्योंकि अपना आत्मा ही प्रभु के रूप में प्रत्यक्ष हो गया है। फिर प्राप्त करना कहाँ बाकी रहा? जैसे, मेरे को आसारामजी महाराज के दर्शन करने की इच्छा नहीं। अगर मैं इच्छा करूँ तो मेरी इच्छा फलेगी क्या? मैं जानता हूँ कि आसारामजी महाराज कौन हैं।

जिसने अपने-आत्मस्वरूप को जान लिया, परमात्म-स्वरूप को जान लिया उसको परमात्म-प्राप्ति की इच्छा नहीं रहती।

अव्यक्त तत्व का अनुसंधान

 

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अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।

परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्।।

‘बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्ति के भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।”

(गीताः 7.24)

जो बुद्धिमान हैं, मेधावी हैं वे भगवान को साकार-निराकार, व्यक्त-अव्यक्तरूप में मानते हैं। जो बुद्धिमान नहीं हैं वे भगवान को साकार रूप में मानते हैं और निराकार तत्त्व के तरफ उनकी गति नहीं होती। जो मूर्ख हैं, बुद्धु हैं वे न भगवान के साकार रूप को मानते हैं न निराकार रूप को मानते हैं, वरन् अपनी मति एवं कल्पना में जो बात आती है उसी को मानते हैं

चार प्रकार की कृपा होती हैः

ईश्वरकृपा, शास्त्रकृपा, गुरुकृपा और आत्मकृपा।

ईश्वरकृपाः ईश्वर में प्रीति हो जाये, ईश्वर के वचनों को समझने की रूचि हो जाये, ईश्वर की ओर हमारा चित्त झुक जाये, ईश्वर को जानने की जिज्ञासा हो जाये यह ईश्वर की कृपा है।

शास्त्रकृपाः शास्त्र का तत्त्व समझ में आ जाये, शास्त्र का लक्ष्यार्थ समझ में आने लग जाये यह शास्त्रकृपा है।

गुरुकृपाः गुरु हमें अपना समझकर, शिष्य, साधक या भक्त समझकर अपने अनुभव को व्यक्त करने लग जायें यह गुरुकृपा है।

आत्मकृपाः हम उस आत्मा परमात्मा के ज्ञान को प्राप्त हो जायें, अपने देह, मन, इन्द्रियों से परे, इन सबको सत्ता देने वाले उस अव्यक्त स्वरूप को पहचानने की क्षमता हममें आ जायें यह आत्मकृपा है।

आत्मज्ञान हो लेकिन ज्ञान होने का अभिमान न हो तो समझ लेना की आत्मकृपा है। अपने को ज्ञान हो जाये फिर दूसरे अज्ञानी, मूढ़ दिखें और अपने को श्रेष्ठ मानने का भाव आये तो यह ज्ञान नहीं, ज्ञान का भ्रम होता है क्योंकि ज्ञान से सर्वव्यापक वस्तु का बोध होता है। उसमें अपने को पृथक करके दूसरे को हीन देखने की दृष्टि रह ही नहीं सकती। फिर तो भावसहित सब अपना ही स्वरूप दिखता है।

गर्मी-सर्दी देह को लगती है, मान-अपमान, हर्ष-शोक मन में होता है तथा राग-द्वेष मति के धर्म होते हैं यह समझ में आ जाये तो मति के साथ, मन के साथ, इन्द्रियों के साथ हमारा जो तादात्म्य जुड़ा है वह तादात्म्य दूर हो जाता है। शरीर चाहे कितना भी सुडौल हो, मजबूत हो, मन चाहे कितना भी शुद्ध और पवित्र हो, बुद्धि एकाग्र हो लेकिन जब तक अपने स्वरूप को नहीं जाना तब तक न जाने कब शरीर धोखा दे दे? कब मन धोखा दे दे? कब बुद्धि धोखा दे दे? कोई पता नहीं। क्योंकि इन सबकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है और प्रकृति परिवर्तनशील है।

संसार की चीजें बदलती हैं। शरीर बदलता है। अन्तःकरण बदलता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि से जो कुछ देखने में आता है वह सब व्यक्त है। भूख-प्यास भी तो मन से देखने में आती है। सर्दी-गर्मी का पता त्वचा से चलता है किन्तु उसमें वृत्ति का संयोग होता है अतः वह भी तो व्यक्त ही है। इसीलिए भगवान कहते हैं किः ‘जो मूढ़ लोग हैं वे मेरे अव्यक्त स्वरूप को नहीं जानते और मुझे जन्मने-मरने वाला मानते हैं। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम, अविनाशी, परम भाव को न जानते हुए, मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जानकर व्यक्तिभाव को प्राप्त होते हैं।

….और मजे की बात है कि जो आदमी जहाँ है और जैसा है, वहीं से और वैसा ही वह दूसरे को देखता है।

बुद्धिहीन से तात्पर्य अँगूठाछाप से नहीं है वरन् जिसको पाने के लिए मनुष्य जन्म मिला है, जिस तत्त्व को समझने के लिए बुद्धि मिली है उस तत्त्व में बुद्धि के न लगाकर हीन पदार्थों में उसे खर्च कर दिया, वह बुद्धिहीन है।

भगवान ने क्रियाशक्ति दी है तो क्रियाशक्ति से क्रिया को बढ़ाकर अपने को जंजाल में न डालें लेकिन क्रियाशक्ति को सत्कर्म में लगाकर अनंत जन्मों के कर्मों को काटने का प्रयत्न करें। जैसे काँटे से काँटा निकाला जाता है ऐसे ही कर्म से कर्म काटे जायें।

ईश्वर ने बुद्धिशक्ति दी है तो बुद्धि से हम जगत के पदार्थों के साथ बँधे नहीं लेकिन जहाँ से बुद्धि को सत्ता मिलती है उस अव्यक्त स्वरूप में बुद्धि को लगायें ताकि बुद्धि बुद्धि न बचे बल्कि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाये।

बुद्धि को ऋतंभरा प्रज्ञा बनाने के दो तरीके हैं-

योगमार्ग और ज्ञानमार्ग।

योगमार्ग में धारणा-ध्यान करके, चित्त की वृत्ति का निरोध करके अपने स्वरूप का अनुसंधान किया जाये। बारंबार निरोधाकार वृत्ति बन जाये तो इससे भी बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा होने लगती है।

ज्ञानमार्ग के अनुसार दूसरा तरीका यह है कि बारंबार उस सच्चिदानंदघन, अज, अविनाशी, शुद्ध, बुद्ध, साक्षी, दृष्टा, असंग, निर्विकार, चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया जाये और जगत का व्यवहार करते हुए, बातचीत करते हुए फिर जगत का बाध कर दिया जाये…. यह ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ की प्रक्रिया है। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः ”कोई ‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण बार-बार पढ़े और आत्मज्ञान न हो तो राम बादशाह सिर कटायेगा।”

‘श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण’ में लीलावती, चुडाला, मंकी ऋषि आदि की कथाएँ आयेंगी और बाद में वशिष्ठ जी महाराज कहेंगे किः “हे रामजी ! वास्तव में बना कुछ नहीं।यह चित्त का फुरना मात्र है।” यही बात शंकराचार्य जी ने कही हैः

नास्ति अविद्या मनसोऽतिरक्ता

मनैवऽविद्या भवबंध हेतु।

तस्मिन्विलीने सकलं विलीनं

तस्मिन्जिगीर्णे सकलं जिगीर्णम्।।

यह अविद्या मन से अलग नहीं है। माया… माया…. माया… माया कोई लाल, पीली, हरी या सफेद साड़ी पहनी हुई महिला नहीं है। माया का मतलब हैः या मा सा माया। जो है नहीं फिर भी दिखे उसका नाम है माया। यह जो कुछ भी दिखता है वह नहीं है। जो नहीं है वह दिख रहा है और जो है वह दिखता नहीं है।

जो है वह दिखता क्यों नहीं? क्योंकि वह अव्यक्त है और हम लोग जीते हैं व्यक्त में। हम लोग व्यक्त होने वाले को मैं मानते हैं तो व्यक्त सच्चा लगता है लेकिन जिसके आधार पर है, उसका पता नहीं।

चित्त का निर्माण

 

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चित्त का निर्माण

एक समय था जब बूँद भी दरिया होकर डुबाया करती थी, गौ का खुर भी खाई होकर गिराया करता था लेकिन जब सत्संग में गये, गुरूओं की कृपा को पचाया तब अनुकूलता और प्रतिकूलता के दरिये भी बूँद से मालूम होते हैं। आत्मज्ञान की महिमा ऐसी है। साधक जब आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता है तब जीवन से सारे दुःख विदा होने लगते हैं।

ध्यान का मतलब केवल चुपचाप हो जाना नहीं है। ध्यान में चित्त अत्यंत एकाग्र हो जाय, शान्त हो जाय, स्थिर हो जाय उससे भी वह ऊँची अवस्था है कि चित्त का निर्माण हो। चित्त का शान्त होना एक बात है और चित्त का निर्माण होना दूसरी बात है। चित्त शान्त हो जायेगा उतनी देर शान्ति मिलेगी, आनन्द आयेगा, बाद में फिर जगत सच्चा भासेगा, थोड़ा सा सुख आकर्षित कर देगा, थोड़ा सा दुःख दबा देगा। लेकिन ध्यान में अगर आत्मविचार आता है, ब्रह्मविचार आता है, परमात्मभाव के संस्कारों को दुहराकर आत्माकार भाव पैदा होते हैं तो उससे चित्त का निर्माण होता है। चित्त के शान्त हो जाने से भी चित्त का निर्माण होना ऊँची बात है।

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ। इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया। वे भी दिन थे कि जब बूँद भी दरिया होकर दिखती थी और हमें डुबा ले जाती थी। जरा सा अपमान भी दरिया होकर दिखता था। जरा सा हवा का झोंका भी आँधी की नाईं दिखता था। लेकिन जब सत्संग और गुरूदेव की कृपा से, आत्मवेत्ता महापुरूष के उपदेश की कृपा से बड़े-बड़े दरिये भी कतरों की नाईं दिखते हैं। क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।

मोहमूल परमारथ नाँही।।

चित्त का अज्ञान से निर्माण हुआ इसीलिए यह जगत सत्य भासता है और जरा-जरा सी बातें सुख-दुःख, आकर्षण, परेशानी देकर हमें नोंच रही हैं।

ध्यान के द्वारा, सत्संग के द्वारा चित्त का ठीक रूप में निर्माण करना है, चित्त का परिमार्जन करना है। चित्त शान्त हो गया तो उसके संस्कार दब गये। जब उठे तो संस्कार फिर चालू हो गये। नींद में गये ते मैं यह हूँ…. मैं वह हूँ… ये सब संस्कार दब गये। नींद में कर्जे की चिन्ता नहीं रहती। लेकिन ये दुःख दूर नहीं हुए क्योंकि चित्त में जो संस्कार पड़े हैं वे गये नहीं। ये संस्कार दबे हैं। नींद से उठने पर सारा प्रपंच चालू हो जायगा, सारी चिन्ताएँ सिर पर सवार हो जायगी।

ध्यान-भजन का लक्ष्य यह नहीं है कि तुम्हारा चित्त केवल स्थिर हो जाय, बस। ध्यान-भजन का लक्ष्य है चित्त स्थिर हो और साथ ही साथ चित्त का निर्माण हो। ब्रह्माकार वृत्ति से, ब्रह्माकार भाव से चित्त का निर्माण होगा तो तुम्हारे चित्त पर कल्पित संसार के सुख-दुःख की ठोकर नहीं लगेगी। मिथ्या संसार का आकर्षण नहीं होगा। तुम्हारे हृदय में संसार का आकर्षण नहीं होगा तो वासना नहीं उठेगा। वासना नहीं उठेगी तो दुबारा जन्म लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका मोक्ष हो जायगा, बेड़ा पार हो जायगा।

पूजा करते हैं ठाकुरजी की, मंदिर में जाते हैं, मस्जिद में जाते हैं, गिरजाघर में जाते हैं लेकिन चित्त का निर्माण नहीं करते हैं तो संसारयात्रा का अन्त नहीं आता। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढ़ाः पदमव्ययं तत्।।

‘जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं’ – वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है।

चित्त के साथ, मन-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य का जो संग है, संसार के सम्बन्धों से जो दोष लग जाता है वह गिरा देता है। चित्त का ठीक से निर्माण हो जाय तो अध्यात्म में नित्य रमण हो जाय, कामनाएँ निवृत्त हो जायें, द्वन्द्वों से मुक्ति हो जाये। सुख और दुःख, मान और अपमान, अनुकूलता और प्रतिकूलता यश और अपयश, तन्दुरूस्ती और बीमारी, जीवन और मृत्यु, ये सब द्वन्द्व हैं। जो तन्दुरूस्ती से सुखी है वह बीमारी से दुःखी होगा। जो यश से सुखी होता है वह अपयश से दुःखी होगा। जो जीने में सुख मानेगा वह मरने में दुःखी होगा। लेकिन जीना मरना, मान-अपमान ये सब चित्त में देहात्मभाव के संस्कार पड़े हैं। अगर चित्त का निर्माण हो गया कि जीना मरना ये सब मेरा नहीं, माया का है, मेरा नहीं, इस देहरूपी खिलौने का है, यह देहरूपी खिलौने कई बार जीते हुए दिखते है, कई बार मरते हुए दिखते हैं फिर भी मेरी कभी मौत नहीं होती, तो शूली पर चढ़ते हुए भी दुःख नहीं होगा। लोगों को लगेगा कि मनसूर शूली पर चढ़े, ईसा क्रॉस पर चढ़े, अमुक बुद्ध पुरूष ने ध्यान करते हुए शरीर छोड़ा और मर गये। लोगों को ऐसा लगेगा लेकिन उन महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है। बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें। ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त। इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।

सारे जप, तप, सेवा, पूजा, यज्ञ, होम, हवन, दान, पुण्य ये सब चित्त को शुद्ध करते हैं, चित्त में पवित्र संस्कार भरते हैं। प्रतिदिन कुछ समय अवश्य निष्काम कर्म करना चाहिए। चित्त के कोष में कुछ आध्यात्मिकता की भरती हो। तिजोरी को भरने के लिए हम दिनरात दौड़ते हैं। जेब को भरने के लिए छटपटाते हैं लेकिन तिजोरी और जेब तो यहीं रह जायेंगे। हृदय की तिजोरी साथ में चलेगी। इस आध्यात्मिक कोष को भरने के लिए दिन भर में कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। संध्या-वन्दन, पूजा-प्रार्थना, ध्यान-जप, निष्काम कर्म इत्यादि के द्वारा चित्त का निर्माण कीजिये।

उच्च विचार करते हुए हृदय में खुले आकाश की विशालता भर जाने दो। ॐकार का पवित्र जप करते-करते हृदय को विशाल होता अनुभव करो। शान्ति और आनन्द से हृदय भरा जा रहा है। यह आत्मानन्द की… विशुद्ध परमात्मा की, चिदानन्द-स्वरूप परमात्मा की झलक पाने का तरीका है।

 

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

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विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

 

जब भगवान के सिवाय सब बेकार लगे तो समझो कि वह पहली भूमिका पर पहुँचा है । उसके लिए विघ्न-बाधाएँ साधन बन जाएँगी । विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है । विघ्न-बाधाएँ नहीं आयें तो संगीत छिड़ेगा नहीं ।

भौंरी कीड़े को उठाकर अपने बिल में रखती है । एक डंक मारती है, वह कीड़ा छटपटाता है । उसके शरीर से पसीने जैसा कुछ प्रवाह निकलता है । फिर भौंरी जब दूसरा डंक मारती है तब कीड़ा तेजी से छटपटाता है और वह पसीना कड़ा हो जाता है, जाला बन जाता है । जब तीसरा डंक मारती है तो कीड़ा खूब छटपटाता है, बहुत दुःखी होता है मगर उस डंक के कारण पसीने से जो जाला बना है उसी में से पंख फूट निकलते हैं और वह उड़ान भरता है ।

वैज्ञानिकों ने कीड़े में से मकड़ी बनने की इस प्रक्रिया को देखा । भौंरी के द्वारा तीसरे डंक सहने की तीव्र पीड़ा से उन कीड़ों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बारीक कैंची बनाई और तीसरे डंक से कीड़ा छटपटाकर जाला काटे उसकी अपेक्षा उन्होंने कैंची से वह जाला काट दिया । कीड़े को राहत मिली, पीड़ा तो नहीं हुई, मगर फिर उसके पंख नहीं फूटे । उड़ान भरने की योग्यता उसमें नहीं आयी ।

ऐसे ही परमात्मा जब अपने साधक को अपनी दिव्य अनुभूति में उड़ान भरवाते हैं तब उसको चारों तरफ से विघ्न-बाधाएँ देते हैं ताकि उसका विचारबल, मनोबल, समझशक्ति एवंआत्मशक्ति बढ़ जाये । मीरा के लिए परमात्मा ने राणा को तैयार कर दिया । नरसिंह मेहता का भाई ही उनका विरोध करता था, साथ में पूरी नगरी जुड़ गयी । शबरी भीलनी हो, चाहे संतकबीर हो, चाहे एकनाथ जी हों या संत तुकाराम हों, कोई भी हो, लोग ऐसे भक्तों के लिए एक प्रकार का जाला बना लेते हैं । एकनाथ जी महाराज के खिलाफ हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर एक चांडाल चौकड़ी बनायी थी ।

जैसे कीड़े के लिए तीसरा डंक पंख फूट निकलने के लिए होता है ऐसे ही प्रकृति की ओर से यह सारा खिलवाड़ साधक के उत्थान के लिए होता है । जिन्हे सत्संग का सहारा नहीं है, पहली दूसरी भूमिका में दृढ़ता नहीं है वे हिल जाते हैं ।

बुद्ध के मन में एक बार आया कि यहाँ तो कोई पहचानता भी नहीं, खाने का भी ठिकाना नहीं है, लोग मुझ पर थूकते हैं, हालाँकि मैं उन्हें कुछ कहता भी नहीं । यह भी कोई ज़िन्दगी है! चलो, वापस घर चलें । उस समय वे सिद्धार्थ थे । सत्संग का सहारा नहीं था । पहली भूमिका में दृढ़ता चाहिए । बचपन का वैराग्य हो तो ठीक है मगर बुढ़ापे में वैराग्य जगा है या फिर भी भोग भोगने के बाद, बच्चों को जन्म देने के बाद पहली भूमिका मिली हो तो जरा कमजोर है । बुद्ध के मन में आया कि चलो घर जायें । उन्हीं विचारों में खोये से बैठे थे । इतने में देखते हैं कि सामने पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया । सिद्धार्थ उसको ध्यान से देख रहे थे । उन्होंने सोचा कि यह कोई झूठी घटना नहीं है । यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

सिद्धार्थ की पहली भूमिका थी । अपने आप संस्कार जग गये । सिद्धार्थ ने निश्चय कर लियाः “कार्यं साधयामि व देहं पातयामि । या तो कार्य साध लूँगा या मर जाऊँगा । महल में भी एक दिन मर ही जाना है । साधना करते-करते भी मर जाऊँगा तो हर्ज नहीं । ऐसा सोचकर पक्की गाँठ बाँध ली और चल पड़े । सात साल के अन्दर ही उन्हें परम शांति मिल गयी ।

जब आदमी के शुभ विचार जगते हैं तब स्नान, दान, सेवा, स्मरण, सत्संग परहित उसे अच्छे लगते हैं । जिसे पहली भूमिका प्राप्त नहीं हुई उसे इन सब कार्यों के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी । वहाँ से वह पलायन हो जायेगा । उसे वह सब अच्छा नहीं लगेगा । वाह-वाही पाने, यश कमाने को तो आगे आ जायेगा पर फिर खिसक जायेगा । ऐसे लोग फिर पशु, पक्षी, कीट की निम्न योनियों में जाते हैं ।

दूसरी भूमिका होती है शुभेच्छा । ‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि परमात्मा मिले, ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह से देहातीत तत्त्व का साक्षात्कार हो जाये? अफसर, साहब, सेठ, साहूकार बन गये मगर आखिर क्या?’ ऐसा विचार उसे आता रहता है ।

यह दूसरी भूमिका जिसे प्राप्त हो गई वह घर में भी है तो घर वाले उसे दबा नहीं सकेंगे । सत्संग और सत्कर्म में रूचि रहेगी । भोग-वासना फीकी पड़ जायेगी । मगर फिर रोकने वाले आ जायेंगे । उसे महसूस होगा कि ईश्वर के रास्ते में जाने में बहुत सारे फायदे हैं । विघ्न करने वाले साधक के आगे आखिर हार मान जायेंगे । ईश्वर का दर्शन तो इतने में नहीं होगा मगर जो संसार कोसता था वह अनुकूल होने लगेगा ।

उसके बाद तीसरी भूमिका आयेगी, उसमें सत्संग के वचन बड़े मीठे लगेंगे । उन्हीं वचनों का निदिध्यासन करेगा, ध्यान करेगा, श्वासोच्छोवास को देखेगा । ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ’ ऐसा चिन्तन-ध्यान करेगा । गुरुदेव का ध्यान करेगा तो गुरुदेव दिखने लगेंगे । गुरुदेव से मानसिक बातचीत भी होगी, प्रसन्नता और आनंद आने लगेगा । संसार का आकर्षण बिल्कुल कम हो जायेगा। फिर भी कभी-कभी संसार लुभाकर गिरा देगा । फिर से उठ खड़ा होगा । फिर से गिरायेगा, फिर खड़ा होगा । परमात्मा का रस भी मिलता रहेगा और संसार का रस कभी-कभी खींचता रहेगा । ऐसा करते-करते चौथी भूमिका आ जाती है तब साक्षात्कार हो जाता है फिर संसार का आकर्षण नहीं रहता । जब स्वप्न में से उठे तो फिर स्वप्न की चीजों का आकर्षण खत्म हो गया । चाहे वे चीज़ें अच्छी थीं या बुरी थीं । चाहे दुःख मिला, चाहे सुख मिला, स्वप्न की चीज़ें साथ में लेकर कोई भी आदमी जग नहीं सकता । उन्हें स्वप्न में ही छोड़ देता है । ऐसे ही जगत की सत्यता साथ में लेकर साक्षात्कार नहीं होता । चौथी भूमिका में जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है । वृत्ति व्यापक हो जाती है । वह महापुरुष होते हुए भी अनेक ब्रह्माण्डों में फैल जाता है । उसको यह अनुभव होता है कि सूरज मुझमें है, चन्द्र मुझमें है, नक्षत्र मुझमें हैं । यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद भी मुझमें हैं । ऐसा उन महापुरुषों का अनुभव होता है । उनको कहा जाता हैब्रह्मवेत्ता । वे ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं ।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता

ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरुष विधाता

ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाईं आधा आखर

नानक! ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर

वेदान्तनिष्ठ महापुरूष का कृपा-प्रसाद

 

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वेदान्तनिष्ठ महापुरूष का कृपा-प्रसाद

अपनी समझ या स्मृति का सदुपयोग करके जो सन्तुष्ट रहते हैं वे योगी हैं। वे अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में अर्पित कर देते हैं।

हम लोग क्या करते हैं ? हम अपने मन और बुद्धि को हमारी मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं, दूसरों की मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। लोगों की नजरों में हम भले दिखें ऐसी चेष्टाएँ करते कर देते हैं। लोगों की नजरों में हम भले दिखें ऐसी चेष्टाएँ करते हैं। हजार-हजार प्रकार की बुद्धि वाले, हजार-हजार विचारवाले हजारमुखी संसार में आप सबको सन्तुष्ट नहीं कर सकते।

आप कैसा भी शरीर बनायें, कैसा भी आचरण करें, कैसा भी व्यवहार चलायें लेकिन सब आपसे सन्तुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि सब अपने-अपने ढंग की मान्यताओं से जीते हैं। उनकी जिस समय जैसी मान्यताएँ होती हैं ऐसा आपके प्रति भाव, अभाव, श्रद्धा-अश्रद्धा, अपना परायापन आदि का भाव आ जाता है।

कोई आदमी आप पर श्रद्धा करता है इसलिए आप बड़े हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। कोई आपसे नफरत करता है और आप छोटे हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। पाँच पच्चीस, सौ-दो सौ आदमी वाहवाही करें तो आप बड़े हो जाएँ या पच्चीस-पचास आदमी आपकी निन्दा करें तो आप छोटे हो जायें तो आप अपने आपमें नहीं आये। आप निःसंशय नहीं हुए। आप जितात्मा नहीं हुए। आप प्रशान्तात्मा नहीं हुए। आप ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित नहीं हुए।

ब्रह्मचारी एकाकी रहता है, अकेले में रहता है। एकाकी और अकेले में रहने से ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा होती है। अधिक संपर्क में ब्रह्मचर्य का नाश होता है। ब्रह्मचर्य माने सब इन्द्रियों का संयम और मन का ब्रह्म में विचरण।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहने वाला योगी संतुष्ट होता है। वह निष्पाप हो जाता है। एक बार परमात्मा को जान लिया और निःसंशय हो गया तो वह सिद्ध बना हुआ योगी व्यवहार में आने पर भी विचलित नहीं होता। व्यवहार में तो विक्षिप्त कर दें ऐसे प्रसंग तो आते ही हैं फिर भी ज्ञानी को अपने ब्रह्म-स्वभाव की स्मृति यथावत् बनी रहती है। व्यवहार में ज्ञानी भीतर से अपने को कुछ विशेष मानकर नहीं रहता। ज्ञानी का और अज्ञानी का खान-पान, रहन-सहन, उठ-बैठ, बोल-चाल आदि सब लोकव्यवहार एक समान दिखेगा लेकिन दोनों की भीतरी समझ में बहुत बड़ा फासला होता है। अज्ञानी ज्ञानी को मानेगा कि ये ज्ञानी हैं, महान् हैं….. लेकिन ज्ञानी अपने को यह नहीं मानेगा कि मैं इतना महान् हूँ या तुच्छ हूँ।

हम लोगों में परचर्चा करने की आदत होती है। पर की चर्चा में स्व की प्रीति खत्म हो जाती है। जब परचर्चा में प्रवृत्त होने लगो तब सजग होकर अपने आपको पूछो कि हमारा जन्म दूसरों के दोष देखने के लिए हुआ है कि अपने को प्रभु में मिलाने के लिए हुआ है ? दूसरों के दोष देखने की अपेक्षा गुण देखने चाहिए। गुण देखने की अपेक्षा उनमें परमात्मा देखना चाहिए।

सांख्य के द्वारा तत्त्वज्ञान होने में अड़चन यह आती है कि हमारी देह में प्रीति होती है। प्राणीमात्र को अपने देह में प्रीति होती है। इसीलिए तत्त्वज्ञान जल्दी से नहीं होता। तत्त्वज्ञान हुए बिना सब संशय दूर नहीं होते। दृष्टा-दृश्य का विवेक, साक्षित्व का विवेक तो बिना वेदान्त के भी आदमी कर सकता है। तत्त्वज्ञान पाने के लिए दृश्य-दृष्टा के विवेके से भी आगे जाना पड़ेगा। इसके लिए वेदान्त चाहिए। वेदान्त-सिद्धान्त का ज्ञान चाहिए। वेदान्तनिष्ठ महापुरूष का कृपा-प्रसाद चाहिए।

 

सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

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सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

रामकृष्ण परमहंस को तो कई शिष्य मानते थे लेकिन शिष्यों की जितनी योग्यता थी उसके अनुसार उनको लाभ मिला। लाभ तो सबको अवश्य मिलता है। बरसात कैसे होती है हम सब जानते हैं। सूरज की तपन से सागर का पानी वाष्पीभूत होता है। पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है, बादल बनते हैं, ठण्डे होकर बरसात के रूप में बरसते हैं।

सागर का पानी अगर स्वाति नक्षत्र में बरसात बनकर गिरता है और इसकी एक बूँद सीप के मुँह में पड़ जाती है तो सागर के गर्भ में जाकर समय पाकर वह बूँद मोती बन जाती है। है तो सागर का पानी। लेकिन बादल के जरिये जब बरसता है तो मोती में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि पात्र सीप मिल गई और स्वाति नक्षत्र का संयोग मिल गया।

ऐसे ही अमर स्वाति नक्षत्र रूपी सदगुरु हों और सीप रूपी सत् शिष्य हो तो यहीं संसार रूपी सागर की बातें लेकर संसार के गर्भ में ही शिष्य के हृदय में परमात्मा रूपी मोती पका सकते हैं वे महापुरुष।

है तो सागर का पानी। बादल बनकर बरसता है तो कहीं गंगा बनता है कहीं यमुना, कहीं नर्मदा बनता है कहीं गोदावरी, कहीं और कोई नदी कहीं नाला, कहीं सरोवर कहीं बाँध। वही पानी सागर में बरसता है तो खारा बन जाता है और स्वाति नक्षत्र में सीप के मुँह में पड़ता है तो मोती बन जाता है।

किसी सत्संग समारोह की पूर्णाहुति करते समय एक राजनेता ने घोषणा कीः “सब धर्मों का ज्ञान देनेवाले, दिव्य भक्ति, योग, ज्ञान से परिपूर्ण गुरु महाराज पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज का प्रवचन सुनकर हम लोग पवित्र हुए। लेकिन इस आयोजन को तो मैं सफल तब मानूँगा कि जब सब लोग पू. बापू की बातों पर अमल करें…….।”

मैंने देखा कि यह गड़बड़ कर दी। सब लोग अमल नहीं करेंगे तो क्या आयोजन व्यर्थ हो गया ? मैंने उनको रोककर कहाः

“सत्संग तो बरसात है। बरसात का जल सीप के मुँह में गिरे तब भी सफल है और किसी पहाड़ी पर गिरे तब भी सफल है। बरसात कभी व्यर्थ नहीं जाती। और जगह तो ठीक लेकिन डामर की सड़क पर जहाँ कोई खेती वेती नहीं होती वहाँ बरसात पड़ती है तो गोबर और डीजल के दाग तो धुलते ही हैं। ऐसे ही कठोर हृदय पर भी सत्संग की बरसात पड़े तो पाप के दाग धुलते हैं।”

सत्संग का आयोजन तो सफल होगा। लोग अमल करें तो मोती पकायें। अमल नहीं भी करें तो दिल रूपी सड़क तो साफ हो ही गई भैया ! आयोजन सफल ही है।

जरूरी नहीं कि सब के सब लोग अमल करके भगवान का साक्षात्कार कर लें। भगवान का साक्षात्कार कर लें तो बेड़ा पार है और नहीं भी करें, केवल सुनते हैं तो भी हृदय कोमल बनता है। अहंकार रूपी डीजल के दाग धुलते हैं, मोह रूपी गोबर धुलता है। दिल अगर कठोर भी होता है तो उसमें कुछ न कुछ तो फर्क पड़ जाता है। कुछ न कुछ तो स्वच्छ हो ही जाता है।

सत्संग रूपी अमृत कठोर दिल रूपी सड़क पर गिरता है तो भी काम करता है और खेड़ी हुई ऊर्वरा भूमि की तरह भक्ति भाव के संस्कारों से युक्त हृदय पर सत्संग-अमृत की वृष्टि होती है तो भगवद भक्ति के फल उगते हैं। अगर ज्ञान के संस्कारवाले दिल पर सत्संग की बरसात होती है तो वहाँ ज्ञान रूपी फल लगते हैं। योगाभ्यासी के हृदय में योगसिद्धि रूप फल लगते हैं। सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं-

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध।।

रक्षक भी भक्षक बन सकता है।

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रक्षक भी भक्षक बन सकता है।

भगत जगत को ठगत है जगत को ठगत न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।

सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों का खजाना क्यों लूटें ? नहीं…। नहीं….। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।

एकनाथ जी कहते हैं- “भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।”

“नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?”

कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।

उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।

एकनाथ जी ने कहाः “देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?”

“नहीं महाराज ! “गोदावरी माता की जय….’ करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय…. बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।”

चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः “अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?…. और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !

साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।”

कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।

जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं।

 

परमात्मा का पूरा पता ! तात्विक सत्संग

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जानिए भगवान क्या हैं ? किधर हैं और उनसे हमारी मुलाकात कैसे हों ?

क्या आपने कभी सोचा की हमे भगवन का ‘पूरा पता’ मिलेगा !

नहीं ना ! पर संतों की ऐसी कृपा बरसती रहती हीं की हम अधिकारी हों या ना हों फिर भी ऐसे ज्ञान के भंडार हमारे लिए वे खुले चोदते हैं !

सुनिए यहा पूरा पता भगवान का !

तात्विक सत्संग परमात्मा का पूरा पता

ज्ञानवान का आत्मपद

some hindu sants throughout agesज्ञानवान आत्मपद को पाकर आनंदित होता है और वह आनंद कभी दूर नहीं होता,

क्योंकि उसको उस आनंद के आगे अष्टसिद्धियाँ तृण के समान लगती हैं।

हे रामजी ! ऐसे पुरुषों का आचार तथा जिन स्थानों में वे रहते हैं, वह भी सुनो।

कई तो एकांत में जा बैठते हैं,

कई शुभ स्थानों में रहते हैं,

कई गृहस्थी में ही रहते हैं,

कई अवधूत होकर सबको दुर्वचन कहते हैं,

कई तपस्या करते हैं,

कई परम ध्यान लगाकर बैठते हैं,

कई नंगे फिरते हैं,

कई बैठे राज्य करते हैं

कई पण्डित होकर उपदेश करते हैं,

कई परम मौन धारे हैं,

कई पहाड़ कीकन्दराओं में जा बैठते हैं,

कई ब्राह्मण हैं,

कई संन्यासी हैं,

कई अज्ञानी की नाईं विचरते हैं

कई आकाश में उड़ते हैं

और तो क्या कहे ज्ञानी के बारे में उनकी लीला तो वे ही जाने |

 

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