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दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।

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दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।

 

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।28।।

‘(निष्काम भाव से) श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषादिजनित द्वन्द्वरूप मोह से मुक्त और दृढ़ निश्चय वाले पुरुष मुझको भजते हैं।’

(गीताः 7.28)

जगत की वासनाएँ ही पाप हैं और निष्काम कर्म पुण्य हैं। पुण्यकर्मों  के द्वारा जिनके पापों का अन्त हो गया है वे द्वन्द्व और मोह से मुक्त होकर, ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात दृढ़ता पूर्वक मुझे भजते हैं।

मोह विचार से दूर होता है और द्वन्द्व ज्ञाननिष्ठा से। इसलिए पहले मोह दूर होगा और फिर द्वन्द्व समाप्त होंगे क्योंकि द्वन्द्वों की उत्पत्ति मोह से ही होती है। द्वन्द्व-मोह से मुक्ति, दृढ़ व्रत और भजन ये तीनों बातें एक साथ ही होनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि विवेक होने के पश्चात जो भजन करता है उसे द्वन्द्व चलायमान नहीं कर सकते क्योंकि विवेक द्वारा उसने अपनी असंगता का अनुभव कर लिया है।

निष्काम कर्म से, श्रेष्ठ कर्म से, पुण्यकर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। शुद्ध हृदयवाला ही दृढ़व्रती होकर, कृतनिश्चयी होकर भगवान का भजन कर सकता है।

लोग भगवान के भजन का प्रारंभ तो करते हैं किन्तु बीच में ही भजन छूट जाता है। चार दिन भजन करते हैं, फिर छूट जाता है। नहीं, ऐसा नहीं करना चाहिए। समय का नियम छूट जाये, कोई बात नहीं। स्थान का नियम छूट जाये कोई बात नहीं। किन्तु जो व्रत अपने जीवन में ग्रहण करें उसका पालन अवश्य करना चाहिए। समय और स्थान का नियम टूटने पर भी व्रत नहीं टूटना चाहिए। भगवान का भजन, नाम-जप दृढ़ता से करना चाहिए।

तमाम प्रकार की इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्व हमारे चित्त की शक्तियों को बिखेर देते हैं लेकिन जिनके पापों का अन्त हो गया है ऐसे भक्त चित्त की तमाम शक्तियों को केन्द्रित करके भगवान के भजन में दृढ़तापूर्वक लग जाते हैं। दृढ़ता से भगवान का भजन करने वाले स्वयं ही भगवन्मय हो जाते हैं।

भजन में जब तक दृढ़ता नहीं आती तब तक भजन का रस आता और जब तक भजन का रस नहीं आता तब तक संसार के रस का आकर्षण भी नहीं जाता। यदि एक बार भी भगवद्-भजन का रस मिल जाये तो संसार के समस्त रस फीके हो जाते हैं।

धन-वैभव, साधन-संपदा अज्ञान से सुखद लगते हैं लेकिन उनमें द्वन्द्व रहते हैं। राग-द्वेष, इच्छा-वासना के पीछे जीव का जीवन समाप्त हो जाता है और द्वन्द्वों से मुक्त हुए बिना भगवान की दृढ़ भक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती।

निर्द्वन्द्व तो वही हो सकता है जिसने पुण्य कर्मों के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर दिया है। निर्द्वन्द्व तो वही हो सकता है जिसने श्रीकृष्ण के ज्ञान को, ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के ज्ञान को पचा लिया है।

किसी सच्चे सदगुरु का मार्गदर्शन मिल जाये और साधक दृढ़व्रती होकर उस मार्ग पर चल पड़े तो परमात्म-प्राप्ति का कार्य सरल बन जाता है।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

हरि तुमसे दूर नहीं ….

 

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हरि तुमसे दूर नहीं ….

सौ छोटे-छोटे पातक एक महापातक बनता है। सौ छोटे-छोटे पुण्य एक महा पुण्य बनता है। जब पुण्य का सिलसिला चलता है तब जीव सुखी रहता है। इस समय पाप करता है तो भी उसको धन-संपत्ति, सुख सुविधाएँ मिलती रहती हैं क्योंकि अभी पुण्यकाल का प्रकरण चल रहा है। जब प्रारब्ध का पाप प्रकरण चलता है तब अच्छा काम करते हुए भी व्यक्ति के जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं दिखता।

ऐसे समय में किसी को निराश नहीं होना चाहिए। अपना जप-तप-ध्यान-अनुष्ठान-आत्म-विचार प्रतिदिन चालू रखना चाहिए। कल्मष कटते जाएंगे, अन्तःकरण पावन होता जाएगा. महापातक दूर होते जाएँगे तब जप, ध्यान, कीर्तन आदि का पूरा लाभ दिखेगा। तुलसीदास जी कहते हैं-

तुलसी  जाके मुखनते धोखे निकसे राम।

ताके पग की पगतरी मोरे तन को चाम।।

धोखे से भी जिसके मुख से भगवान का नाम निकलता है वह आदमी भी आदर के योग्य है। जो प्रेम से भगवान का चिन्तन, ध्यान करता है, भगवतत्त्व का विचार करता है उसके आदर का तो कहना ही क्या ? उसके साधन-भजन को अगर सत्संग का संपुट मिल जाय तो वह जरूर हरिद्वार पहुँच सकता है। हरिद्वार यानी हरि का द्वार। वह गंगा किनारे वाला हरि द्वार नहीं, जहाँ से तुम चलते हो वहीं हरि का द्वार हो। संसार में घूम फिरकर जब ठीक से अपने आप में गोता लगाओगे, आत्म-स्वरूप में गति करोगे तब पता चलोगे कि हरिद्वार तुमसे दूर नहीं, हरि तुमसे दूर नहीं और तुम हरि से दूर नहीं।

वो थे न मुझसे दूर न मैं उनसे दूर था।

आता न था नजर तो नजर का कसूर था।।

अज्ञान की नजर हटती है। ज्ञान की नजर निखरते निखरते जीव ब्रह्ममय  हो जाता है। जीवो ब्रह्मैव नापरः। यह अनुभव हो जाता है।

 

राम तुम्हारा अपना है।

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राम तुम्हारा अपना है।

सदा दिव्य विचारों को अपने में भरो। कभी नकारात्मक विचारों को अपने में आने मत दो। कभी दुःख-चिंता के या पलायनवादी विचारों को पोषण मत दो। हताशा को नजदीक मत आने दो। ईश्वर की अनन्त शक्ति तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रोम-रोम में जो चेतना रम रही है उसी का नाम तो राम है। राम तुमसे दूर नहीं….. चैतन्य तुमसे दूर नहीं…. परमेश्वर तुमसे दूर नहीं। अभागे विषय-विकारों ने तुम्हें भगवान से और उन्नति से दूर रखा है। अपने न्यायाधीश आप बनो। सदियों से तुम्हें धोखा देने वाला तुम्हारा दुर्बल और विकारी मन, अनिश्चयात्मिका बुद्धि और छोटी-छोटी बातों में उलझे हुए लोगों का संग…. इन सब कारणों से तुम क्षुद्र बन गये हो।

कभी बहुमति पर विश्वास मत करो। सदा श्रेष्ठमति पर विश्वास करो। बहुमति क्या कह रही है उसकी परवाह मत करो। बहुमति को रिझाने के चक्कर में मत पड़ो। परमात्मा को रिझा लो, बहुमति अपने आप रिझी हुई मिलेगी। अगर नहीं रिझती है तो उसका दुर्भाग्य है। अपने आत्मा-परमात्मा को रिझा लो, तुम्हारा बेड़ा पार हो जायगा और बहुमति को भी मार्गदर्शन मिल जायेगा।

जगत की ‘तू-तू…. मैं-मैं…’ को सत्य मानकर अपनी खोपड़ी को भरो मत। जगत का बहुत सुन लिया। ‘यह अच्छा है… वह बुरा है….’ ये सारे मन के खिलवाड़ हैं। उनसे ऊपर उठो…. जगत से पार हो जाओ। हरि ॐ तत्सत्…. और सब गपशप।

जी बीत गया उसको भुला दो। जो चल रहा है उसको हँसकर बीतने दो। जो आयेगा उसकी चिन्ता मत करो। आज तुम अपने आत्मा में डट जाओ। कल तुम्हारे लिए सुन्दर आयेगा। अभी तुम अपने आत्मबल में आ जाओ…. निर्विकारी नारायण तत्त्व में आ जाओ। जीवन का सत्य यह है। तुम्हारी पसन्दगी तुच्छ चीजों की नहीं होनी चाहिए। तुम्हारा आकर्षण नश्वर चीजों के लिए नहीं होना चाहिए।

तुम ऐसी चीजों को प्यार करते हो जो तुम्हें पहचानती तक नहीं ! यह कहाँ की बुद्धिमानी है ? तुम उसे प्यार करो जो अनादि काल से तुम्हें पहचानता है…. वह चैतन्य आत्मदेव।

मकान तुम्हें नहीं पहचानता। गाड़ी तुम्हें नहीं पहचानती। रुपये तुम्हें नहीं पहचानते। चोर इन्हें लेकर चले जायें तो ये हीरे-जवाहरात, सोने-चाँदी के टुकड़े, रूपये-पैसे तुम्हें राम राम करने को नहीं आयेंगे। ये तुम्हें पहचानेंगे नहीं। तुम्हें जो अभी पहचानता है, युगों से पहले पहचानता था, इस शरीर के बाद भी जो तुम्हें पहचानेगा उसकी पसन्दगी करो। जो तुम्हें वास्तव में चाहता है उस परमात्म-चैतन्य को तुम चाहो। नश्वर चीजें तुम्हें नहीं चाहती हैं। शाश्वत चैतन्य परमात्मा तुम्हें चाहता है। अगर परमात्मा तुम्हें नहीं चाहता तो इन सर्दियों के दिनों में धारणा, ध्यान, समाधि और तत्त्वज्ञान की इस जगह पर तुम पहुँच भी न पाते। इसका मतलब यह है कि भगवान तुम्हें चाहता है, परमात्मा तुम्हें चाहता है अतः परमात्म-साक्षात्कार ही तुम्हारी पसन्दगी होनी चाहिए।

छोटी-छोटी पसन्दगियों में अपने को उलझाओ मत। अब तुम बच्चे नहीं हो। समय तेजी से बहा रहा जा रहा है। अपना काम पूरा कर लो। बिजली के चमकारे में सूई में धागा पिरोने जैसी बात है। न जाने कब दम टूट जाय, कोई पता नहीं। कब तक छोटी-छोटी बातों में अपने को खपाते रहोगे ? कब तक छोटे-छोटे आकर्षणों में अपने को उलझाते रहोगे ?

चरैवेति…. चरैवेति…. चरति चरतो भगः।

आगे बढ़ो…. आगे बढ़ो….। बैलगाड़ी में पचासों साल तक घूम लिया। अब वायुयान में केवल दो घण्टे बैठो, दरिया पार की खबरें सुना देगा। दो दिन हवाई जहाज की यात्रा करो, देश विदेश का चक्कर काटकर अपने धाम में आ जाओगे। ऐसे विहंग मार्ग का आश्रय लो।

जब भौतिक विनाश तेजी से हो रहा है तो आध्यात्मिक उन्नति देरी से क्यों ? आध्यात्मिक उन्नति भी तेजी से होनी चाहिए।

मूंआ पछीनो वायदो नकामो को जाणे छे काल…..।

मरने के बाद कल्याण होगा, आत्मशांति मिलेगी ऐसा वादा नहीं। कोई भगवान का पार्षद, कोई देवदूत आकर अपने कन्धे पर बिठाकर भगवान के पास ले जाएगा…. ऐसी बात नहीं। हम उन्हें कष्ट क्यों दें ? उन्हें तकलीफ क्यों दें ? देवताओं के पार्षद आयें और हमें स्वर्ग में या वैकुण्ठ में ले जायें यह भी हमें आशा नहीं।

हम राजी हैं उसमें जिसमें तेरी रजा है…..।

कभी-कभी अपने इष्टदेव को, अपने गुरुदेव को तसल्ली दे दो कि हे इष्टदेव ! हे गुरुदेव ! हे भगवान ! हम आपके निर्दिष्ट मार्ग पर चलेंगे। हम कुन्दन हैं, सुवर्ण हैं, पित्तल नहीं हैं। पित्तल यानेः संसार की तुच्छ चीजों का आकर्षण होना, देह को’मैं’ मानना, यह पित्तलपना है। हम पित्तल नहीं हैं।

कुन्दन के हम हैं डले जब चाहे तू गला ले।

बाँवर न हो तो हमको ले आज तू आजमा ले।।

जैसी तेरी खुशी हो सब नाच तू नचा ले।

सब छानबीन करके हर तौर तू आजमा ले।।

हम भागेंगे फिसलेंगे नहीं। हर तौर तू आजमा ले। आजमाने में भी सफल होने की शक्ति तू ही देगा। क्योंकि हमें तेरी कृपा पर भरोसा है। हम यह गर्व से नहीं कहते लेकिन प्यार से कहते हैं। मुहब्बत जोर पकड़ती है तो शरारत का रूप लेती है। गोपियों ने तुम्हें मक्खन की लोंदी पर नचाया था। अहिरन की छोरियों ने तुम्हें छाछ पर नचाया था। क्योंकि तू उदार है। तेरा विधान मंगलमय है।

हे मंगलमय विधानदाता ! हम तेरे विधान के अनुकूल हैं। जिस ढंग से तू नचाना चाहता है नचा ले, जी भरके नचा ले। दिल भरके आजमा ले। हम तेरे ही हैं, तेरे ही रहेंगे और तुझ ही में मिल जाएँगे, नश्वर में नहीं जाएँगे।

अपने आप पर विश्वास करो। विकारों को और दुर्बलताओं को कुचलकर दूर फेंको। बल ही जीवन है… .दुर्बलता मौत है। श्रद्धा बल….साधन बल…..भरोसा बल….।

बड़े-बड़े महारथी द्रौपदी की रक्षा न कर सके। हजार हाथियों का बल रखने वाले दुःशासन जैसे दुष्ट के आगे भी द्रौपदी झुकी नहीं। अपने इष्टदेव को पुकारा। वह परमात्मा प्रकट हो गया।

परमात्मा वस्त्र रूप में भी प्रकट हो सकता है तो तुम्हारे दिल में प्रकट होने में क्या देर लगती है ?

दृढ़ता..हिम्मत.. तत्परता… विकारों को कुचलने की आत्मशक्ति नितान्त आवश्यक है, उसे जगाओ।

भय को दूर भगा दो। ईश्वर से भी डरो मत… ईश्वर से भी भय मत करो। ईश्वर से तो प्रेम करना होता है। परमात्मा प्रेमास्पद है। उसे स्नेह करते जाओ। वह तुम्हारा अपना है। तुम्हारा राम तुम्हारा अपना है।

 

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