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वज्रात् त्रायते इति पवित्रः।

 

asaramji
वज्रात् त्रायते इति पवित्रः।

शास्त्र कहते हैं पवित्र व्यक्ति पर वज्र भी गिरे तो उसका बाल बाँका नहीं कर सकता। वज्रात्  त्रायते इति पवित्रः। जो पवि अर्थात् वज्र से भी रक्षा  करे उसका नाम है पवित्र। वज्र पवित्र व्यक्ति का स्पर्श नहीं कर सकता।

हमारे धर्माचार की विधि है कि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठें तब जरूरत लगे तो लघुशंका, शौचादि करके अथवा ऐसे ही थोड़ी देर तक बिस्तर पर बैठकर ब्राह्ममुहूर्त का सदुपयोग करें, पवित्र चिंतन करें क्योंकि सोते समय सभी वासनाएँ शांत हो जाती है एवं जागने के बाद धीरे-धीरे उदित होती हैं। प्रभातकाल में नींद उड़ी है, सांसारिक वासनाओं का उदय अभी नहीं हुआ है – ऐसे समय में यदि अपने आत्मस्वरूप का, परम सत्य परमात्मा का चिंतन करोगे तो खूब-खूब लाभ होगा। जैसे विद्युत के प्रवाह के साथ जुड़ते ही बैटरी चार्ज (आवेशित) हो जाती है ऐसे ही प्रातःकाल में अपने चित्त एवं जीवन को पवित्र करने वाले आत्मा-परमात्मा के साथ थोड़ा सा भी संबंध जुड़ जाय तो हृदय में उसकी शक्ति का आविर्भाव हो जाता है। वह जीवनशक्ति फिर दिन भर के क्रिया-कलापों में पुष्टि देती रहेगी।

प्रभात काल में यदि बहुत सुस्ती लगती हो, शरीर में अशुद्धि हो तो भले स्नान करके फिर आत्मचिंतन के लिए बैठो, परमात्म-स्मरण के लिए बैठो लेकिन नित्य कर्म के नाम पर दूसरी खटपट में नहीं पड़ना। सबसे पहले परमात्मा का ही चिंतन करना परमावश्यक है क्योंकि सबसे पवित्र वस्तु परमात्मा है। परमात्मा के चिंतन से बढ़कर अन्य कुछ भी नहीं है। यदि ब्राह्ममुहूर्त में 5-10 मिनट के लिए आत्मा-परमात्मा का ठीक स्मरण हो जाय तो पूरे दिन के लिए एवं प्रतिदिन ऐसा करने पर पूरे जीवन के लिए काफी शक्ति मिल जाय।

अपना शरीर यदि मलीन लगता हो तो ऐसा ध्यान कर सकते हैं-

“मेरे मस्तक में भगवान शिव विराजमान हैं। उनकी जटा से गंगाजी की धवल धारा बह रही है और मेरे तन को पवित्र कर रही है। मूलाधार चक्र के नीचे शक्ति एवं ज्ञान का स्रोत निहित है। उसमें से शक्तिशाली धारा ऊपर की ओर बह रही है एवं मेरे ब्रह्मरंध्र तक के समग्र शरीर को पवित्र कर रही है। श्री सदगुरु के चरणारविंद ब्रह्मरंध्र में प्रगट हो रहे हैं, ज्ञान-प्रकाश फैला रहे हैं।”

ऐसा ध्यान न कर सको तो मन-ही-मन गंगा किनारे के पवित्र तीर्थों में चले जाओ। बद्री-केदार एवं गंगोत्री तक चले जाओ। उन पवित्र धामों में मन-ही-मन भावपूर्वक स्नान कर लो। पाँच-सात मिनट तक पावन तीर्थों में स्नान करने का चिंतन कर लोगे तो जीवन में पवित्रता आ जायेगी। घर-आँगन को स्वच्छ रखने के साथ-साथ इस प्रकार तन-मन को भी स्वस्थ, स्वच्छ एवं भावना के जल से पवित्र करने में जीवन के पाँच-सात मिनट प्रतिदिन लगा दोगे तो कभी हानि नहीं होगी। इसमें तो लाभ ही लाभ है।

सूर्योदय से पूर्व अवश्य उठ जाना चाहिए। सूर्य हमें प्रकाश देता है। प्रकाशदाता का आदर नहीं करेंगे तो ज्ञानादाता गुरुदेव का भी आदर नहीं कर सकेंगे। सूर्योदय से पहले उठकर पूजा करने का अर्थ है ज्ञानादाता का आदर करना। पूजा अर्थात् अपने जीवन में सत्कार की क्रिया। यह मानव का कर्त्तव्य है। भगवान भास्कर, ज्ञानदाता सदगुरुदेव एवं देवी-देवताओं का आदर तो करना ही चाहिए। इतना ही नहीं, अपने शरीर का भी आदर करना चाहिए। शरीर का आदर कैसे करें ? नीतिशास्त्र में एक श्लोक आता हैः

कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं

बह्णशिनं निष्ठुरभाषिणं च।

सूर्योदये चास्मिते च शायिनं

विमुञ्चति श्रीरपि चक्रपाणिम्।।

“मैले वस्त्र पहनने वाले, दाँत गंदे रखने वाले, ज्यादा खाने वाले, निष्ठुर बोलने वाले, सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाले स्वयं विष्णु भगवान हों तो उन्हें भी लक्ष्मी जी त्याग देती है।”

आदि नारायण स्वयं को गंदा देखें, मुँह में से दुर्गन्ध आने लगे, आलसी हो जायें तो लक्ष्मी जी उनसे तलाक ले लें। स्वच्छता एवं पवित्रता द्वारा लोगों की प्रीति प्राप्त करना, सुरुचि प्राप्त करना यह भी पूजा का, धर्म का एक अंग है। इसमें दूसरों की भी पूजा है एवं स्वयं की भी।

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