Blog Archives

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

asaramji

विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है ।

 

जब भगवान के सिवाय सब बेकार लगे तो समझो कि वह पहली भूमिका पर पहुँचा है । उसके लिए विघ्न-बाधाएँ साधन बन जाएँगी । विघ्न-बाधाएँ जीवन का संगीत है । विघ्न-बाधाएँ नहीं आयें तो संगीत छिड़ेगा नहीं ।

भौंरी कीड़े को उठाकर अपने बिल में रखती है । एक डंक मारती है, वह कीड़ा छटपटाता है । उसके शरीर से पसीने जैसा कुछ प्रवाह निकलता है । फिर भौंरी जब दूसरा डंक मारती है तब कीड़ा तेजी से छटपटाता है और वह पसीना कड़ा हो जाता है, जाला बन जाता है । जब तीसरा डंक मारती है तो कीड़ा खूब छटपटाता है, बहुत दुःखी होता है मगर उस डंक के कारण पसीने से जो जाला बना है उसी में से पंख फूट निकलते हैं और वह उड़ान भरता है ।

वैज्ञानिकों ने कीड़े में से मकड़ी बनने की इस प्रक्रिया को देखा । भौंरी के द्वारा तीसरे डंक सहने की तीव्र पीड़ा से उन कीड़ों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक बारीक कैंची बनाई और तीसरे डंक से कीड़ा छटपटाकर जाला काटे उसकी अपेक्षा उन्होंने कैंची से वह जाला काट दिया । कीड़े को राहत मिली, पीड़ा तो नहीं हुई, मगर फिर उसके पंख नहीं फूटे । उड़ान भरने की योग्यता उसमें नहीं आयी ।

ऐसे ही परमात्मा जब अपने साधक को अपनी दिव्य अनुभूति में उड़ान भरवाते हैं तब उसको चारों तरफ से विघ्न-बाधाएँ देते हैं ताकि उसका विचारबल, मनोबल, समझशक्ति एवंआत्मशक्ति बढ़ जाये । मीरा के लिए परमात्मा ने राणा को तैयार कर दिया । नरसिंह मेहता का भाई ही उनका विरोध करता था, साथ में पूरी नगरी जुड़ गयी । शबरी भीलनी हो, चाहे संतकबीर हो, चाहे एकनाथ जी हों या संत तुकाराम हों, कोई भी हो, लोग ऐसे भक्तों के लिए एक प्रकार का जाला बना लेते हैं । एकनाथ जी महाराज के खिलाफ हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर एक चांडाल चौकड़ी बनायी थी ।

जैसे कीड़े के लिए तीसरा डंक पंख फूट निकलने के लिए होता है ऐसे ही प्रकृति की ओर से यह सारा खिलवाड़ साधक के उत्थान के लिए होता है । जिन्हे सत्संग का सहारा नहीं है, पहली दूसरी भूमिका में दृढ़ता नहीं है वे हिल जाते हैं ।

बुद्ध के मन में एक बार आया कि यहाँ तो कोई पहचानता भी नहीं, खाने का भी ठिकाना नहीं है, लोग मुझ पर थूकते हैं, हालाँकि मैं उन्हें कुछ कहता भी नहीं । यह भी कोई ज़िन्दगी है! चलो, वापस घर चलें । उस समय वे सिद्धार्थ थे । सत्संग का सहारा नहीं था । पहली भूमिका में दृढ़ता चाहिए । बचपन का वैराग्य हो तो ठीक है मगर बुढ़ापे में वैराग्य जगा है या फिर भी भोग भोगने के बाद, बच्चों को जन्म देने के बाद पहली भूमिका मिली हो तो जरा कमजोर है । बुद्ध के मन में आया कि चलो घर जायें । उन्हीं विचारों में खोये से बैठे थे । इतने में देखते हैं कि सामने पेड़ पर एक कीड़ा चड़ रहा है । हवा का झोंका आया और गिर पड़ा । फिर उसने चढ़ना शुरु किया । हवा का दूसरा झोंका आया और फिर गिर पड़ा । ऐसे वह कीड़ा सात बार गिरा और चढ़ा । आखिर वह आठवीं बार में चढ़ गया । सिद्धार्थ उसको ध्यान से देख रहे थे । उन्होंने सोचा कि यह कोई झूठी घटना नहीं है । यह तो संदेश है । एक साधारण कीड़ा अपने लक्ष्य पर पहुँच जाता है और मैं इन्सान होकर पीछे हट जाऊँ?

सिद्धार्थ की पहली भूमिका थी । अपने आप संस्कार जग गये । सिद्धार्थ ने निश्चय कर लियाः “कार्यं साधयामि व देहं पातयामि । या तो कार्य साध लूँगा या मर जाऊँगा । महल में भी एक दिन मर ही जाना है । साधना करते-करते भी मर जाऊँगा तो हर्ज नहीं । ऐसा सोचकर पक्की गाँठ बाँध ली और चल पड़े । सात साल के अन्दर ही उन्हें परम शांति मिल गयी ।

जब आदमी के शुभ विचार जगते हैं तब स्नान, दान, सेवा, स्मरण, सत्संग परहित उसे अच्छे लगते हैं । जिसे पहली भूमिका प्राप्त नहीं हुई उसे इन सब कार्यों के लिए फुर्सत ही नहीं मिलेगी । वहाँ से वह पलायन हो जायेगा । उसे वह सब अच्छा नहीं लगेगा । वाह-वाही पाने, यश कमाने को तो आगे आ जायेगा पर फिर खिसक जायेगा । ऐसे लोग फिर पशु, पक्षी, कीट की निम्न योनियों में जाते हैं ।

दूसरी भूमिका होती है शुभेच्छा । ‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि परमात्मा मिले, ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह से देहातीत तत्त्व का साक्षात्कार हो जाये? अफसर, साहब, सेठ, साहूकार बन गये मगर आखिर क्या?’ ऐसा विचार उसे आता रहता है ।

यह दूसरी भूमिका जिसे प्राप्त हो गई वह घर में भी है तो घर वाले उसे दबा नहीं सकेंगे । सत्संग और सत्कर्म में रूचि रहेगी । भोग-वासना फीकी पड़ जायेगी । मगर फिर रोकने वाले आ जायेंगे । उसे महसूस होगा कि ईश्वर के रास्ते में जाने में बहुत सारे फायदे हैं । विघ्न करने वाले साधक के आगे आखिर हार मान जायेंगे । ईश्वर का दर्शन तो इतने में नहीं होगा मगर जो संसार कोसता था वह अनुकूल होने लगेगा ।

उसके बाद तीसरी भूमिका आयेगी, उसमें सत्संग के वचन बड़े मीठे लगेंगे । उन्हीं वचनों का निदिध्यासन करेगा, ध्यान करेगा, श्वासोच्छोवास को देखेगा । ‘मैं आत्मा हूँ, चैतन्य हूँ’ ऐसा चिन्तन-ध्यान करेगा । गुरुदेव का ध्यान करेगा तो गुरुदेव दिखने लगेंगे । गुरुदेव से मानसिक बातचीत भी होगी, प्रसन्नता और आनंद आने लगेगा । संसार का आकर्षण बिल्कुल कम हो जायेगा। फिर भी कभी-कभी संसार लुभाकर गिरा देगा । फिर से उठ खड़ा होगा । फिर से गिरायेगा, फिर खड़ा होगा । परमात्मा का रस भी मिलता रहेगा और संसार का रस कभी-कभी खींचता रहेगा । ऐसा करते-करते चौथी भूमिका आ जाती है तब साक्षात्कार हो जाता है फिर संसार का आकर्षण नहीं रहता । जब स्वप्न में से उठे तो फिर स्वप्न की चीजों का आकर्षण खत्म हो गया । चाहे वे चीज़ें अच्छी थीं या बुरी थीं । चाहे दुःख मिला, चाहे सुख मिला, स्वप्न की चीज़ें साथ में लेकर कोई भी आदमी जग नहीं सकता । उन्हें स्वप्न में ही छोड़ देता है । ऐसे ही जगत की सत्यता साथ में लेकर साक्षात्कार नहीं होता । चौथी भूमिका में जगत का मिथ्यात्व दृढ़ हो जाता है । वृत्ति व्यापक हो जाती है । वह महापुरुष होते हुए भी अनेक ब्रह्माण्डों में फैल जाता है । उसको यह अनुभव होता है कि सूरज मुझमें है, चन्द्र मुझमें है, नक्षत्र मुझमें हैं । यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के पद भी मुझमें हैं । ऐसा उन महापुरुषों का अनुभव होता है । उनको कहा जाता हैब्रह्मवेत्ता । वे ब्रह्मज्ञानी बन जाते हैं ।

ब्रह्मज्ञानी को खोजे महेश्वर

ब्रह्मज्ञानी आप परमेश्वर

ब्रह्मज्ञानी मुगत जुगत का दाता

ब्रह्मज्ञानी पूरण पुरुष विधाता

ब्रह्मज्ञानी का कथ्या न जाईं आधा आखर

नानक! ब्रह्मज्ञानी सबका ठाकुर

Advertisements

आध्यात्मिक धन की भिक्षा

asaramji
आध्यात्मिक धन की भिक्षा

रवीन्द्रनाथ टैगोर जापान गये हुए थे। दस दिन तक हररोज शाम को 6 से 7 बजे तक उनकी गीताँजली पर प्रवचनों का कार्यक्रम था। लोग आकर बैठते थे। उनमें एक बूढ़ा भी आता था। वह बड़े प्यार से, अहोभाव से गुलाब की माला महर्षि के गले में पहनाता था। प्रतिदिन सभा के लोग आये उससे पहले आता था और कथा पूरी हो जाये, टैगोर खड़े हो जायें बाद में उठता था – ऐसा शील, शिष्टाचार उसके जीवन में था। जैसे एक निपुण जिज्ञासु अपने गुरुदेव के प्रति निहारे ऐसे वह टैगोर की तरफ निहार कर एक-एक शब्द आत्मसात करता था। साधारण कपड़ों में वह बूढ़ा टैगोर के वचनों से बड़ा लाभान्वित हो रहा था। सभा के लोगों को ख्याल भी नहीं आता था कि कौन कितना खजाना लिये जा रहा है।

एक घण्टे के बाद रवीन्द्रनाथ जब कथा पूरी करते तो सब लोग धन्यवाद देने के लिए, कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए नजदीक आकर उनके पैर छूते।

जो लोग फैशनेबल होकर कथा के चार शब्द सुनकर रवाना हो जाते हैं उनको पता ही नहीं कि वे अपने जीवन का कितना अनादर करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने सांदीपनि ऋषि के चरणों में रहकर सेवा सुश्रुषा की है। श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ मुनि के चरणों में इस आत्मविद्या के लिए अपने बहुमूल्य समय और बहुमूल्य पदार्थों को न्योछावर कर दिया।

टैगोर के चरणों में वह बूढ़ा प्रतिदिन नमस्कार करता। कथा की पूर्णाहुति हुई तो लोगों ने मंच पर सुवर्ण मुद्राएँ, येन (वहाँ के रूपये), फूल, फल आदि के ढेर कर दिए। वह बूढ़ा भी आया और बोलाः

“मेरी विनम्र प्रार्थना है कि कल आप मेरे घर पधारने की कृपा करें।”

बूढ़े के विनय-संपन्न आचरण से महर्षि प्रसन्न थे। उन्होंने भावपूर्ण निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया। बूढ़े ने कहाः “आपने मेरी प्रार्थना स्वीकार की है इसलिए मैं बहुत आभारी हूँ। खूब प्रसन्न हूँ…।” आँखों में हर्ष के आँसू छलकाते हुए वह विदा हुआ।

महर्षि ने अपने रहस्यमंत्री से कहाः “देखना ! वह बूढ़ा बड़ा भावनाशील है। मेरे प्रति उसकी गहरी श्रद्धा है। हमारे स्वागत की तैयारी में वह कहीं ज्यादा खर्च न कर बैठे। बाद में आर्थिक बोझा उसको कष्ट देगा। दो सौ येन उसके बच्चों को दे देना। कल चार बजे हम उसके घर चलेंगे।”

दूसरे दिन पौने चार बजे उस बूढ़े ने रोल्स रोयस गाड़ी लाकर खड़ी कर दी। गुलाब के फूलों से सजी हुई भव्य गाड़ी देखकर रवीन्द्रनाथ ने सोचा किः “किराये पर गाड़ी लाया होगा। कितना खर्च किया होगा !”

महर्षि गाड़ी में बैठे। रोल्स रोयस गाड़ी उठी। बिना आवाज के झूमती आगे बढ़ी। एक ऊँची पहाड़ी पर विशाल महल के गेट पर पहुँची। चपरासी ने सलाम मारते हुए गेट खोला। गाड़ी भीतर प्रविष्ट हुई। महल में से कई भद्र पुरुष, महिलाएँ, लड़के, लड़कियाँ आकर टैगोर का अभिवादन करने लगे। वे उन्हें भीतर ले गये। सोने की कुर्सी पर रेशमी वस्त्र बिछा हुआ था वहाँ बिठाया। सोने-चाँदी की दो सौ प्लेटों में भिन्न-भिन्न प्रकार के मेवे-मिठाई परोसे गये। परिवार के लोगों ने आदर से उनका पूजन किया और चरणों में बैठे।

रवीन्द्रनाथ चकित हो गये। बूढ़े से बोलेः “आखिर तुम मुझे कहाँ ले आये? अपने घर ले चलो न? इन महलों से मुझे क्या लेना देना?”

सादे कपड़ों वाले उस बूढ़े ने कहाः “महाराज ! यह मकान मेरा है। हम जो रोल्स रोयस गाड़ी में आये वह भी मेरी है और ऐसी दूसरी पाँच गाड़ियाँ हैं। ऐसी सोने की दो कुर्सियाँ भी हैं। ये लोग जो आपको प्रणाम कर रहे हैं वे मेरे पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र हैं। यह मेरे बेटों की माँ है। ये चार उसकी बहुएँ है। स्वामी जी मेरी दो मिलें हैं।”

“ओहो ! तो तुम इतने धनाढय हो फिर भी ऐसे सादे, गरीबों के जैसे कपड़ों में वहाँ आकर बैठते थे !”

“महाराज ! मैं समझता हूँ कि यह बाहर का सिंगार और बाहर का धन कोई वास्तविक धन नहीं है। जिस धन से आत्मधन न मिले उस धन का गर्व करना बेवकूफी है। वह धन कब चला जाये कोई पता नहीं। परलोक में इसका कोई उपयोग नहीं इसलिए इस धन का गर्व करके कथा में आकर बैठना कितनी नासमझी है? और इस धन को सँभालते-सँभालते जो सँभालने योग्य है उसको न सँभालना कितनी नादानी है?

महाराज ! ज्ञान के धन के आगे, भक्ति के धन के आगे यह मेरा धन क्या मूल्य रखता है? यह तो मुझसे मजदूरी करवाता है, लेकिन जब से आपके चरणों में बैठा हूँ और आपने जो आत्मधन दिया है वह धन तो मुझे सँभालता है। बाह्य धन मुझसे अपने को सँभलवाता है। सच्चा धन तो आत्मधन है जो मेरा रक्षण करता है। मैं सचमुच कृतज्ञ हूँ सदा के लिए आपका खूब आभारी रहूँगा। जीवनभर बाह्य धन को कमाने और सँभालने में मैंने अपने को नोंच डाला फिर भी जो सुख व शान्ति नहीं मिली वह आपके एक-एक घण्टे से मुझे मिलती गई। बाहर के वस्त्रालंकार को तुच्छ समझे और सादे कपड़े पहनकर, फ

टे चीथड़े पहनकर, कंगाल की भाँति आपके द्वारा पर भिखारी होकर बैठा और आध्यात्मिक धन की भिक्षा मैंने पाई है। हे दाता ! मैं धन्य हूँ।”

रवीन्द्रनाथ टैगोर का चित्त प्रसन्न हो गया।

जहाँ ज्ञान का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है। जहाँ ब्रह्मविद्या का आदर होता है वहाँ जीवन का आदर होता है, लक्ष्मी सुखदायी बनती है और स्थिर रहती है।

महर्षि बोलेः “सेठ ! बाह्य धन में ममता नहीं और भीतरी धन का आदर है इसलिए तुम वास्तव में सेठ हो। मैं भी आज धन्य हुआ। तुम्हारे जैसे भक्त के घर आकर मुझे महसूस हुआ कि मेरा कथा-प्रवचन करना सार्थक हुआ।

कई जगह जाते हैं तो लोग माँगते हैं। ‘यह खपे…. वह खपे….’ करके अपने को भी खपा देते हैं और हमारा समय भी खपा देते हैं। लेकिन तुम बुद्धिमान हो। नश्वर धन की माँग नहीं फिर भी दाता तुम्हें नश्वर धन दिये जा रहा है और शाश्वत धन की तुम्हारी प्यास भी बुझाने के लिए मुझे यहाँ भेज दिया होगा।”

धन वैभव होते हुए भी उसमें आस्था या आसक्ति न करे लेकिन जिससे सारा ब्रह्माण्ड और विश्व है उस विश्वेश्वर के वचन सुनकर, संत-महात्मा के चरणों में बैठकर, अपने अहं को गलाकर आत्मा के अनुभव में अपना जीवन धन्य कर ले, वही सच्चा धनवान है।

हे मानव ! तुझमें अपूर्व शक्ति, सौन्दर्य, प्रेम, आनन्द, साहस छुपा है। घृणा, उद्वेग, ईर्ष्या, द्वेष और तुच्छ वासनाओं से तेरी महत्ता का ह्रास होता जा रहा है। सावधान हो भैया ! कमर कस। अपनी संकीर्णता और अहंकार को मिटाता जा। अपने दैवी स्वभाव, शक्ति, उल्लास, आनन्द, प्रेम और चित्त के प्रसाद को पाता जा।

यह पक्की गाँठ बाँध लो कि जो कुछ हो रहा है, चाहे अभी तुम्हारी समझ में न आवे और बुद्धि स्वीकार न करे तो भी परमात्मा का वह मंगलमय विधान है। वह तुम्हारे मंगल के लिए ही सब करता है। परम मंगल करने वाले परमात्मा को बार-बार धन्यवाद देते जाओ…. प्यार करते जाओ… और अपनी जीवन-नैया जीवनदाता की ओर बढ़ाते जाओ।

ऐसा कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति नहीं  जो तुम्हारी आत्मशक्ति के अनुसार बदलने में राजी न हो। परंतु अपने भीतर का यह आत्मबल, यह संकल्पबल विकसित करने की युक्ति किसी सच्चे महापुरुष से सीखने को मिल जाये और उसका विधिवत् अनुष्ठान करे तो, नर अपने नारायण स्वभाव में इसी जन्म में जाग सकता है।

 

%d bloggers like this: