Blog Archives

भावना ही प्रेम का मूल है।

 

asaramji
भावना ही प्रेम का मूल है।

हरिबाबा से एक भक्त ने कहाः “महाराज ! यह अभागा, पापी मन रूपये पैसों के लिए तो रोता पिटता है लेकिन भगवान अपना आत्मा हैं, फिर भी आज तक नहीं मिलि इसके लिए रोता नहीं है। क्या करें ?”

हरिबाबाः “रोना नहीं आता तो झूठमूठ में ही रो ले।”

“महाराज ! झूठमूठ में भी रोना नहीं आता है तो क्या करें ?”

महाराज दयालु थे। उन्होंने भगवान के विरह की दो बातें कहीं। विरह की बात करते-करते उन्होंने बीच में ही कहा कि “चलो, झूठमूठ में रोओ।” सबने झूठमूठ में रोना चालू किया तो देखते-देखते भक्तों में सच्चा भाव जग गया।

झूठा संसार सच्चा आकर्षण पैदा करके चौरासी के चक्कर में डाल देता है तो भगवान के लिए झूठमूठ में रोना सच्चा विरह पैदा करके हृदय में प्रेमाभक्ति भी जगा देता है।

अनुराग इस भावना का नाम है कि “भगवान हमसे बड़ा स्नेह करते हैं, हम पर बड़ी भारी कृपा रखते हैं। हम उनको नहीं देखते पर वे हमको देखते रहते हैं। हम उनको भूल जाते हैं पर वे हमको नहीं भूलते। हमने उनसे नाता-रिश्ता तोड़ लिया है पर उन्होंने हमसे अपना नाता-रिश्ता नहीं तोड़ा है। हम उनके प्रति कृतघ्न हैं पर हमारे ऊपर उनके उपकारों की सीमा नहीं है। भगवान हमारी कृतघ्नता के बावजूद हमसे प्रेम करते हैं, हमको अपनी गोद में रखते हैं, हमको देखते रहते हैं, हमारा पालन-पोषण करते रहते हैं।’ इस प्रकार की भावना ही प्रेम का मूल है। अगर तुम यह मानते हो कि ‘मैं भगवान से बहुत प्रेम करता हूँ लेकिन भगवान नहीं करते’ तो तुम्हारा प्रेम खोखला है। अपने प्रेम की अपेक्षा प्रेमास्पद के प्रेम को अधिक मानने से ही प्रेम बढ़ता है। कैसे भी करके कभी प्रेम की मधुमय सरिता में गोता मारो तो कभी विरह की।

दिल की झरोखे में झुरमुट के पीछे से जो टुकुर-टुकुर देख रहे हैं दिलबर दाता, उन्हें विरह में पुकारोः ‘हे नाथ !…. हे देव !… हे रक्षक-पोषक प्रभु !….. टुकुर-टुकुर दिल के झरोखे से देखने वाले देव !…. प्रभुदेव !… ओ देव !… मेरे देव !…. प्यारे देव!….. तेरी प्रीति, तेरी भक्ति दे….. हम तो तुझी से माँगेंगे, क्या बाजार से लेंगे ? कुछ तो बोलो प्रभु !…’

कैसे भी उन्हें पुकारो। वे बड़े दयालु हैं। वे जरूर अपनी करूणा-वरूणा का एहसास करायेंगे।

तुलसी अपने राम को रीझ भजो या खीज।

भूमि फैंके उगेंगे, उलटे सीधे बीज।।

विरह से भजो या प्रेमाभक्ति से, जप करके भजो या ध्यान करके, उपवास, नियम-व्रत करके भजो या सेवा करके, अपने परमात्मदेव की आराधना ही सर्व मंगल, सर्व कल्याण करने वाली है।

हरि तुमसे दूर नहीं ….

 

asaramji

हरि तुमसे दूर नहीं ….

सौ छोटे-छोटे पातक एक महापातक बनता है। सौ छोटे-छोटे पुण्य एक महा पुण्य बनता है। जब पुण्य का सिलसिला चलता है तब जीव सुखी रहता है। इस समय पाप करता है तो भी उसको धन-संपत्ति, सुख सुविधाएँ मिलती रहती हैं क्योंकि अभी पुण्यकाल का प्रकरण चल रहा है। जब प्रारब्ध का पाप प्रकरण चलता है तब अच्छा काम करते हुए भी व्यक्ति के जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता।

ऐसे समय में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। अपना जप-तप-ध्यान-अनुष्ठान-आत्म-विचार प्रतिदिन चालू रखना चाहिए। कल्मष कटते जाएंगे, अन्तःकरण पावन होता जाएगा. महापातक दूर होते जाएँगे तब जप, ध्यान, कीर्तन आदि का पूरा लाभ दिखेगा। तुलसीदास जी कहते हैं-

तुलसी  जाके मुखनते धोखे निकसे राम।

ताके पग की पगतरी मोरे तन को चाम।।

धोखे से भी जिसके मुख से भगवान का नाम निकलता है वह आदमी भी आदर के योग्य है। जो प्रेम से भगवान का चिन्तन, ध्यान करता है, भगवतत्त्व का विचार करता है उसके आदर का तो कहना ही क्या ? उसके साधन-भजन को अगर सत्संग का संपुट मिल जाय तो वह जरूर हरिद्वार पहुँच सकता है। हरिद्वार यानी हरि का द्वार। वह गंगा किनारे वाला हरि द्वार नहीं, जहाँ से तुम चलते हो वहीं हरि का द्वार हो। संसार में घूम फिरकर जब ठीक से अपने आप में गोता लगाओगे, आत्म-स्वरूप में गति करोगे तब पता चलोगे कि हरिद्वार तुमसे दूर नहीं, हरि तुमसे दूर नहीं और तुम हरि से दूर नहीं।

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था।

आता न था नजर तो नजर का कसूर था।।

अज्ञान की नजर हटती है। ज्ञान की नजर निखरते निखरते जीव ब्रह्ममय  हो जाता है। जीवो ब्रह्मैव नापरः। यह अनुभव हो जाता है।

 

%d bloggers like this: